चार राज्यों की सीमाओं को छूनेवाली बेहद नैसर्गिक खूबसूरती को समेटे हुए पापीकोंडालू यात्रा की ये अंतिम कड़ी है. अब तक आप बैंबू चीकेन के टेस्ट से रूबरू हो चुके हैं. साथ ही अनगिनत तारों के नीचे बैंबू टेंट में बीती रात की कहानी भी जान चुके हैं. अब पढ़ें पापीकोंडालू में ट्रैकिंग और वापसी का सफर.

हर सुबह ऐसी हो
कोलूर गांव से कुछ ही दूरी पर छत्तीसगढ़ शुरू हो जाता है तो दूसरी तरफ जंगल में घुसते ही ओडिशा की सीमा लगती है. वहीं, गोदावरी नदी आंध्रप्रदेश और तेलंगाना के बीच सीमांकन करती है. उजाला होते ही टेंट में नींद खुल जाती है. चारों ओर अजीब सी शांति पसरी हुई है. रह-रह कर जंगली चिड़ियों का चहचहाना अलसायी नींद को तोड़ देती है. आंख मलते हुए मैं टेंट से बाहर निकलता हूं. नजारा देखकर हैरान रह जाता हूं. ऐसी खूबसूरत सुबह मैंने बहुत ही कम देखी थी. सामने शांत होकर गोदावरी बह रही है. उस तरफ हर-भरी पापी श्रंखलाओं की पहाड़ियों को बादल पूरी तरह से घेर रही है. लग रहा है दोनों आपस में लुका-छिपी खेल रहे हैं. कभी बादल पहाड़ से नीचे गिरते हुए दिखती है तो कभी उससे काफी ऊपर चली जाती है. इस बीच बड़ी संख्या में मोर दिखाई देते हैं. उनकी आवाज पूरे जंगल में गूंजने लगती है. चूंकि मेरा टेंट सबसे अंतिम किनारे पर था. इस वजह से खूबसूरती का दीदार मैं ज्यादा कर रहा था.

काफी देर तक एक टक होकर पहाड़ों की ओर निहारने के बाद मैं मोबाइल लेकर कुछ तस्वीरें उतारने लगा. फिर, अकेले ही नदी की ओर बढ चला. सभी बैंबू टेंट को पार करके सबसे पहले पहाड़ी से उतरकर नदी के पास पहुंचा. तब तक सूर्योदय का समय हो गया था. पहाड़ों के पीछे से सूरज आसमान में ऊपर चढ़ रहा था. उनकी किरणें सबसे पहले गोदावरी नदी में दिख रही थी. लग रहा था पानी के अंदर किसी ने लालिमा का निशान बना दिया हुआ हो. जब कभी नदी में हलचल होती तो किरणें तैरती हुई प्रतीत होती. पापीकोंडालू में इस दृश्य को देखकर मुझे बेहद खुशी हो रही थी. हल्की-हल्की हवा शरीर में कंपन करा रही थी. तभी दूर नदी में पूरी रात जाल फेंकने के बाद इंतजार कर रहे मछुआरों की टोली नाव से आती दिखी. तीन ओर पहाड़ियां. सुबह का समय. बीच गोदावरी में आती नाव पर पड़ती सूर्योदय की रोशनी.इस दृश्य को मैं शब्दों में उतार नहीं पा रहा हूं. इसकी खूबसूरती आज भी मुझे हर बार पापीकोंडालू जाने को मजबूर करती है.

नदी किनारे शांत होकर मैं प्रकृति की ओर देख रहा था. तभी इस यात्रा के साथी चंदन जी भी आ गए. वे भी यहां से दिख रही खूबसूरती के मुरीद हो गए. इसके बाद हमने फोटोबाजी शुरू कर दी. करीब 1 घंटे तक किनारे आ गई नाव के पास फोटो खींचाते रहे. तभी याद आया कि चाय का वक्त हो चला है. समय से नहीं पहुंचा तो दोबारा नहीं मिलेगी. दोनों वापस गेस्ट हाउस में लगे टेंट की ओर चल पड़े. फ्रेश होने के बाद हमने चाय और बिस्किट का लुत्फ उठाया. इसके बाद गोदावरी नदी के पास दो महिलाएं मछली मारते हुए दिखीं. पहाड़ के बिल्कुल नीचे चट्टान के पास बैठकर वो बंसी नदी में फेंकी हुई थीं. दूर से देखने में ये दृष्य बड़ा आनंदित कर देनेवाला दिख रहा था. हालांकि, उस लोकेशन तक पहुंचना खतरे से खाली नहीं था. चट्टानों से होकर करीब आधा किलोमीटर तक का सफर तय करके वहां पहुंचा जा सकता है. लेकिन, नदी किनारे से चलने पर ज्यादा मुश्किल है. वहां का रास्ता दलदल जैसा हो गया है. मेरे साथी ने वहां तक जाने से मना किया. फिर भी मैं वहां के लिए निकल पड़ा. सबसे पहले एक मजबूत सहारे की जरूरत थी. जी हां, जंगल से एक लाठी निकाली गई. सबसे पहले आगे लाठी रख रहा था. फिर कदम बढ़ा रहा था. दो चट्टानों के बीच के गड्ढों में लाठी को फंसाकर कभी-कभी आगे जंप भी करना पड़ रहा था. इस तरह आधा रास्ता तय कर चुके थे. अब पहाड़ की तलहट्टी तक नदी के किनारे पहुंचना था. यहां फिसलन ज्यादा थी. एक-दो बार पैर भी फिसला. फिर जूते को हाथ में रख लेना बेहतर आइडिया लगा. अब एक हाथ में लाठी. दूसरे में जूता और धीरे-धीरे नीचे उतर गया.

