पिछले पार्ट में आपने पढ़ा कि चंबल इलाके के लोगों का पटियावाले बाबा में गजब की आस्था है. करह धाम से मशहूर इस स्थान पर पूरे साल भंडारा चलता रहता है. इस कड़ी में बीहड़ के शनि देव से यायावर आपको रूबरू करा रहा है. पहली बार सुना था कि महाराष्ट्र के शनि शिंगनापुर से भी ज्यादा पुरानी प्रतिमा शनि देव की बीहड़ में है. यह सुनते ही शनिचरा मंदिर जाने की इच्छा कुंलाचे मारने लगी.
नई जानकारी, नया जोश
शनिचरा मंदिर के बारे में सुनते ही उत्सुकता बढ़ गई थी. आप तो जानते ही हैं कि आपका यायावर वैसी जगहों पर ज्यादा जाता है जहां के बारे में दूसरी जगह के लोगों को जानकारी नहीं होती है. शनिचरा मंदिर के बारे में भी कभी पहले नहीं सुना था. चंबल, ग्वालियर संभाग को छोड़कर एमपी के बाहर इस मंदिर के बारे में लोगों को बहुत कम जानकारी है. शनि देव का नाम आते ही सबसे पहले महाराष्ट्र के शनि शिंगनापुर का स्मरण होता है. लोगों को लगता है कि शनि देव का एकमात्र मंदिर शनि शिंगनापुर में ही है. लेकिन, बानमोर में पता चला कि यहां से कुछ ही किमी की दूरी पर ऐंती गांव में शनि देव विराजते हैं. यह जानते ही दोस्त विजय के साथ जाने का प्लान बन गया. सुबह में ही निकलना था. क्योंकि दोपहर बाद करह धाम जाना था. जिसकी कहानी आपको #qutubminartocharminar4 पार्ट में बता चुका हूं.

इसलिए समय से पहले टूटी नींद
दिन भर में दो स्थानों की यायावरी करनी थी. देर होने पर कोई एक छूट भी सकता था. जो मैं चाहता नहीं था. अगले दिन मुझे किसी भी कीमत पर भोपाल के लिए निकलना था. इसी चिंता में नींद भी जल्द ही खुल गई. मोबाइल पर नजर गई तो पता चला अभी तो पांच भी नहीं बजे हैं. लिहाजा फिर रजाई तानकर सो गया. फिर चाची जी(विजय की मां) की आवाज पर नींद खुली. पलकें खुली तो चाय के चाची जी खड़ी थीं. अपन को तो आदत है नहीं बेड टी का. इसे सौभाग्य मानकर चाय की चुस्कियों के साथ सुबह की शुरुआत हुई. उधर, विजय को भी मैंने जल्द ही उठा दिया. 9 बजे तक हमलोग शनिचरा मंदिर जाने के लिए तैयार हो गए. तब तक नाश्ता भी तैयार था. अब इसे छोड़कर कौन जाता है. लिहाजा, घर का बना हुआ स्वादिष्ट नाश्ता पहले हलक के नीचे उतारा. फिर विजय के साथ निकल पड़ा शनिदेव के दर्शन के लिए.

ऐंती गांव में है मंदिर
घर से निकलने के बाद बाइक चली ही थी कि विजय के कुछ परिचित मिल गए. अब भाई दोस्त रिपोर्टर है तो बात थोड़ी लंबी खींच गई. आधे घंटे तक गपशप चलता रहा. मेरा भी परिचय कराया गया. दिल्ली से हैदारबाद बाइक से जा रहा हूं. यह सुनकर लोगों को अचरज भी लगा. और हमेशा की तरह कई सवालों का जवाब मुझे देना पड़ा. इस बीच बगल की दुकान से नाश्ता मंगा दिया गया. दो साल बाद लिख रहा हूं तो लाजिमी है कि नाश्ते में क्या था ये भूल गया हूं. लेकिन, टेस्ट बढ़िया था. विजय ने बताया कि बानमोर में लोग इसे खूब खाते हैं. चलो इसी बहाने किसी नए डिश का टेस्ट तो जान सका. अब, लोगों से विदा लेकर हमदोनों निकल पड़े शनिचरा मंदिर के लिए. बानमोर से मंदिर की दूरी करीब 15 किमी है. जिस जगह पर शनिचरा मंदिर है. उसे लोग ऐंती गांव के नाम से जानते हैं. गांव के आस-पास छोटी पहाड़ियों की श्रंखला दिखाई पड़ती है. खासकर मंदिर के दूसरी तरफ. स्थानीय लोग इन पहाड़ियों को शनि पर्वत भी बोलते हैं. और इसी पर्वत के एक हिस्से पर मंदिर स्थित है. हालांकि, अब पर्वत जैसा कुछ दिखता नहीं है. समय के अनुसार भौगोलिक संरचनाएं बदलती है. कहीं स्वंय बदलती है तो कहीं लोगों का विकास परिवर्तन को मजबूर करता है. खैर, आधे घंटे की यात्रा के बाद शनि मंदिर पहुंच चुके थे.

