पहाड़ की चोटी पर, खुले आसमान के नीचे, हवाओं से बातें करते हुए जो महसूस होता है, वो अहसास अद्भुत है। उस अहसास को शब्दों में बयान कर पाना बहुत मुश्किल है। लेकिन फिर भी लिख रहा हूं।

मन को मिलती है शांति
इस भागती-दौड़ती जिंदगी में सुकून के कुछ पल की तलाश में अक्सर मैं इस पहाड़ पर चला आता हूं। यहां आना अच्छा लगता है। यहां आकर समय बिताना सुकून देता है। शहर से दूर, प्रकृति की गोद में, न कोई शोर-शराबा, यहां के एकांत में मन को शांति मिलती है।

चट्टानों की भी आजादी होती है
ऐसे ही एक शाम मैं अपने मित्र @Santosh_Shahi के साथ यहां चला आया। अपने बैठने के निश्चित स्थान से अलग हमने पहाड़ के दूसरी तरफ जाने का निश्चय किया। पहाड़ पर बनी पग डंडियों से होते हुए झाड़ियों को पार करते हुए हमें खुली चट्टानें नजर आई। यहां पता चला कि इनकी भी आजादी होती है। चट्टान भी ऊंघते हैं। और आसमां से पूछते हैं। दोस्त बता तुमसे मिलन कब होगी। और तेज हवा जब इनसे आकर टकराती है तो ये मुस्कुराते हुए कहते हैं. तू कितना भी जोर लगा ले मैं तो सत्य हूं. अकाट्य हूं. अपनी जगह से हटूंगा नहीं.

नजारे हमें याद रहेंगे
छोटी-बड़ी चट्टानों को पार कर जब हम ऊपर पहुंचे तो प्रकृति के विहंगम दृश्य को देखकर स्तब्ध रह गए। क्या नजारा था। ऐसा दृश्य जिसे आप देख सकते हैं, महसूस कर सकते हैं पर बयान नहीं कर सकते। हम कुछ देर वहीं बैठे रहे। दोनों लोग अपने-आप में खोए रहे। कभी आसमान तो कभी सामने जमीन की ओर खाई देख भय नहीं आनंद आ रहा था.

सेल्फी नहीं लेना, बड़ा मुश्किल निर्णय
थोड़ी देर बाद चुप्पी को तोड़ते हुए शाही जी ने मुझे पहाड़ का आखिरी सिरा दिखाया। उन्होंने वहां तक जाने का आग्रह किया, लेकिन मैंने मना कर दिया। वहां तक पहुंचना बहुत जोखिम भरा था। खतरे को भांपते हुए मैंने, उन्हें भी वहां जाने से मना कर दिया। उस स्थान पर जाने को लेकर हम दोनों में थोड़ा-बहुत वाद-विवाद भी हुआ। लेकिन उनके उत्साह के सामने मैं हार मान गया और जाने को तैयार हो गया। सबसे पहले हमने वहां तक पहुंचने का रास्ता तय किया और सुरक्षा की दृष्टि से इस बात का पूरा ध्यान रखा की हम जोश में आकर ऐसा कुछ नहीं करेंगे जिससे हमारी जान पर बन आए। खास करके सेल्फी तो कतई नहीं लेंगे।

डर के आगे जीत है…
इन बातों को ध्यान में रखते हुए हम आगे बढ़े। टेढ़े-मेढ़े, ऊंची-नीची चट्टानों को पार कर हम पहाड़ी के अंतिम छोर पर जा पहुंचे। तस्वीर में जो जगह आपको दिख रही है वही पहाड़ का अंतिम छोर है। वहां पहुंचना एक जादुई अहसास था। अपने अंदर के डर को हरा कर हम वहां पहुंचे। जमीन से सैकड़ों फीट ऊपर, आसमान के करीब, तेज हवाओं के बीच, उस जगह पर मैं अपने दिल की धड़कने सुन रहा था। आंखों को बंद किए, हाथ हवा में फैलाए मैं उस पल को महसूस कर रहा था जिसमें कई सारे भाव थे। उस एक पल में हार का दुःख था तो जीतने की खुशी भी। गिरने का डर था तो वहां तक पहुंचने का साहस भी। उस एक पल में, मैं शायद मैं था।
कैसे पहुंचे…
हैदराबाद से 35 किमी की दूरी पर सांघी टेंपल है.
यहां से रिंग रोड की तरफ बढ़ने पर कई पहाड़ियां दिखती है.
इन्हीं पहाड़ियों में से एक की चोटी से खूबसूरत नजारा है.