वाह! क्या दृश्य है. अद्भुत! पहली आवाज यही निकली. मछली निकाल रही महिलाएं हिंदी बिल्कुल नहीं समझ रही थी. फिर आपका यायावर हमेशा की तरह भाव से बातचीत करने लगा. सबसे पहले तो नदी में पैर धोया गया. फिर कुछ देर तक एकटक होकर नदी और पहाड़ को देखते रहे. गजब की शांति मिल रही थी. तभी मछली पकड़ने का आइडिया आया. महिला को इशारों से समझाकर उनसे बंसी ली गई. फिर नदी में बंसी को फेंका गया. लेकिन, कोशिश असफल रही. बार-बार असफलता हाथ लग रही थी. इसे देखकर दोनों महिलाएं मुस्कुरा रही थीं. आखिरकार मैंने बंसी उन्हें थमा दिया. करीब 1 घंटे तक गोदावरी किनारे पहाड़ की तलहट्टी में खोया रहा. तभी दूर से आवाज आई. ये आवाज साथी चंदन जी की थी. वे दूर में ही बैठे थे. उन्होंने चलने का इशारा किया. क्योंकि, अभी हमलोगों को ट्रैकिंग पर भी निकलना था. साथी ही लंच के बाद पापीकोंडालू से विदा लेना था.

अब ट्रैकिंग के लिए हमलोगों को दूसरी तरफ जाना था. गेस्ट हाउस की तरफ से गांव की ओर बढना था. उस ओर जंगल ज्यादा था. दोनों साथ में ट्रैकिंग के लिए निकल पड़े. एक तरफ जंगल. दूसरी तरफ गोदावरी नदी. बीच में पगदंडी वाले निशान पर हमलोग चल रहे थे.बारिश की वजह से जंगल पूरी तरह से हरिया गई थी. चौड़े-चौड़े पत्तेवाले पेड़ बेहद खूबसूरत नजर आ रहे थे.करीब 3 किमी तक जंगल में आगे बढ़ते गए. काफी थक जाने पर बगल में बह रही गोदाबरी के पास जाने का निर्णय लिया. सोचा किनारे बैठकर कलकल करती नदी की संगीत से थकान को मिटाया जाए. बस अब देर किस बात की? नदी की ओर हमलोग उतरने लगे. चट्टानों के बीच गुजरते हुए गोदाबरी के पास पहुंच गए. फिर नदी के बीच हल्की निकली चट्टान पर बैठकर ऐसा लगा मानो प्रकृति की गोद में कोई स्नेह से सुला रहा हो. यकीनन यहां थकान तोे मिट ही चुकी थी, लेकिन इसका खूबसूरत और अलौलिक एहसास हसेशा-हमेशा के लिए दिल में घर कर चुकी थी.

करीब दोे घंटे के बाद वापस गेस्ट हाउस बैंबू टेंट के पास पहुंच चुके थे. अब पापीकोंडालू से विदा लेने का वक्त आ गया था. लंच के बाद हमलोग स्टीमर के पास पहुंच चुके थे. कुछ ही देर में स्टीमर खुल चुकी थी. अब आंखों में पापीकोंडालू की हसीन वादियां तैर रही थी. यायावरी में यही एहसास तो जीवन का आनंद है. यायावर नए आशियाने की तलाश में निकल चुका है. आपके लिए दूसरी कहानी की रचना के लिए… लेकिन आनंद कहानियों की रचनाओं में नहीं, आइये कभी तो घूमिए और आप भी लुत्फ उठाइये प्रकृति की इस शानदार रचना का…यायावरी का अगला पड़ाव जल्द ही…तब तक के लिए मस्त रहिए…खुश रहिए…अलविदा…
