#qutubminartocharminar7: ‘ताल-तलैयों’ का शहर, जो कभी निराश नहीं होने देता

पिछले पार्ट में आपने पढ़ा कि ग्वालियर से भोपाल की दूरी यायावर ने कैसे तय की. दतिया शहर में बिना एड्रेस का घर खोजना कितना मजेदार रहा. इस कड़ी में सफर को आगे बढ़ना है. हैदराबाद की आधी दूरी अब बची है. भोपाल में कुछ दोस्त-यार से मुलाकात के बाद नवाबों के शहर से निजाम के शहर की ओर निकल पड़ना है. झीलों के शहर से तो अपना पुराना नाता है. तो इतनी जल्दी निकलने की बात करनी भी बेमानी है. लिहाजा भोपाल में एक दिन ठहरने का निर्णय ले लिया. 24 घंटे दोस्तों के नाम.

भोपाल में साथियों का साथ

स्वाद जो कभी नहीं भूल सकते

रात के करीब आठ बजे भोपाल पहुंचे थे. ग्वालियर से भोपाल की ये दूरी काफी थकान भरी. शरीर पूरी तरह अकड़ गया था. नींद से पलकें खुद ब खुद बंद होने लगी थी. लग रहा था कहीं भी नींद के आगोश में डूब जाऊं. शाम तक दोस्त विजय भी ग्वालियर से भोपाल पहुंच चुका था. वो ट्रेन से पहले ही आ गया था. भोपाल में अपनी पसंदीदा जगह एमपी नगर (चचा की दुकान) में भोजन कर पुरानी दिनों को याद कर रहा था. दरअसल, दो साल कॉलेज के दौरान इसी दुकान पर भोजन करता था. चच्चा के खाने में गजब का स्वाद मुझे आता था. बिना रोक-टोक का भोजन चलता था. रोटियों की संख्या निश्चित नहीं होती थी. और चच्चा कभी देने में भी संकोच नहीं करते थे. कॉलेज के बाद एक साल तक जॉब के दौरान भी भोजन का ठिकाना यही रहा. ऑफिस के कई सहयोगी कहते थे नाले के बगल में कैसे खा लेते हो. वहां भोजन करने से बीमारी हो जाती है. लेकिन, मुझे कभी पेट दर्द भी नहीं हुआ. सबसे मजेदार बात तो ये कि चच्चा की दुकान पर मेरा एक अलग नाम रख दिया गया था. उसी नाम से कई बार उनकी पत्नी और बेटा मुझे बुलाते थे. और वो नाम था ‘ खर-खर’. मतलब नहीं समझे ना. दरअसल, मैं अक्सर कहता था कि मुझे जली रोटियां चाहिए. जिसे गांव में खर-खर रोटी बोलते थे. तो मेरा नाम उन्होंने ‘ खर-खर’ ही कर दिया था. खैर छोड़िए, चच्चा की दुकान का किस्सा सुनाउंगा तो लंबा खींच जाएगा. बातचीत का दौर चल ही रहा था कि दुकान पर विजय पहुंच गया. फिर मैं उसके साथ निकल पड़ा. बिस्तर पर लेटते ही कब नींद आई पता ही नहीं चला. सुबह काफी जगाने के बाद नींद खुली.

बावर्ची चच्चा के साथ उनका सहयोगी
सड़क किनारे यायावर का भोजन

दोस्तों से मुलाकात

सुबह नींद खुली तो कई मिस्ड कॉल दिखे. एक कॉल भोपाल के पुराने साथी पंकज भाई का था. कभी दोनों एक ही कार्यालय में काम करते थे. हालांकि, डिपार्टमेंट अलग था. लेकिन, जिम में दोनों की दोस्ती हो गई. कई बार वो खुद मुझे एक्सरसाइज की ट्रेनिंग भी देते थे. पकंज भाई घुमक्कड़ी के भी शौकिन हैं. साइकिलिंग और कैंपिंग वो जमकर करते हैं. भोपाल में भाईसाहब ने साइकिल से घुमक्कड़ी का एक ग्रुप भी बना रखा है. कॉल लगाया तो उनका सीधा जवाब था पहुंच रहा हूं मिलने के लिए एमपी नगर. साथ में कुछ और भी है. मैं भी तैयार होकर विजय के साथ एमपी नगर यानी चच्चा की दुकान पर पहुंच गया. लोग जानते हैं कि मैं वहीं मिलूंगा. तब तक कॉलेज के भी कुछ मित्र आ गए. बाइक पर लगेज देखकर लोग भी दुकान के पास कभी बार भीड़ लगा दे रहे थे. अब चच्चा लोगों को समझाने में जुट जाते थे. मेरी वजह से उनकी एक और ड्यूटी बढ़ गई थी. दोस्तों से कॉलेज के दिनों की बातचीत और ट्रैवलिंग एक्सपियरिंस पर चर्चा घंटों चक चलती रही. इस बीच पंकज रावत भी पहुंच गए. काफी दिनों बाद मुलाकात हुई थी. पहले हाल-चाल फिर यात्राओं को लेकर बातचीत होने लगी. उन्होंने कहा कि बड़ा अच्छा लगता है तुम्हें बाइक से घुमते हुए देखकर. मैंने भी तुरंत जवाब दिया आपकी साइकिल यात्रा भी कम रोमांचकारी नहीं होती. मेरी भी इच्छा है साइकिल से लंबी यात्रा करने की. बातचीत का सिलसिला चल ही रहा था कि उन्होंने टिफिन निकाला. और उससे जो निकला. वो देखकर मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा.