शनि शिंगनापुर से भी पुराना होने का दावा
अधिकांशत: मंदिर समेत तमाम वैसी जगह जहां काफी भीड़ होती है. मैं जाना नहीं चाहता हूं. कई बार तो यायावरी के दौरान मशहूर मंदिरों में भी बाहर से चरणस्पर्श कर लिया हूं. लेकिन, संयोग अच्छा था. शनि देव की कृपा से श्रद्धालु कम थे. कहें तो न के बराबर. फिर देर किस बात की. तुरंत प्रसाद उठाया और शनि देव का दर्शन किया. ब्लैक रंग की शिलापट्ट पर शनि देव की प्रतिमा लगी हुई है. बिल्कुल चमकती हुई प्रतिमा. आंखों में अलग तरह की चमक. लगातार चढ़ रहे तेल की वजह से प्रतिमा का रंग बदल गया है. क्योंकि शनि देव पर तो तेल ही चढ़ाया जाता है. यहां के पुरोहित का कहना है कि यहां की प्रतिमा शनि शिंगनापुर से भी ज्यादा पुरानी है. उन्होंने बताया कि शनि पर्वत से ही शनि देव का शिलापट्ट महाराष्ट्र के शनि शिंगनापुर ले जाया गया था. स्थानीय लोगों का भी दावा है कि शनि देव का यह देश और दुनिया में सबसे पुराना मंदिर है. शनि पर्वत पर वो विराजे थे. उन्हें इसी स्थान पर दोबारा शक्ति की प्राप्ति हुई थी.

त्रेता युग से जुड़ी है मान्यताएं
मंदिर के हर हिस्से को देखने के बाद हमलोग बाहर की ओर निकले. मंदिर का काफी विस्तार भी किया जा रहा है. दूसरी ओर से बेहद ही खूबसूरत नजारा दिखता है. पहाड़ियों के बीच में खेतों को देखकर सुखद अनुभुति होती है. चारों ओर कंटीले पेड़ भी नजर आते हैं. जिनपर हरियाली कम और कांटे अधिक दिखाई पड़ते हैं. इस दौरान ही एक शिलापट्ट पर नजर पड़ी. इसपर शनिदेव के बारे में कुछ जानकारी दी गई है. शिलापट्ट के मुताबिक त्रेता युग में भगवान हनुमान जब लंका जलाने की कोशिश कर रहे थे तो वो असफल हो रहे थे. पता चला कि रावण अपने पैरों के नीचे शनि देव को दबाए हुए है. इस वजह से आग नहीं लग पा रही है. हनुमान ने तुरंत शनि देव को मुक्त कराया और चले जाने को कहा. लेकिन, शनि देव इतने दुर्बल हो गए थे कि वो निकल भी नहीं पा रहे थे. उन्होंने हनुमान जी से विनती करते हुए कहा कि अपनी ताकत से उन्हें वो लंका से बाहर की ओर फेंक दे. तब पवन पुत्र ने उन्हें फेंक दिया. इसके बाद लंका में आग लगी. कहा जाता है कि शनि भगवान ऐंती गांव के पास एक पर्वत पर गिरे, जिसे शनि पर्वत कहा जाता है. यहां उन्होंने सालों तक घोर तपस्या की. इसके बाद उन्हें अपनी खोई हुई शक्ति की प्राप्ति हुई.

उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़
यूं तो हर शनिवार और मंगलवार को आस-पास के इलाकों से श्रद्धालु पहुंचते हैं. लेकिन, हर साल शनि जयंति पर लाखों की संख्या में शनि भगवान के भक्त यहां पहुंचते हैं. ज्येष्ठ माह की अमावस्या को यहां मेला लगता है. लोगों की मान्यता है कि इस दिन शनि देव पर तेल चढ़ाने से हर मुराद पूरी होती है. शनिचरा मंदिर का निर्माण राजा विक्रमादित्य ने कराया था. लेकिन, कालांतर में इसका जीर्णोद्धार ग्वालियर के महाराजा दौलतराव सिंधिया ने कराया था. करीब तीन घंटें तक मंदिर परिसर में गुजारने के बाद हमलोग वापस बानमोर की ओर निकल पड़े. क्योंकि इसके बाद पटियावाले बाबा के दरबार में जाना था. नई जगह का दीदार और नई जानकारी से लैस होकर मैं बाइक पर बैठ गया. बाइक धीरे-धीरे चल रही थी. और मैं सोच रहा था कि कितना कुछ है भारतवर्ष में देखने और जानने को. अब तक शनि देव मतलब शनि शिंगनापुर ही जानता था. इसमें मुरैना का शनिचरा मंदिर भी जुड़ गया. ठंडी-ठंडी हवा के साथ-साथ दिल और दिमाग एक ही बात कह रही थी कि सफर का सिलसिला यूं ही चलता रहे. नई जगह, नई कहानी, नया परिवेश और नया खान-पान के बारे में जानता रहूं और आपको भी बताता रहूं.

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