काशी समय और धैर्य दोनों मांगता है, PHOTOS में देखें बनारस के अलग-अलग रंग

बनारस या वाराणसी को शब्दों में बयां करना बेहद मुश्किल है। यह सिर्फ एक शहर नहीं बल्कि संस्कृति और जीवनशैली का मिश्रण है। बनारस पूरी जिंदगी के सार को बताता है। यहां के घाटों से होकर सिर्फ गंगा ही नहीं बहती है। बल्कि, पूरी जिंदगी साथ-साथ चलती है। इस शहर को जानने के लिए धैर्य की जरूरत है। यहां की गलियां, मोहल्ला, घाट और भाषायी रस आपसे कई महीने मांगते हैं। राज घाट से लेकर अस्सी घाट तक पूरा जीवन चलता है। जीवन का दर्शन चलता है। हर उम्र के लोगों के लिए बनारस है। यह ज्ञान की भी धरती है और मोक्ष की भी। शब्दों के जरिए बनारस को आगे बताउंगा। इससे पहले फोटोज के जरिए देखिए बनारस के अलग-अलग रंग।

सूर्योदय के दौरान बनारस के राजघाट से ली गई तस्वीर। नाव से गंगा की सैर करते सैलानी। बनारस की यह भी खूबसूरती है कि सुबह से शाम तक एक ही शहर के कई रंग दिखते हैं। हर रंग को देखने के लिए बनारस वक्त मांगता है।
बनारस को साधुओं और साध्वियों का शरणस्थली भी कहते हैं। घाटों पर अलग-अलग अंदाज में भगवान की पूजा में लीन भक्त दिखेंगे। इतिहास में भी दर्ज है कि तुलसीदास से लेकर कबीर तक ने अपनी जिंदगी के कई साल इन घाटों पर गुजारे हैं।स्वामी रामानंद से लेकर वल्लभाचार्य और शंकराचार्य की विद्वता का गवाह रहा है यह शहर।
घाट किनारे साधना में लीन भक्त। बनारस में किसी एक खास संप्रदाय और ईश्वर को मानने वाले भक्त नहीं हैं। यहां सूफी भी नजर आएंगे, शैव और वैष्णव भी दिखेंगे। तमाम मोह-माया से दूर औघड़ भी नजर आएंगे। राजघाट से लेकर अस्सी घाट तक एक बार अगर आप पहुंचते हैं तो कई अनुभवों को अपने आप में समेटे हुए चलेंगे।
सूर्योदय के बाद बनारस के दशाश्वमेध घाट पर की जिंदगी। बॉलीवुड फिल्मों से लेकर कई शॉर्ट फिल्मों में इस घाट को आप देखते हैं। पौराणिक कथाओं के मुताबिक यहां पर ही अश्वमेध यज्ञ किया गया था, जिस पर इसका नाम दशाश्वमेध घाट पड़ा।बनारस के कई मशहूर घाटों में एक दशाश्वमेध घाट है। सूर्योदय के बाद यहां की गंगा आरती देखने के लिए भक्तों की भीड़ उमड़ती है। इस घाट पर ज्यादातर बाहर से आने वाले श्रद्धालु आस्था की डूबकी लेते हैं।
बनारस के अलग-अलग रंग इसे ही कहते हैं। यहां के घाटों पर अलग ही जिंदगी साथ-साथ चलती है। बदलते हुए दौर में भी बेहद पारंपरिक अंदाज में हजाम बनवाने की तैयारी में एक बुजुर्ग। एक तरफ गंगा की धारा। ठीक उसके दूसरी तरफ मां गंगा को ही अर्पित करने के लिए बाल कटवाटा बुजुर्ग। दीवार में टंगी आइने से झलकती तस्वीर को देखने पर सोचेंगे तो अलग ही कहानी आपको दिखेगी।
हरिश्चंद्र घाट पर मां के प्रांगन को साफ करता एक साधू। घाट के ऊपर कहीं दीवार पर लगी हुई मां काली की प्रतिमा। इस घाट पर एक तरफ जिंदगी खत्म होने के बाद अंतिम संस्कार किया जाता है। इसके बाद मां काली के चरणों में भक्त पूजा करते हैं। यह मंदिर में आकर कुछ देर बैठने के बाद सीथे गंगा की ओर देखते रहिए। अजीब सी शांति महसूस होती है।
गंगा घाट पर नमामी गंगे प्रोग्राम के तहत आरती करते लोग। बनारस के घाटों पर हर दिन कोई न कोई कार्यक्रम चलता ही रहता है। संयोग से मेरी यात्रा के बाद पीएम मोदी अपने संसदीय क्षेत्र बनारस पहुंचने वाले थे। इससे पहले पीएम के आगमन को लेकर बनारस के घाटों पर कार्यक्रम चल रहा था।
बनारस के घाटों पर औघड़ साधुओं से लेकर कई अलग-अलग तरह के संप्रदायों के साधुओं का डेरा रहता है। सनातन धर्म के कई अखाड़ों के साधू भी यहां रहते हैं। अलग-अलग रूप और अंदाज में यहां के घाटों पर नजर आते हैं। इनकी वेष-भूषा को देखने के लिए भी विदेश के लोगों का जमावड़ा रहता है। कई साधू तो यहां सिर्फ अपना स्वरूप बदल कर सिर्फ इसलिए रखते हैं कि विदेशों से आने वाले लोग उनकी फोटोज लेते हैं। इसके बदले वे पैसों की डिमांड करते हैं। पैसों को लेकर उनकी बार्गेनिंग की कला देखते ही आप हैरान हो जाएंगे।

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