हिमाचल प्रदेश हमेशा से घूमने वाले लोगों को रिझाता रहा है। इस प्रदेश में अपनी ओर खींचने की जबरदस्त ताकत है। मुझे भी बचपन से घुमक्ककड़ बनने की आदत नहीं थी। लेकिन, धीरे धीरे इसमें मजा आने लगा। खुद के देश को देखने की इच्छा हावी हो रही थी। दैनिक भास्कर में काम करने के दौरान हिमाचल के छोटे से गांव मलाना के बारे में स्टोरी की थी। स्टोरी का मतलब कट, कापी, पेस्ट…। बचा-खुचा अनुवाद। तभी से इस गांव को देखने की इच्छा हो रही थी।

बैग उठा निकल पड़ा शिमला की ओर
दिल्ली से प्लान बनाया मलाना का। इंटरनेट के जरिए कई जानकारियां हासिल कर ली थी। लेकिन, ट्रेवलर के तौर पर हमेशा इंटरनेट पर भरोसा नहीं करना चाहिए। कई जानकारियां इंरनेट पर नहीं मिलती है। खैर, मलाना जाने के लिए मैं तैयार हो गया। दिल्ली से पहले शिमला जाना था। वहां, एक दिन घूमने के बाद मलाना की ओर निकलना था। हिमाचल की ये पहली यात्रा थी। शायद. पहाड़ी ेत्रों की भी पहली यात्रा । सबसे खास बात थी कि इस बार अकेले ही मै यात्रा पर निकल पड़ा था। अक्सर, दोस्तों के साथ शहरों की सैर किया करता था। फाइनली,नोएडा छोड़कर मैं शिमला के लिए बस पकड़ने आईबीटी पहुंच गया। यहां से अंतिम बस द बजे खुलनेवाली थी। इसी में सफर करना मुछे ज्यादा सही लगा। क्योंकि, मुझे लग रहा था कि इससे सुबह 6 से 8 बजे तक शिमला पहुंचुंगा। बस में बैठे अधिकांश लोग बर्फबारी देखने के लिए जा रहे थे। मैंने भी तो बर्फबारी अब तक फिल्मों में हीदेखी थी। यही सोचकर, रोमांचित हो रहा था।

हिल स्टेशन का हुआ एहसास
कुछ देर तक बस में सोशल साइट्स पर लगा रहा। फिर, ठंड की वजह से कंबल डालकर सोने की कोशिश करने लगा। कुछ ही देर में नींद आ गई। कंडक्टर की आवाज सुनककर सुबह नींद खुली। बस शिमला पहुंच चुकी थी। लैकिन, बताए हुए समय से काफी पहले। सुबह के चार बज रहे थे. चारों ओर घूप अंधेरा आय़ाा हुआ था। बससे उतरते ही ठंडक महसूस होने लगी। हवा में अजीब सी ठिठुरन थी। बस स्टैंड में नजर उठाने पर केवल लंबे-लंबे पेड़ दिख रहे थे। बसे से उतरे कई लोग होटल बुक कर चुके थे। मुझे अपने जाननवाले रिपोर्टर को कॉल करनी थी। लेकिन, इतनी सुबह बात करना मुझे उचित नहीं लग रहा था। स्टैंड में ठंड भी हिल स्टेशन से रूबरू करा रहा था। पहली बार ऐसी हवाओं का एहसास हो रहा था। किसी तरह 2 घंटे स्टैंड में घूम-फिरकर निकाला। उजाला होते ही मैंने अपने जाननेवाले शख्स को फोन लगाया।उन्होंने मुझे बस से छोटा शिमला आने को कहा। यहां से उनका घर नजदीक था। बस पकड़ने के साथ हिल स्टेशन की खूबसूरती दिखने लगी थी। मैं तो सीट पर बैठा ही नहीं। खिड़की के खिनारे खड़ा होकर ओल्ड बस स्टैंड पहुंचा। चारों ओर से पहाड़ी पर बसे इस शहर की खूबसूरती गजब की है। छोटे-छोटे लकड़ी के घर देखने में काफी आकर्षक लग रहे थे। घउमावदार सड़कों पर बसों से का चलना मुझे काफई अच्छा लग रहा था। अक्सर, पर्यटक घूमने के लिए जब भी कोई नया शहर जाते हैं। वहां के प्रसिद्ध लोकेशन को ही केवल देख पाते हैं।

बस स्टैंड से पहुंचा छोटा शिमला
अगर, कोई शहर में आपका जाननेवाला है। उसके साथ आप अच्छे तरीके से नई जगह को जान पाएंगे। खैर. छोड़िए। मैं ओल्ड बस स्टैंड से दूसरी बस पकड़कर छोटा शिमला पहुंच गया। दरअसल, छोटा शिमला यहां का पुराना इलाका है। कई सरकारी दफ्तर यहीं बने हुए हैं। छोटा शिमला पहुंचकर पैदल ही मेजबान के घर पहुंचना था। मै पहाड़ियों को देखते हुए धीरे धीरे चलने लगा। लोकेशन तो नजदीक बताया जा रहा था। लेकिन, पहाड़ी की वजह से मेरे लिए वो काफी दूर था। करीब आधे घंटे तक चलने के बाद मेजबान से मुलाकात हुई। उनसे ये पहली मुलाकात थी। इससे पहले काम के सिलसिले में बातचीत होती थी। लेकिन, ऐसा एहसास नहीं हुआ कि ये पहली मुलाकात है। बड़े ही गर्मजोशी से उन्होंने स्वागत किया। अब एक पहाड़ी से उतरनेके बाद दूसरी पहाड़ी पर चढना था। वो दूर से ही घर दिखा रहे थे। लेकिन, मेरा दम फुलने लगा था। इस वक्त महसूस कर सका कि पहगाडियों की जिंदगी कितनी मुश्किल भरी होती है। उनमें गजब का आत्मविश्वास और मुसीबतों से लड़ने की ताकत होती है।पीठ पर लदे हुए बैग को लेकर योगी जी के घर पर पहुंचा। दरअसल, योगी उनका निक नेम है। ऑफिशियल नाम योगराज शर्मा है। इनकेो साथ एक कहावत सही बैठता है। जैसा नाम वैसा काम। वे एकदम योगी की तरह बात करते हैं। किसी मेहमान का वेलकम करते हैं। घर पहुंचते ही राहत मिली। कुछ देर तकआराम करने के बाद कमरे से बाहर निकला।

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