जिंदगी… रास्ता ही बदल देती है और आप खुद को कहीं और ही पाते हैं. एक साल पहले जब हैदराबाद आ रहा था तो एक साथ कई डर मन में पनप रहा था पहला ये कि दिल्ली छोड़कर दक्षिण भारत जा रहा हूं कैसे रह पाऊंगा. ना कोई जान न पहचान बैग उठाया पास में टिकट लिया और चल दिया.

यायावरी को महसूस करो
घूमने का शौक बचपन से था और रवीश कुमार के ब्लॉग की पंच लाइन दिमाग में फिट हो गया था कि शौक ए दीदार अगर है तो नज़र पैदा कर. सो मैंने भी रमता योगी बहता पानी की तरह यायावरी के अस्तित्व को स्वीकार कर लिया. अब तो किसी मित्र या सीनियर की एक बात पर कहीं जाने को तैयार हो जाता हूं. किसी भी ऐतिहासिक जगह पर पहुंचकर उसे महसूस करने का अपना मज़ा है और यही तो यायावरी है.

जब हर दिन से ऊबन होने लगी
हुआ यूं कि मेरे दो करीबी साथी अमरीन और चंदन ने कहा बहुत दिन हुए कहीं घूमने चलेंगे क्या? मैं कुछ दिनों से रोज-रोज ऑफिस से घर, घर से ऑफिस के चलते ऊब रहा था सो तुरंत हामी भर दी. ऑफिस पहुंचते ही वहां से निकल लिया. इधर कैब में मेरे साथी इंतज़ार कर रहे थे. कैब में बैठते ही तीनों में एक सहमति बनी कि जी भर कर आज घूमना है. क्योंकि पूरे दिन का समय है. सफर की शुरुआत हुई. हम लोग ऐतिहासिक गोलकुंडा की यात्रा पर निकल चुके थे. हिंदी बिल्कुल कम समझने वाले कैब ड्राइवर भी तेलुगु छोड़ हिंदी गाना लगा दिया था. कम भीड़ वाली हैदराबाद की सड़कों पर कैब 120-30 पर दौड़ रही थी. शहर तेजी से पीछे छूट रहा था. हंसी ठिठोलियों के बीच लगभग डेढ़ घंटे बाद हमलोग गोलकुंडा पहुँच चुके थे. खिली- खिली धूप, देसी और विदेशी पर्यटकों की भीड़ और सामने थी सैकड़ों सालों की विरासत, जीवंत इतिहास यानी गोलकुंडा किला. यकीन कीजिए अंदर घुसते ही नज़र किला के सबसे ऊपरी गुंबद पर टिक गया.

ग्रेनाइट की पहाड़ी पर बना किला
भारत के दक्षिण में कितना कुछ है हमारा इतिहास, हमारी संस्कृति, हमारा धरोहर और भी बहुत कुछ! इसका एहसास मुझे हो रहा था. खैर आते हैं गोलकुंडा पर. इतिहास पर नज़र डालेंगे तो आपको पता चलेगा कि गोलकोंडा कुतब शाही साम्राज्य के मध्यकालीन सल्तनत की राजधानी थी, यह किला हैदराबाद के दक्षिण से 11 किलोमीटर दूरी पर स्थित है. भारत के तेलंगना राज्य के हैदराबाद में बना यह किला काफी प्रसिद्ध है. यह ग्रेनाइट की एक पहाड़ी पर बना है जिसमें कुल आठ दरवाजे है और पत्थर की तीन मील लंबी मजबूत दीवार से घिरा है. असल में यह एक ईंट से बना हुआ किला था जिसका बाद में विस्तार किया गया.

