ऑफिस में कीबोर्ड पर उंगलियां तो उसी स्पीड में चल रही थी. लेकिन, पिछले कुछ दिनों से मन में अजीब सी बेचैनी महसूस कर रहा था. रह-रहकर लग रहा था कि कोई मुझसे पूछ रहा है. क्या कर रहे हो तुम. क्या करना है तुम्हें. तभी सोच लिया अब निकल पड़ना है किसी नई दिशा की ओर. किसी नई जगह की खोज में. तभी इस बेचैनी से निजात मिलेगी और दिल को ठंडक पहुंचेगी. फिर काम करते-करते अगली यात्रा की प्लानिंग कर ली. अब आज रात को ही निकल जाऊंगा.

किसका श्रंगार करती है मॉनसून
मौसम मॉनसून का हो तो वॉटरफॉल देखने का आनंद ही कुछ और होता है. झरने नई नवेली दुल्हन की तरह होती है. मॉनसून ही इनका श्रंगार है. और इस खूबसूरत यौवन को देखने के लिए हैदराबाद से करीब 270 किमी की दूरी पर स्थित अदिलाबाद जिला पहुंचना था. #KUNTALA, #POCHERA #GAYATRI यहां के मशहूर #WATERFALL हैं. जहां साउथ की कई फिल्मों की शूटिंग भी हो चुकी है.

बिरयानी तो जरूरी है
प्लानिंग के मुताबिक रात 9 बजे तिरुपति एक्सप्रेस से निकलना था. लिहाजा, सीधे ऑफिस से अपने सहयोगी विकर्ण के पास पहुंचे. क्योंकि इस यात्रा के साथी वह भी थे. वो पहले से ही हिदायत दे चुके थे कि आपकी अगली यात्रा में मेरा भी साथ होगा. अब यायावर को इससे क्या. कोई भी साथ चल सकता है. फिर दोनों कुछ जरूरी सामान लेकर निकल पड़े बस स्टैंड की ओर. यहां पहुंचकर समय देखा तो सात 8 चुके थे. स्टेशन पहुंचने में एक घंटे का समय लगता. फिर तुरंत ट्रेन पकड़नी भी थी. तो फिर भोजन का क्या होगा. ये तो बेहद जरूरी है. तभी ख्याल आया हैदराबाद में बिरयानी से बेहतर क्या हो सकता है. पास के ही एक दुकान से चिकेन बिरयानी पैक करा लिया गया. फिर बस में सवार हो गए.

‘मरता क्या नहीं करता’
अब सफर की शुरुआत हुई. बस में ही बातचीत का दौर शुरू हुआ. यूं तो हम दोनों कई महीनों से एक ही डेस्क पर काम कर रहे थे. लेकिन, कहा जाता है ना कि किसी को जानने के लिए समय देना पड़ता है. तो बस की एक घंटे की यात्रा के दौरान विकर्ण ने खुद के बारे में काफी बातें बताई. कुछ न्यूज को लेकर, कुछ लोगों को लेकर और कुछ पारिवारिक बातें भी हो गई. हमलोग कब स्टेशन पहुंच गए. पता ही नहीं चला. खैर, ट्रेन राइट टाइम थी. और हम भी राइट टाइम पहुंचे थे. इस बार अपन ने एसी चेयर में बुकिंग कराई थी. ऐसा कोई इरादा नहीं था. लेकिन, यायावर को स्लिपर में सीट ही नहीं मिली. तो फिर मरता क्या नहीं करता. अभी ट्रेन खुलने में 20 मिनट का समय था. बिरयानी निपटाने का इससे अच्छा वक्त नहीं हो सकता था. ओह, क्या बिरयानी का स्वाद था. उम्मीद से बढ़कर. दोनों ने भरपेट. कहा जाए तो गला तक चिकेन बिरयानी को भर दिया. अब करना क्या था. जाकर एसी चेयर कार में अपनी सीट पर जम गए.

जब पहुंचा अदिलाबाद
कुछ ही देर में बिरयानी का असर दिखने लगा. नींद की वजह से झपकियां लेने लगे. बोगी में लोग ज्यादा नहीं थे. आधी से ज्यादा सीटें खाली थीं. जब आधी रात में नींद खुली तो देखा विकर्ण महोदय तीन कुर्सी को बिस्तर बना चुके थे. अब, मैं कहां देर करनेवाला था. उन्हीं का अनुसरण करते हुए लेट गया. सुबह नींद खुली तो पता चला कि ट्रेन गंतव्य पर पहुंच चुकी है. बाहर निकला तो सूर्योदय में भी अभी वक्त था. हल्की-हल्की हवा चल रही थी. नया स्टेशन, नई जगह, नए लोगों को देखकर अच्छा महसूस हो रहा था. हमलोग हैदराबाद जैसे शहर से निकलकर तेलंगाना के एक छोटे से जिले में थे. स्टेशन से बाहर आकर हमेशा की तरह कुछ तस्वीरें उतारी गई. फिर सामने ही सुलभ शौचालय की सुविधा का लाभ उठाया गया. अब असली यात्रा शुरू होनेवाली थी. रेलवे स्टेशन से ऑटो में सवार हुआ और अदिलाबाद बस स्टैंड पहुंच गया.

