PART2: पापीकोंडालू की हसीन यात्रा, ‘कहो ना प्यार है’ के लोकेशन याद आएंगे

दोस्तों, अब तक आपने हैदराबाद से भदरांचलम की रोमांचक यात्रा के बारे में पढ़ा. आगे की स्टोरी लंबी तो है लेकिन मजेदार है. तो पढ़िए पापीकोंडालू तक कैसे पहुंचा आपका यायावर

अनोखी प्रतिमा

भदरांचल मंदिर में दर्शन के बाद अगले पड़ाव की ओर निकलना चाहता था. लोगों ने बताया कि ट्रेवल एजेंट के जरिए ही टिकट बुक हो सकता है.परेशानी यहीं से शुरू हो गई. आप जानते ही हैं एजेंट आते ही हर चीज का दाम बढ़ जाता है. और, हम ठहरे घुमक्कड़. ज्यादा पैसा देने लगे तो यायावरी में पसीने छूट जाएंगे. फिर दो-तीन दुकानों का चक्कर लगा लिया. बात बन नहीं रही थी. तभी एक फल बेचनेवाले ने वहां से गुजर रहे एक शख्स से परिचय करा दिया और डील पक्की हो गई. 2200 रूपए पर जाकर बात बनी. इसमें नाश्ता, खाना और रात में पापीकोंडालू का स्टे भी शामिल है.

खूबसूरत नजारे

अब शुरू होती है असली यात्रा. मैं और साथी चंदन गाड़ी में सवार हो गये. 9 बजे के करीब हिचकोले मारते हुए सवारी निकल पड़ी. हिचकोले से आप समझ ही गए होंगे गाड़ी कैसी होगी. करीब 1 घंटे के बाद सिंगल रोड पर सवारी फर्राटे भर रही थी. दोनों ओर जंगल और बीच में चलती गाड़ी. क्या बताएं मारक मजा आ रहा था. बीच-बीच में छोटे-छोटे गांव आ रहे थे. जहां लाल सलाम के झंडे को देख अलग अनुभव हो रहा था. घर की बनावट,पहनावा और खिड़कियों का डिजाइन बदल रहा था. हवा के झोंको से झपकियां लगती थी. लेकिन, नेचर की खूबसूरती झकझोर कर उठा देती थी. लग रहा था. मानो हम, पहाड़ों में घुसे जा रहे हैं और वो खत्म होने का नाम नहीं ले रही.कहीं आप खो तो नहीं गए. मेरे और चंदन के साथ ऐसा ही हुआ था. खैर, कोई बात नहीं अगला पैरा और मजेदार है. 2 घंटे की यात्रा के बाद हम पोचोवरम(POCHOVARAM) पहुंचे. यहां से आगे कोई रास्ता नहीं है. अब स्टीमर से पापीकोंडालू की ओर निकलना था. अगले 3 घंटे स्टीमर पर बीतनेवाले हैं. पोचोवरम को बोटिंग प्वाइंट भी बोलते हैं. ये लोकेशन भी बेहद खूबसूरत है. मौका मिलते ही हम नेचर को अपने मोबइल कैमरे में कैद करने की कोशिश में जुट गए.

