कुछ ही लोग होते हैं, जिन्हें बचपन में भी पढ़ाई का शौक होता है। जिन्हें परिवार के लोग बचपन से ही अलग पहचान देने लगते हैं। ज्यादतर मेरी तरह अनुभवों और जीवन में जिनका धीरे-धीरे पढ़ाई के प्रति लगाव होता है। लेकिन, बचपन की किताबों में कुछ कहानियां और कविताएं ऐसी होती है, जो पुस्तकों के प्रति आपका लगाव बढ़ाता है। ऐसी ही लाइन है…पोथी पढ़ी-पढ़ी जग मुआ, पंडित भया न कोई। ढाई आखर प्रेम के, पढ़ै सो पंडित होय। कबीर की ऐसी ही न जाने कितनी कविताएं हैं, जिनकी कुछ लाइन आपको याद करने की जरूरत नहीं होती है। कबीर को जानने और समझने के चक्कर में ही मैं मगहर की यात्रा कर आया। मगहर जहां कबीर ने अंतिम सांसें ली थी, जहां उन्होंने शऱीर का त्याग किया था। देश की यह एकमात्र ऐसी जगह है, जहां एक ही कैंपस में समाधि भी है और मजार भी।

महापरिनिर्वाण स्थल के तौर पर भी मिल रही पहचान
आमी नदी के किनारे बसा मगहर की यात्रा पर मैं बाइक से ही था। अयोध्या से मगहर की ओर निकला था। संयोग इतना अच्छा कि सूर्यास्त से पहले मैं मगहर की धरती पर पहुंच गया था। यात्राओं के अनुभवों से मैं अक्सर कहता हूं कि किसी भी स्थान को जानना है, समझना है तो वहां का सूर्योदय और सूर्यास्त जरूर देखें। टूरिज्म के तौर पर मगहर को अभी डेवलप किया जा रहा है। गोरखपुर मुख्य हाइवे पर ही ‘कबीर की धऱती मगहर में आपका स्वागत है’ जैसा साइन बोर्ड दिख जाता है। यही बोर्ड देखकर मैं बाइक की स्पीड कम कर दिया और मगहर में कबीर स्थली की ओर चल पड़ा। हाइवे से करीब दो किमी की दूरी तय करने पर कबीर स्थली का बोर्ड दिख जाता है। काफी बड़ा कैंपस लिया गया है। जहां, फिलहाल निर्माण कार्य चल रहा है। बीच में अच्छी सड़कें बनायी गई है, जो चारों ओर से कबीर स्थली तक जाती है। इस कैंपस के एक तरफ आमी नदी बहती है, जिसकी स्थिति दिल्ली की यमुना जैसी ही होती जा रही है। मगहर के बार में कई किवदंतियां हैं। लोगों के बीच कई तरह की जनश्रुतियां है। कोई एक को मानता है तो कोई दूसरे को। कबीर स्थली मगहर को महापरिनिर्वाण स्थल के तौर पर भी प्रचारित किया जा रहा है।

अंतिम समय में पहुंचे थे कबीर
मगहर के बारे में किवदंतियां ही कबीर को भी यहां तक खींच लाई थी। पूरी जिंदगी काशी में गुजारने वाले कबीर जीवन के अंतिम दिनों में मगहर पहुंच गए। कहा जाता है कि लोगों का कहना था कि काशी में मौत होने पर लोगों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। जबकि, मगहर एक अपवित्र जगह है। यहां मौत होने पर लोग नरक जाते हैं। साथ ही अगले जन्म में गधा बनते हैं। हालांकि, इस बारे में किसी तरह का साक्ष्य नहीं है। लोगों का मानना है कि इसी सोच को खत्म करने के लिए कबीर यहां पहुंचे थे। उन्होंने अंतिम सांसें यहीं ली। लोगों को संदेश दिया कि मगहर किसी तरह से अपवित्र जगह नहीं है। इस स्थान के बारे में कबीर लिखते हैं कि ‘क्या काशी क्या ऊसर मगहर, राम हृदय बस मोरा जो कासी तन तजै कबीरा, रामे कौन निहोरा’ कबिरपंथियों के लिए मसगर पवित्र स्थान है। कबीर के अनुयायी यहां हर साल जनवरी में मंकर संक्राति के मौके पर मसगर महोत्सव का आयोजन करते हैं। यहां दूर-दूर से कबीर को मानने वाले पहुंचते हैं और कबीर के कविताओं और उनके संदेशों को सुनाया भी जाता है।

कबीर के देहावसान पर भी लोककथाएं
सोलहवीं सदी के संत कबीर के दोहें आज भी लोगों की जुबान पर होती है। 1518 में कबीर ने मगहर में अंतिम सांसें ली थी। कहा जाता है कि उनके निधन के बाद दो समुदाय के लोगों के भी तनाव की स्थिति बन गई थी। दोनों अपने-अपने रीति रिवाजों से संत कबीर का क्रिया कर्म करना चाहते थे। लेकिन, जब शव से चादर उठाया गया तो सिर्फ फूल बिछे दिखें। दोनों पक्ष के लोगों ने इसे ही बांट लिया। हालांकि, इस जनश्रुति के बारे में कोई ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं है। यही वजह है कि इस जगह पर कबीर का एक तरफ समाधि बनायी गयी है तो उसी कैंपस में दूसरी तरफ मजार है। दोनों धर्म को मानने वाले लोग अब यहां मजार और समाधि पर मत्था टेकते हैं। इस कैंपस को खूबसूरत बनाने के लिए मंदिर और मजार के पीछे गार्डन बनाया गया है। यहां लोगों के ठहरने के लिए यात्री निवास भी बनाया गया है। पूरे कैंपस में नारियल के पेड़ यहां की खूबसूरती को बढ़ा देती है। यह दावा के साथ कहा जा सकता है कि यह भारत का एकमात्र जगह है जहां एक ही कैंपस में मजार और समाधि दोनों है।

करीब 3 घंटे यहां गुजारने के बाद मैं आगे की ओर निकल पड़ा। कई सालों से मगहर गांव यात्राओं की मेरी लिस्ट में शामिल था। इस स्थान पर आकर मैं देखना चाहता था कि कबीर स्थली पर आकर कैसा अनुभव होता है। हर किसी को एक बार मगहर की ओर जरूर आना चाहिए। हमारे-आपके जीवन में हर दिन कबीर के दोहे चलते हैं। दोहे के जरिए कबीर का विचार काफी प्रासंगिक और प्रैक्टिकल है। मगहर की एक और खासियत यह है कि इसके बगल में आमी नदी बहती है। इसके एक ओर श्मशान है तो दूसरी तरफ कब्रिस्तान है। नदी के तट को भी डेवलप किया जा रहा है। हालांकि, आमी नदी की स्थिति अच्छी नहीं है। यहां यह भी लोककथा है कि इस नदी का पानी सूख गया था। इलाके में पानी की किल्लत थी। कबीर के तपोबल से ही नदी की धारा मुड़ गई और मगहर में लोगों को पानी मिलने लगा था। अंत में कबीर के इस दोहे के साथ यात्रा वृतांत को ठहराव देता हूं। साइं इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय। मैं भी भूखा ना रहूं, साधू न भूखा जाए।