बस की सवारी
बस स्टैंड पहुंचते ही #KUNTALA के लिए बस मिल गई. अब, दोनों असली लक्ष्य की ओर निकले थे. बताया गया था कि बस से हाइवे पर #NEREDIGONDA उतर जाना है. फिर किसी दूसरी गाड़ी से वॉटरफॉल तक जाना होगा. शहर छोड़ते ही बस की खिड़कियों से आनेवाली हवा तन और मन को तरोताजां कर रही थी. फोरलेन हाइवे के दोनों तरफ भरपूर हरियाली थी. दूर में पहाड़ों की कई श्रंखला दिख रही थी. जो आपस में एकदूसरे से प्रतिस्पर्धा करती प्रतीत हो रही थी. एक दिन पहले ही इस इलाके में बारिश हुई थी. इसका भी असर दिख रहा था. सबसे बढ़ियां तेलंगाना के ग्रामीण इलाकों की संस्कृति को जान कर लग रहा था. अगर आप किसी भी राज्य में उसके जिलों और कस्बों की यात्रा लोकल बसों से करेंगे तभी उस स्थान को समझने में मदद मिलेगी. आप असली भारत से रूबरू होंगे.

नई जगह की महक
करीब एक घंटे की बस यात्रा के बाद #NEREDIGONDA उतर गए. इसे शहर तो नहीं कह सकते. लेकिन, आस-पास के कई गांव के लोग जरूरी सामान के लिए यहां आते हैं. सुबह के करीब आठ बज रहे होंगे. दुकानों से शटर उठनी शुरू हो गई थी. कुछ झोपड़ियों से सोंधी दूध की महक आ रही थी. वहां चाय बनने की तैयारी हो रही थी. चाय की भी अलग पहचान होती है. हर शहर की चाय का टेस्ट एक जैसा नहीं होता. इसके स्वाद से भी किसी नए शहर से आपका लगाव होता है. खैर, चाय की चुस्की से तो हम दूर रहें. सोचें, क्यों न नाश्ता ही कर लिया जाए. सामने की ओर दिख रही एक गली में बढ़ गए. कुछ दूर आगे जाने पर एक महिला बड़ी ही तल्लीनता से डोसा बनाती दिखी. तुरंत वहां रूका और दो डोसा ऑर्डर कर दिया. क्या बताऊं. लाजवाब डोसा. और चटनी के तो क्या कहने. नाश्ता का लुत्फ उठाकर हमलोग अपने लक्ष्य की ओर निकले.

कुछ फैसले अच्छे होते हैं
हाइवे पर पहुंचे तो पता चला कि पब्लिक गाड़ी तो 10 बजे के बाद ही #KUNTALA की ओर जाती है. हमलोगों के पास तो समय कम . घुमना ज्यादा है. लिहाजा ऑटो रिजर्व करना ज्यादा बेहतर समझा. लेकिन, इतनी सुबह कोई ऑटो भी नजर नहीं आया. एक दुकानदार से बात की तो उसने कॉल करके एक शख्स को ऑटो के साथ भेजा. अब शुरू हुआ मोलभाव की बातें. उसकी मांग थी 500 की. हमलोगों को इतना ज्यादा लग रहा था. उसे #KUNTALA और #POCHERA वॉटरफॉल दोनों घुमाना था. काफी देर तक बातचीत के बाद हमलोगों ने ऑटो बुक कर लिया. और यह हमारी यात्रा का सबसे उपयोगी निर्णय साबित हुआ. क्योंकि ऑटोवाले भाई साहब बड़े ही निराला अंदाज के थे. मजाकिया तो भरपूर. मतलब उन्होंने #KUNTALA और #POCHERA वॉटरफॉल की यात्रा को और भी यादगार बना दिया….

अब अगली कड़ी में पढ़ें #KUNTALA और #POCHERA वॉटरफॉल की नैसर्गिक खूबसूरती के बारे में…साथ ही नो एंट्री के बावजूद वॉटरफॉल तक पहुंचने की कैसी रही रोमांचक यात्रा
