हैदराबाद. यात्राएं तो हमेशा आपकी जिंदगी को खूबसूरत बनाती है. ट्रेन हो बस हो या बाइक हो हर किसी का अलग मजा है. आपको शहर में अलग नजरिया मिलता है. यही सोचकर इस बार मैंने साइकिल यात्रा करने का मन बना लिया. अपना टारगेट था गोलकुंडा फोर्ट. बचपन में कभी इसकी कहानी पढी थी. कोहिनूर हीरे से इसे जोड़ा गया था. अब देखने की बारी थी.

80 किमी जान थम गए पांव
कुछ दिनों से जहां मैं ठहरा था. वहां से इसकी दूरी 40 किमी बताया गया. ये सोचकर मैं हिम्मत हार रहा था. फिर सोचा इस बार कर ही लिया जाए. साइकिल उठाई और पैडल पर दबाव बनाने लगा. कुछ किमी चलने के बाद चढाई आ गई थी. अब हालत खराब होने लगी थी. सोचा कि प्लान कैंसल कर दिया जाए. तभी उन लड़कियों की याद आई. जिन्होंने साइकिल से लंबी दूरियां तय की है. यही सोचकर पैडल पर जोर लगाने लगा. अब तक 8 किसी की यात्रा पूरी हो चुकी थी. हल्की धूप भी चढ़ने लगी थी. पास में ही चाय की दुकान दिखी. चाय की चुस्की लेने के बाद आगे की ओर निकल पड़ा. हाइवे पर साइकिल की स्पीड धीमी हो गई थी. बगल से गुजरती हुई गाड़ियों को देखकर अच्छा लग रहा था. पैर पैडल पर और दिमाग गोलकुंडा फोर्ट पर लगा हुआ था. 10 होनेवाले थे. नाश्ते की दरकार हो रही थी. आगे जाकर दो ग्लास जूस पल भर में घटक गया. रास्ते की भी जानकारी नहीं थी. लोगों से पूछकर आगे बढ़ रहा था. अनजान सड़कों पर सबसे बेहतर होता है ऑटो या हर दिन पैसेंजर ढोनेवाले ड्राइवर से रोड की जानकारी लेना.

खंडहर बनी इमारतें
गोलकुंडा फोर्ट के आस-पास का इलाका ही पुराने हैदराबाद से रूबरू कराता है. सड़कें पतली हो जाती है. भीड़ बढ़ जाती है. पुरानी दुकानों की झलक दिखने लगती है. खान-पान से लेकर पहनावे तक में अंतर नजर आने लगता है. ट्रैडिशनल तरीके के कई होटल दिखता हैं. इस रास्ते का नाम तो छोटा बाजार है. अगर आप चीकेन-मटन के शौकीन हैं तो आपको इस बाजार में भरपूर मजा आएगा. छोटा बाजार पार करते ही गोलकुंडा फोर्ट की दीवारें दिखने लगती है. राजस्थान के किलों की तरह इसकी भव्यता नहीं है. गेट के पास पहुंचते ही सुकून मिला. 4 घंटे की यात्रा के बाद यहां तक पहुंचा था.

गोलकुंडा फोर्ट का एंट्री गेट
15 की टिकट लेकर साउथ के ऐतिहासिक फोर्ट में एंट्री हुई. काफी दिनों से सोचा हुआ सपना साकार हो रहा था. बचपन में गोलकुंडा का जो जिक्र पढ़ा था. उसे सामने देख रहा था. किले के नाम पर यहां काफी कम महल बचे हैं. कुछ बावरियां बची हुई है. इस किले में 9 गेट हैं. इन दरवाजों से होकर ही आप इसमें एंट्री कर सकते हैं. सभी की अलग-अलग खासियत है.कहा जाता है किसी जमाने में इसका एरिया 5 मिल तक फैला हुआ था. गोलकुंडा के सबसे उपरी हिस्से पर तीन मंजिल की इमारत दिखती है. इसे बारादरी कहा जाता था. यहां राजसभाएं हुआ करती थी. तीसरी मंजिल पर शाही आसन लगा हुआ है. बारादरी से हैदराबाद शहर काफी खुबसुरत दिखता है. आज भी किले की सबसे ऊंचाई वाली जगह यही है.

यल्लमादेवी का मंदिर
फोर्ट के चारों ओर घूमते-घूमते थकान होने लगी थी. पता चला कि यहां एक मंदिर भी है. इसे यल्लमादेवी का मंदिर बोला जाता है. अब्दुल हसन तानाशाह के जमाने में इसे बनाया गया था. मंदिर का डिजाइन गजब है. इसके ऊपर दो पत्थर टिके हुए हैं. दोनों का आकार अलग-अलग है. कई लोग इसे भगवान शिव की सवारी नंदी बोलते हैं. जूलाई के महीने में यहां भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है . मेले में शामिल होने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं.

करीब 3 घंटों तक घूमने के बाद निकलने का समय हो रहा था. वापसी भी साइकिल से ही करनी थी. धूप तो खत्म हो रही थी. लेकिन गर्मी बनी हुई थी. फोर्ट के अंदर कैंटीन भी है. यहां नाश्ता-खाना दोनों मिलता है. लंच करने के बाद फोर्ट से बाहर निकल पड़े. साइकिल उठाकर ठिकाने की ओर चल दिए. 2 किमी चलते ही गला सूखना लगता था. सबसे ज्यादा पानी की जरूरत हो रही थी. जहां कई भी सड़क किनारे छांव दिखता. साइकिल रूक जाती. कुछ देर तक आराम करने के बाद रफ्तार को बढ़ाया जा रहा था. रात 8 बजे तक बसेरा तक पहुंच गया. इस तरह से मेरी पहली साइकिल यात्रा पूरी हुई..