पोचोवरम
स्टीमर में यायावर

बोटिंग प्वाइंट के पास साउथ इंडियन नाश्ता दिया गया.मैं तो बड़े मजे से गोदावरी किनारे इसका लुत्फ उठाया. लेकिन चंदन टेस्ट करने के बाद नाक-मुंह सिकोड़ रहे थे. अब और कोई ऑप्शन भी नहीं था. लिहाजा, स्टीमर पर हमलोग सवार हो गए. फर्स्ट फ्लोर पर यात्रियों के लिए कुर्सियां लगी थी. ऊपर से छतरी और चारों ओर खुला था.संयोग से ये यात्रा फ्रेडशीप डे के दिन हो रही थी. लिहाजा,स्टीमर पर सभी कुर्सियां भरी थी. कई कपल भी दिख रहे थे जो अपनी दोस्ती को बढ़ाने पापीकोंडालू की यात्रा कर रहे थे. हम स्टीमर के हर कोने पर जाकर नेचर का लुत्फ उठा रहे थे. चारों ओर हरी-भरी पहाड़ियां दिख रही थी. बीच में बलखाती गोदावरी. करीब 45 मिनट बाद स्टीमर खुल गई और रोमांचक यात्रा की शुरूआत हुई. तेलुगू में गाना बजाया जा रहा था. भाषा तो समझ में आ नहीं रही थी. लेकिन म्यूजिक पर भी थिरक रहे थे. गोदावरी में स्टीमर बढ़ते ही खूबसूरती का दीदार होने लगा था. आसमान बिल्कुल नीला और साफ दिख रहा था. चारों ओर घने जंगल और बीच में गोदावरी की लहरें. हवा में अजीब सी ठंडक थी. जिसे केवल महसूस किया जा सकता है. जिसने हमारी रात भर की थकान पल भर में दूर किया था. हर शख्स तस्वीर खींचने में बिजी था और हम खुद को गोदावरी की गोद में पाकर खुश हो रहे थे. इस खूबसूरत जगह को देख आपको पारंपरिक भारतीय महिलाओं का चेहरा सामने दिखेगा. जैसे वो बालों को सिर के बीच से दो हिस्सों में बांट देती है. वैसी ही गोदावरी नदी पापी श्रंखला की पहाड़ियों को दो हिस्सों में अलग कर आगे बढ़ रही थी. लग रहा था स्टीमर किसी गुफा में घुसनेवाला है. लेकिन, नजदीक पहुंचते ही भ्रम टूट सा जाता था और गोदावरी चौड़ी होकर पहाड़ों को काटते हुए आगे बढ़ती दिख रही थी.

करीब 1 घंटे की यात्रा के बाद स्टीमर दूसरे किनारे की ओर जाने लगा. पूछने पर पता चला कि यहां कोई वाटरफॉल है. सभी यात्रियों को आधे घंटे का समय दिया गया.इस लोकेशन का नाम पेरंटापली (PERANTAPALLI) बताया गया.इस जगह की भी खूबसूरती अद्भूत है. सामने गोदावरी बह रही है. चारों ओर भीषण जंगल है और पीछे पहाड़ियों से गिरता झरना. इसके ठीक बगल में छोटा सा मंदिर. यहां स्वामी बालानंद सरस्वती का आश्रम है. वो शिवभक्त थे. साथ ही रामक्रष्ण परमहंस के अनुयायी भी. यही वजह है कि मां काली के भक्त और स्वामी विवेकानंद के गुरू की यहां प्रतिमा है. जंगल के बीच करीब 10 से 12 घरों का ये छोटा सा गांव है.यहां के बाशिंदे आदिवासी समुदाय से हैं जो सदियों से इन जंगलों में रह रहे हैं. विकास अभी तक यहां कदम नहीं रखा है. इसलिए ये खुद में नेचर के बीच मस्त रहते हैं. स्टीमर से उतरकर हम भी मंदिर तक पहुंचे. झरने के पानी से चेहरा धोते ही गजब की ताजगी महसूस हुई. गांव के कुछ लोग पर्यटकों के लिए सामान बेचते जरूर दिखे. पूछने पर पता चला स्टीमर और बोट के सहारे ही यहां तक सामान पहुंचता है. इस बीच स्टीमर से सीटी बजाया जाने लगा. लौटने का ये अलार्म था. रूठे मन से मुरझाए दिल से हम स्टीमर की ओर चल पड़े.हमारा अगला पड़ाव पापीकोंडालू गांव है. जहां हमें रात बितानी है.