जवां होती प्रेमी कहानियां
इस किले के प्रवेश द्वार पर बजायी गयी ताली को आप आसानी से किले के बाला हिसार रंगमंच में सुन सकते हैं. हालाकि हमने ऐसा नहीं किया आप जाइयेगा तो जरूर कीजिएगा. हम लोग किले के अंदर प्रवेश कर चुके थे. धूप थोड़ी खिली हुई थी. हमने सोचा क्यों न थोड़ी देर बैठा जाए. समय काफी था सो बैठ कर हम सब किले की खूबसूरती निहारने लगे. इस दौरान किले के अंदर कई प्रेम कहनियाँ जवां हो रही थी. प्रेमी जोड़े सुकून से एक दूसरे के साथ वक्त बिता रहे थे. यकीन मानिए ये किले की खूबसूरती में चार चांद लगा रहे थे. आप यहां असहमत हो सकते हैं मुझसे लेकिन सच है अब तक की पीढियों ने ऐसे नायक नायिकाओं के साथ अन्याय ही किया है. लैला-मजनू, सिरी-फरहाद से लेकर जहांगीर और अनारकली तक. पर इस शहर ने ऐसी विरासतों के जरिये ऐसे प्रेम को पनाह दिया है।

नीले आसमान के नीचे 3 दोस्त
खैर चलिए किले की तरफ चलते हैं. घुमाउदार सीढ़ी पर हमलोगों ने किले के सबसे उपरी भाग की तरफ चढ़ना शुरू कर दिया था. धूप तीखी हो चुकी थी पर सेल्फी लेने और फोटो क्लिक करने में धूप की किसको पड़ी थी. लगभग 50 मुद्राओं में फोटो लेते हुए हमलोग किले के सबसे ऊंची चोटी पर पहुंच चुके थे. ऊपर नीला आसमान, नीचे शहर और बीच में हम तीनों. ऊंचाई पर मैं डर रहा था मेरे दोस्त मुझपर हंस रहे थे. एक जगह बैठकर मैं शहर को निहारने लगा. पर ऊंचाई का डर मन से नहीं जा रहा था. यकीन हुआ ऊंचाई से डरना चाहिए. जब आप ऊंचाई पर होंगे तब जमीन पर होने की वास्तविकता का पता लगता है.

जब मन दार्शनिक होने लगा
बहरहाल हम तीनों एक साथ बैठकर शहर की खूबसूरती को निहारने लगे. गोलकुंडा से ऐसा लग रहा था पूरा हैदराबाद देख पा रहा हूं. वाह कितना शानदार नज़ारा था. निज़ाम के इस शहर को, जो दिल में बस चुका है. उसे आखों में बसा लेने का मन हो रहा था. मेरे दोनों साथी भी इसका लुत्फ उठा रहे थे और दार्शनिक अंदाज़ में फोटो भी खिंचा रहे थे.

एकता की मिसाल
एक खूबसूरती और यहां जो आपको अपने देश पर गर्व करने का मौका देगा. हिन्दू मुस्लिम एकता की अद्भुत मिसाल भी देखने को मिलेगी आपको. सबसे ऊपरी चोटी पर काली मंदिर भी है. आने वाले लोग इस मंदिर को भी जरूर देखते हैं. यही तो इस मुल्क की खूबसूरती है. मिसाल है हमारे गंगा जमुनी तहजीब की.

चिकन-बिरयानी पर टूट पड़े
दो घंटे ऊपर रहने के बाद हमलोग नीचे आ चुके थे. भूख काफी तेज लगी थी. तीनों नीचे उतरते ही चिकन बिरयानी पर टूट पड़े. यकीन कीजिए फिर से वहां घूमने का मन हो रहा है. आखों में कैद वो तस्वीर अब भी रोमांचित कर रहा है. आइये कभी. घूमिये. महसूस कीजिए. क्योंकि हर शहर अपने में शानदार इतिहास समेटे है. शुक्रिया अमरीन जी और चंदन मिश्रा जी आपके साथ के बिना इस शहर को इतने करीब से महसूस कर पाना संभव नहीं था. पता नहीं कब तक साथ में नौकरी कर पाएंगे लेकिन आप सब की यादें जेहन में हमेशा जिंदा रहेंगी…जब तक हैं साथ हैं…यायावरी जारी रहेगी…अगले पड़ाव का इंतज़ार कीजिए
नोट: शब्दों का तानाबाना बुनने में माहिर और विचारों को हमेशा खुला रखनेवाले पत्रकार आशीष रंजन ने इस यात्रा वृतांत को लिखा है. जनाब बिहार के बेगूसराय से हैं. लिहाजा हर मुद्दे पर तर्कों का ढ़ेर लगाते हैं. फिलहाल ईटीवी भारत में बतौर एंकर बात बना रहे हैं.
