मलाना यात्रा की यह आठवीं सीरिज है. शिमला और कसोल की यात्रा पूरी कर अब मलाना की ओर निकलने के लिए तैयार थे. अब मजेदार और रोमांचक पल शुरू होने वाला है.

खाई और पहाड़ी के बीच गाड़ी
गाड़ी कसोल से मलाना की ओर रवाना हो गई. एक साल से सोचा हुआ सपना पूरा होने वाला था. वहीं, ड्राइवर हमें तरह-तरह की कहानियां सुना रहा था. उसने अपना नंबर दे दिया कि वापसी के वक्त कॉल करना. लेकिन, बर्फबारी होने पर बिल्कुल नहीं. कसोल से गाड़ी वापस जरी आ गई. जरी से मलाना की दूरी करीब 15 किमी है. लेकिन, तय करने में समय 50 किमी का लगता है. सिंगल रोड पर गाड़ी चल रही थी. एक तरफ गहरी खाई, दूसरी तरफ ऊंची पहाड़ी. जरा सा बैलेंस बिगड़ा तो बचानेवाला कोई नहीं मिलेगा. गाड़ी जैसे-जैसे आगे बढ़ रही थी. डर वैसे-वैसे हमलोगों को घेर रहा था. ऊपर से ड्राइवर की बातें और डरा रही थी. ड्राइवर बता रहा था कि पिछले साल इस रास्ते पर बादल फटा था. कई लोगों की जान चली गई थी. उसके मुताबिक बर्फबारी के समय इधर नहीं आना चाहिए. रास्ता बंद हो जाता है.पहाड़ों में काफी अंदर होने की वजह से हटानेवाला भी नहीं आता है. मेरे साथ तीन और लड़के भी थे. उनमें दो की हालत रास्ता देख काफी खराब हो गई थी. लग रहा था कि हम पहाड़ियों पर चढ़े जा रहे हैं. आस-पास खाई, जंगल, पहाड़ी के अलावा कुछ भी नहीं दिख रहा था. यहां पता चला कि जरी से हिमाचल ट्रांसपोर्ट की बस भी इस रास्ते पर चलती है. सामने से बस भी आती दिखी. ड्राइवर को देख मैं बोल पड़ा कि असली हिम्मतवाला यही है.

भाई अब लौट चले…
बस ड्राइवर ने बताया कि दो दिन से बर्फबारी नहीं हुई है. रास्ता साफ है. ये सुनकर थोड़ी राहत मिली. सुमो का ड्राइवर अब भी हमें मलाना जाने से मना कर रहा था.हमारे अंदर भी डर काफी बढ़ गया था. फिर भी ड्राइवर को कहा कि डराओ मत गाड़ी चलाओ. हमलोगों में से एक वीडियो बना रहा था. जबकि,दूसरा कह रहा था कि भाई अब लौट चलते हैं..मैं मन ही मन सोच रहा था कि अकेले आने पर क्या हालत होती. जरी और मलाना के बीच दो सुरंग भी मिलता है. दोनों काफी छोटा है. लेकिन, इससे गुजरने के दौरान मजा काफी आता है. गाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी. रोमांच और डर साथ-साथ चल रहा था. हम हर 15 मिनट पर पूछ रहे थे कि 15 किमी चलने में कितना समय लगेगा. लेकिन, सड़क और जगह की हालत देख समझ रहा था. कई बार दिमाग में आया कि अगर गाड़ी खराब हो जाए तो कैसे बनेगी.

जब दिख गया मलाना गेट
खैर, करीब 2 घंटे चलने के बाद मुझे मलाना गांव दिखने लगा. ऊंची पहाड़ों पर कुछ घरों को देख बाकी के दोस्त भी खुश हो गए. अब तक इंटरनेट के जरिए जो देख था. उससे कहीं ज्यादा खूबसूरत आंखों के सामने दिख रहा था. लकड़ी से बने छोटे-छोटे घर काफ सुंदर दिख रहे थे. थोड़ी दूर आगे जाने पर मलाना गेट भी दिख गया. इस गांव को जानेवाले लोग गेट के पास फोटो जरूर क्लिक करते हैं. अब, हमलोग गाड़ी से उतर चुके थे. ड्राइवर को उसकी मजेदार कहानियों के लिए धन्यवाद बोला. उसे पैसे दिए और बगल की एक छोटी सी दुकान में चाय पिलाई.

ऊंचाई देखकर हालत खराब
मलाना गांव में एक गेस्ट हाउस वाले से मेरी पहले से बात हो चुकी थी. उसे तुरंत फोन लगाया. उसने कहा कि आप सीधे गांव पहुंच जाओ. अब, यहां से मलाना गांव ट्रैकिंग करके पहुंचना था. पहाड़ की ऊंचाई देखकर दो की हालत खराब हो रही थी. साथ वाले मित्रों के पास लगेज भी था. उसमें भी ट्रॉली वाला बैग. ट्रैकिंग में ऐसे बैग लेकर चलने से बचना चाहिए. हालांकि, मेरे पास पिट्ठू बैग था. दुकानदार ने बताया कि जरूरत का सामान ही ऊपर ले जाईए. बाकी यहीं पर रख दीजिए. सुरक्षित रहेगा. आपस में बातचीत के बाद कुछ लोगों ने बैग यहीं रख दिया. इसके बदले में लौटते समय दुकानदार को पैसे देने थे. लगेज को यहां रखने का निर्णय काफी अच्छा था. क्योंकि इसे आगे की सीरिज में बताया जाएगा.

खूबसूरत गांव का नजारा
सड़क से मलाना गांव की चढ़ाई करीब 2 किमी है. ये चढ़ाई बिल्कुल खड़ी है. आपको सीधे ऊपर की ओर बढ़ते जाना है. कुछ देर तक आराम करने के बाद हमलोग चलने को तैयार हो गए. यहां भी सामने पार्वती नदी बहती हुई दिखती है. इसपर एक ब्रिज बना हुआ है. इसी से गुजरकर हमलोगों को दूसरी तरफ जाना था. यहां की खूबसूरती गजब की है. चारों ओर ऊंची-ऊंची पहाड़ियां. इस बीच बसा हुआ एक छोटा सा गांव. जिसके सभी घर लकड़ी के बने हुए थे. अद्भुत नजारा. मलाना क्रीम का भी धंधा नीचे से ही शुरू हो जाता है. दुकानदार से ग्रामीण तक ट्रेवलर को चरस का ग्राहक ही समझते हैं.

अगली कड़ी में पढ़ें 2 किमी की ट्रैकिंग का शानदार सफर
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