1 घंटे बाद स्टीमर फिर से खुल गई. हम गोदावरी में कुंलाचे भर रहे थे. दूर पहाड़ों पर आदिवासियों के छोटे-छोटे गांव दिख रहे थे. जहां बिजली के तार तो नहीं सोलर लाइट जरूर नजर आ रहे थे. फूस की झोपड़ियों पर सोलर प्लेट रखा हुआ था. इन इलाकों में सरकार की ओर से सोलर प्लेट की व्यवस्था कराई गई है. गांव के नीचे पहाड़ की तलहट्टियों को गोदावरी छू रही थी. वहां बंसी लिए मछली की फिराक में कई आदिवासी परिवार दिख रहे थे तो कुछ छोटे नावों में बैठकर गोदावरी की सैर कर रहे थे. हमारे स्टीमर के अनांउसर हर जगह की जानकारी दे रहे थे. लेकिन, तेलगू में.यहीं हम मात खा जा रहे थे. फिर भी भाव समझने की कोशिश कर रहा था. हम बार-बार कुर्सी से उठकर स्टीमर के अगले हिस्से के पास पहुंच जा रहे थे. यहां मुझे टाइटेनिक फिल्म याद आने लगी. बांह फैलाए मैं किसी का इंतजार कर रहा था. लेकिन, किसी महबूबा के बजाए हवा का हर झोंका शरीर में रोमांच पैदा कर रहा था. मन कहीं खो सा गया था. कुछ दूर आगे बढ़ते ही मुझे लगा मैं तो ‘कहो ना प्यार है’फिल्म की शूटिंग वाली जगह पहुंच गया हूं. बिल्कुल सेम लोकेशन जहां फिल्म में किसी टापू पर रितिक और हिरोइन फंस जाती है. हमारे दोस्त चंदन भी बोल पड़े राकेश रोशन को तो यहां आना चाहिए था. वो बेकार ही निदेश चले गए थे. खैर, कपोल कल्पना का दौर चल ही रहा था कि अगले पड़ाव के बारे में अनाउंसमेंट हुआ. स्टीमर अब किनारा ले रही थी. सामने रेत का टीला दिख रहा था. तीन ओर से गोदावरी. चारों ओर से ऊंची-ऊंची पहाड़ियां. लगा किसी ने उठाकर आइलैंड में पटक दिया है.सूरज की रोशनी का निशान नहीं था. दूर चांद कहीं छिपा सा दिखाई दे रहा था. अब उतरने की बारी थी. हम कोलुर (KOLUR)गांव पहुंच चुके थे.

स्टीमर से उतरते ही रेत के टीलों पर भोजन की व्यवस्था की गई थी. सभी स्टीमर का यहीं ठहराव होता है. भूख भी लग गई थी. इसलिए बिना देर किए हम खाने पर टूट पड़े. वेज और नॉननेज दोनों का प्रबंध था. सामने आदिवासी समूह के लोग ट्रैडिशनल बैंबू चीकेन बना रहे थे. इसमें आग पर बांस के अंदर चीकेन को रखकर पकाया जाता है. स्वाद लाजवाब. खैर, बैंबू चीकेन की पूरी कहानी आपको अगली कड़ी में बताऊंगा. अभी तो कोलुर की खूबसूरती हमें कायल कर रही थी. सामने पहाड़ी पर लगे बैंबू टेंट में रात गुजरनेवाली थी. जहां मोबाइल का कोई नेटवर्क काम नहीं करता है. बिजली है नहीं. आज की रात बेहद रोमांचक और यादगार गुजरनेवाली थी. मैं जितना खुश था. मेरे मित्र चंदन के चेहरे पर मायुसी दिख रही थी. क्योंकि, उनका मोबाइल डब्बा हो गया था. वे पहली बार ऐसी जगह पहुंचे थे. जहां न तो अपनी भाषा थी और न ही अपने लोग.यहां से हम अपने टेंट की ओर बढ़ चले. कुछ और टूरिस्ट थे. जिनकी रात यहां बीतने वाली थी. बाकी लोग सेम स्टीमर से वापस निकल पड़े थे. हमारे लिए अब स्टीमर अगले दिन आएगी..

अगली कड़ी में पढ़ें पापीकोंडालू में बीती हसीन रात और अगले दिन की ट्रैकिंग के बारे में

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