PART9: पीठ पर मासूम और चेहरे पर मुस्कान, यूं हुई #Malana में एंट्री

पिछले पार्ट में आपने पढ़ा… जरी से मलाना गेट तक का सफर बेहद रोमांचक रहा. अब, आपका यायावर मलाना गेट से गांव तक के सफर के बारे में बता रहा है. करीब 2 किमी की इस ट्रैकिंग को सिर्फ आप अनुभव कर सकते हैं. इसे शब्दों में बयां करना बड़ी मुश्किल है. फिर भी एक कोशिश…

गांव की झलक

गेट से गांव का सफर

मलाना गेट को देखकर लगने लगा कि ड्रीम प्रोजेक्ट पूरा होने वाला है.  अब हम गांव की ओर चलने के लिए तैयार हो गए. साथ के तीन साथियों में दो की हालत खराब हो रही थी. ऊंचाई देखकर दम फुलने लगा. खैर, हौसला आफजाई करते हुए हम चल पड़े. पहले रोड से नीचे उतरना है. इसके बाद चढ़ाई शुरू होती है. पहाड़ी रास्तों पर चलना भी मुश्किल होता है. धीरे-धीरे सभी लोग नीचे उतर आए. पार्वती नदी के ऊपर बने पुल के पास पहुंच गए. हालांकि, नदी में पानी कम आ रहा था. लेकिन, चट्टानों की वजह से खतरनाक दिख रहा था. पुल पर लगता है कि हम पहाड़ों की गोद में बैठे हुए हैं. चारों ओर ऊंची-ऊंची पहाड़ियां, लंबे-लंबे शॉल देवदार के पेड़, सिर ऊपर करने पर दिखता आसमान. यानि. जम्मू कश्मीर की खूबसूरती से कम नहीं है यहां का सौंदर्य.

पार्वती नदी पर पुल

पहाड़ पर दौड़ते बच्चे

अब मलाना गांव के लोग भी दिखने लगे थे. बड़ी संख्या में महिलाएं लकड़ी काटने के लिए घऱ से निकली थी. बर्फबारी नहीं होने की वजह से आसमान साफ दिख रहा था. मलाना गेट से गांव तक चट्टानों पर ही रास्ता बना है. पतली सी पगदंडी के सहारे गांव तक पहुंचना होता है. मलाना के ग्रामीणों को उतरते देख हमारा हौसला बढ़ गया था. बुजुर्ग महिलाएं भी तेज गति से पहाड़ी चढ़ रही थी. बच्चे तो मैदान की तरह पहाड़ पर दौड़ते हुए चढ रहे थे. इस बीच फोटो सेशन भी हमलोग का चल रहा था. धीरे-धीरे हम गांव की ओर बढ़ रहे थे. एक फैमिली को आते देख फोटो क्लिक करने की इच्छा हुई. लेकिन, बिना इजाजत के आप यहां के लोगों की फोटो नहीं ले सकते. उन्हें आप टच भी नहीं कर सकते हैं. उनके साथ आ रहा बच्चा बेहद प्यारा दिख रहा था. उनके गालों पर लग रहा था किसी ने कटा हुआ तरबूज रख दिया है. फैमिली से इजाजत लेने के बाद हमलोगों ने कई फोटोज क्लिक किए.

जिंदगी की जदोजहद्

चरस बेचते लोग

मलाना के बारे में जो रिसर्च किया गया था. उसके मुताबिक ग्रामीणों से दूरी बनाए हुए थे. चढाई के दौरान भई सतर्क हो जाते थे. ग्रामीणों को पहले से रास्ता दे देते थे. लेकिन, सच्चाई इससे कुछ अलग था. बदलते हुए दौर में टूरिस्ट इनके लिए भी आमदनी के रिसोर्स हैं. बुजुर्ग लोग भले ही दूरी बनाना चाहते हैं. लेकिन नई पीढ़ि इससे बिल्कुल अलग है. वो खुद अलग भाषा में बात करते हैं. लेकिन, टूरिस्ट से हिंदी और अंग्रेजी में बात कर लेते हैं. गांव तक चढाई के दौरान यहां के ग्रामीण मलाना क्रीम बेचते दिखे. बाहरी लोगों को देख वे इसे निकालकर कीमत बताने लगे. मलाना वासियों को लगता है कि बाहर से आनेवाला हर टूरिस्ट चरस के लिए यहां आता है. इसमें काफी हद क सच्चाई भी है. बच्चों से लेकर बुजुर्ग महिलाएं तक मलाना क्रीम बेचती दिखती है.