मछली और गाजर का हलवा

ब्रेकफॉस्ट में अजीब कॉम्बिनेशन

पंकज भाई के इस सौगात ने तो मन और मिजाज दोनों खुश कर दिया. नाश्ते में मछली और गाजर का हलवा. ऊपर से चच्चा की ‘खर-खर’ रोटी. क्या बताऊं उस स्वाद को अब तक नहीं भूला सका हूं. ऐला कॉम्बिनेशन भी पहली बार चख रहा था. खैर लाजवाब नाश्ते के बाद नई-पुरानी यादों पर बतकही चलती रही. साथ ही पंकज रावत जी की ओर से डिनर पर घर आने का निमंत्रण भी मिल गया. मैंने असमर्थता जाहिर की तो सीधे बोले कुछ भी कह लो आना तो है ही. अब सुबह में मुझे यात्रा के अगले पड़ाव की ओर निकलना भी था. फिर भी पंकज भाई मानने को तैयार नहीं थे. बोले सुबह में मेरे घर की ओर से सीधे हाइवे पकड़ कर निकल जाइएगा. अब मैं क्या ही कहता. रात का कार्यक्रम फिक्स हो गया था. सिर्फ शाम बची थी भोपाल में टफरी मारने के लिए और कुछ पुरानी यादों को ताजा करने के लिए.

भोपाल के साथी पंकज रावत (साइकिलिस्ट)

बड़ी झील के पास एक शाम

अब भोपाल में कुछ और घंटे मेरे रह गए थे. सोचा क्यों न बड़ी झील और वीआईपी रोड का एक चक्कर लगा लिया जाए. भोपाल आएं और वीआईपी रोड नहीं गए तो सब बेकार है. कॉलेज और जॉब के दिनों में कई घंटे इधर गुजरे थे. आधी रात में वीआईपी रोड पर घुमना मुंबई के जुहू में घुमने के बराबर लगता था. बड़ी झील के पास डूबते हुए सूरज को निहारना. अपने आप में आनंदायक पल होता है. यही सब सोचकर शाम में मित्र अंकुर के साथ निकल पड़े बड़ी झील की ओर. कहते हैं न कुछ शहर में समय बदलता है लेकिन वो ज्यों का त्यों ही रहता है. वीआईपी रोड में घुसते ही पुरानी यादें ताजा होने लगी. जॉब के दौरान कई शाम यहां की सड़कों पर बीतती थी. लग रहा था समय पीछे चला गया है. हर यादें आंखों के सामने तैरने लगी. दिमाग में एक काल्पनिक मानचित्र बनने लगा. अरे वो जगह, जहां आइसक्रिम खाते थे. वो जगह जहां घंटों तक बैठे रहते थे.

वीआईपी रोड से बड़ी झील की झलक

वापस तो आना ही है

रात आठ बजे तक बड़ी झील के आस-पास भटकते रहें. मोबाइल रिंग किया तो पता चला पंकज भाई याद कर रहे हैं. नौ बजे तक मुझे लेने के लिए वो एमपी नगर आ रहे हैं. अब मोती मस्जिद, बड़ी झील और वीआईपी रोड को बॉय बोलने का समय आ गया था. मित्र अंकुर ने अपनी स्कूटी स्टाट की और हम चल पड़े एमपी नगर की ओर. दूर से झील में चमकती स्ट्रिट लाइटिंग को तब तक देखता रहा. जब तक आंखों से वो ओझल न हुआ. एमपी नगर पहुंचने से पहले याद आया क्यों न बगिया में एक चाय की चुस्की हो जाए. बगिया की कहानी कभी बाद में आराम से सुनाऊंगा. बहुत लंबी और मजेदार है. यही कॉलेज के छात्रों का अड्डा हुआ करता था. घंटों तक बतकही चलते रहती थी. पहुंचा तो बगिया में टपरी वाले दादा उसी अंदाज में मुस्कुराते दिखे. हालांकि, वो पुराने छात्रों को शक की नजर से देखते थे. सोचने लगते थे कि कहीं इसका कोई बकाया तो नहीं रह गया. खैर, चाय की चुस्की लेने के बाद सीधे चच्चा की दुकान पर पहुंचा. पंकज भाई पहले से पहुंचे हुए थे. सभी से दुआ-सलाम करने के बाद निकल पड़ा पकंज भाई के घर की ओर. वो कार से आगे-आगे चल रहे थे. मैं अपनी बाइक से आ रहा था. घर पहुंचा तो उनकी माताजी, मैडम और बच्चों से मुलाकात हुई. बच्चों से बातकर काफी खुशी हुई. वो भी अपने पापा की तरह साइक्लिंग का शौक रखते हैं. और अक्सर छुट्टी होने पर निकल पड़ते हैं किसी नई जगह के लिए. अगली सुबह मुझे हैदराबाद के लिए निकलना भी था. देर रात तक बातचीत और बेहतरीन डिनर के बाद नींद के आगोश में डूब गया.

भोपाल के पास अमरगढ़ वॉटरफॉल की ट्रैकिंग

अगली कड़ी में पढ़ें भोपाल से वर्धा का सफर

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