खास तरह की टोपी पहनने के शौकिन

 अंतिम छोड़ पर गेस्ट हाउस

आधा रास्ता तय करने के बाद हम काफी थक चुके थे. तभी एक दुकान दिखी. यहां आकर कुछ देर आराम किया. इस दुकान में चाय, बिस्किट के साथ नूडल्स भी मिलता है. लेकिन, कीमतें काफी ज्यादा है. अब, इतनी ऊंचाई पर घनघोर जंगल के बीच कोई दुकान लगाया है. ऐसे में कीमत तो बनती ही है. करीब दो घंटे चलने के बाद हम गांव के बॉर्डर तक पहुंच चुके थे. यहां कुछ देर तक बैठने के बाद गेस्ट  हाउस वाले को फोन लगाया. उसने बताया कि गांव के अंतिम छोड़ पर आना है. ये सुनकर हमारी थकान और बढ़ गई. अब बर्फ भी दिखने लगा था. सूरज की रोशनी मनें बर्फ की वजह से पहाड़ी चमक रहा था. कई और टूरिस्ट गांव से निकलते दिख रहे थे. वो थम्सअप दिखाकर हमें आगे बढ़ने को मोटीवेट कर रहे थे.

सबसे ऊंचाई पर गेस्ट हाउस

गूगल की कई बातें गलत

आखिरकार हम गांव तक पहुंच ही गए थे. गांव के भीतर किसी तरह की सड़क नहीं थी. सभी घर लकड़ी के बने हुए थे. हालांकि, लकड़ी और सीमेंट के बने हुए भी कई घऱ दिखे. पूरे गांव  में मुश्किल से 30 घर होंगे. बारिश की वजह से कीचड़ भी भरा हुआ था. बीच गांव में पहुंचकर हमलोगों ने गेस्ट हाउस का पता पूछा. यहां के लोग आपस में अपनी भाषा का इस्तेमाल करते हैं. लेकिन, हिंदी भी समझते हैं. अंग्रेजी की थोड़ी-बहुत समझ है. खैर, कुछ देर तक फोटोग्राफी का आनंद उठाया गया. लोकल लोगों के साथ भी तस्वीरें उतारी गई. इस दौरान कई संशय़ दूर हुआ. जो इस गांव के बारे में गूगल पर पढ़ रखी थी.  

लकड़ी का आशियाना

बर्फबारी की शुरुआत

इस बीच हल्की-हल्की बर्फबारी भी होने लगी थी. मौसम सुहाना हो गया था. पहली बार बर्फबारी को देख मुझे बेहद खुशी हो रही थी. अब गेस्ट हाउस दिखने लगा था. वो बिल्कुल ऊपर पहाड़ी के अंतिम छोड़ पर था. अब तक हमलोग थक कर चूर हो गए थे. किसी तरह गेस्ट हाऊस तक पहुंचे. कुछ ही देर में पता चल गया कि होटल के मालिक बड़े ही जिंदादिल इंसान हैं. वो कुल्लू के पास भुंतर के रहनेवाले हैं. लेकिन, पत्नी के साथ मलाना में गेस्ट हाउस चलाते हैं. उन्होंने तुरंत कमरा दिखाया और आराम करने को कहा…

अगली कड़ी में पढ़ें गूगल बाबा की जानकारी से अलग है मलाना

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PART8: डर के आगे जीत है, इसको जेहन में रख पहुंच गए #MALANA

PART7: पार्वती नदी किनारे बसी इजराइलियों की बस्ती

PART5: एडवेंचर के शौकिनों को शिमला नहीं कुफरी से है मुहब्बत

PART4: हिमाचली संस्कृति से हुआ रूबरू

PART2: मॉल रोड के अलावा भी शिमला में काफी कुछ है…

PART1: हिमाचल की यात्रा ने एक पत्रकार को घुमक्कड़ बना दिया

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