पिछले पार्ट में आपने पढ़ा कि शनिचरा मंदिर की पौराणिकता महाराष्ट्र के शनि शिंगनापुर से भी पुरानी है. इस कड़ी में पढ़ें बानमोर से (झीलों का शहर) भोपाल तक की यात्रा यायावर ने कैसे पूरी की. आगे करीब 500 किमी का सफर एक दिन में तय करनी थी. वो भी जनवरी के महीने में. ठंड चरम सीमा पर थी. रजाई से निकलने की हिम्मत नहीं हो रही थी. लेकिन, निकलना तो था ही. अब सफर को आगे बढ़ाना था. बीहड़ को छोड़ना था. दो दिन विजय के घर में भरपूर स्नेह मिला था. अब जाने की बारी है.

निकल पड़ा सुनसान सड़कों पर
नींद खुल नहीं रही थी. लग रहा था रजाई में लिपटा रहूं. लेकिन, घर से 4 बजे निकलने को ठान लिया था. लिहाजा, किसी तरह उठ कर बैठा. बाहर निकला तो हवा के एक झोंके ने पूरे शरीर में ठिठुरन ला दिया. फिर वापस रजाई में घुस गया. आधे घंटे बाद हिम्मत कर सामान पैक किया. फ्रेश होने के बाद निकलने को तैयार हुआ. इस बीच चाची जी(विजय की मां) भी उठ गईं. दो दिन तक उनका भरपूर स्नेह मिला था. वो चाय बनाकर लाईं. गरमा-गरम चाय पीकर पूरी तैयारी के साथ मैं नीचे उतरा. विजय को सोता छोड़ दिया. लेकिन, कड़ाके की ठंड में भी उसका छोटा भाई मुझे बाइक तक छोड़ने के लिए आया. ठंड की वजह से अपनी धन्नो स्टार्ट नहीं हो रही थी. पांच से दस मिनट तक किक मारने के बाद उसकी आवाज सुनाई दी. फिर सभी से विदा लेकर भोपाल के लिए निकल पड़ा. करीब 500 किमी का सफर तय करनी थी. रास्ता अनजान था. पूरे एरिया से अनभिज्ञ था. फिर भी हौंसला रखकर हाइवे की ओर बढ़ चला. अंधेरी रात में बाइक सरपट भाग रही थी. चारों ओर अजीब सा सन्नाटा था. कभी-कभार ट्रक बगल से गुजरता तो ढांढस बढ़ता. ऊपर से ठंड कहर बरपाने पर उतारू थी. तीन लेयर स्वेटर पहनने के बावजूद लग रहा था कि हाथ और पैर को ठंडी हवाएं सुन्न कर देगी. हेलमेट का शीशा खोलते ही ठंडी हवा के झोंकों से आंखें बंद होने लगती. मजबूरी में तुरंत शीशा नीचे करना पड़ता.
जब ट्रक बना पथप्रदर्शक
करीब 50 किमी आगे बढ़ने के बाद हाइवे पूरी तरह से खराब था. कंस्ट्रक्शन का काम चल रहा था. अंधेरा होने की वजह से कुछ भी नहीं दिख रहा था. डॉयवर्जन तो पता ही नहीं चल रहा था. समझ में नहीं आ रहा था कि बाइक इस तरफ से ले जानी है या उस तरफ से. ऊपर से ठंड और भी मुसीबत पैदा कर रही थी. कई बार मन किया कि लौट चलते हैं. दिन में निकलेंगे. फिर कुछ सोचकर कदम पीछे करना उचित नहीं लगा. काफी देर तक यूं ही डायवर्जन के पास बाइक पर सोच में डूबा रहा. करीब आधे घंटे बाद एक ट्रक आता दिखा. उसी को लक्ष्य मानकर पीछे-पीछे बाइक चलानी शुरू कर दी. करीब 25 किमी का सफर यूं ही धीरे-धीरे ट्रक के पीछे चलता रहा. ट्रक सड़क से नीचे उतरती तो बाइक भी. फिर सामने से आ रहे ट्रकों की लाइट से डॉयवर्जन देखता और आगे बढ़ता. खैर, डेढ़ घंटे के बाद अच्छी सड़क मिली. बाइक ने थोड़ी रफ्तार पकड़ी और हम दतिया के नजदीक पहुंचे. दरअसल, दतिया में कॉलेज के दोस्त इमरान खान से मिलना था. उनका घर दतिया में ही है. बातचीत पहले हो चुकी थी. लेकिन, घर का एड्रेस नहीं ले सका था. सोचा था पहुंचकर कॉल कर लूंगा. लेकिन, संयोग ऐसा कि दतिया शहर में इंट्री करने पर जब कॉल लगाया तो स्विच ऑफ. अब किसी डिस्ट्रिक्ट टाउन में इमरान का घर कैसे खोजा जाए. बड़ी मुश्किल स्थिति हो गई. सुबह के 6 बज रहे थे. चाय की दुकानें खुलने लगी थी. लेकिन, शहर में कुहासा की वजह से कुछ दिख नहीं रहा था. ठंड से हालत खराब हो रही थी. सोचा, चलो चाय ही पी ली जाए. कुछ तो राहत मिलेगी. फिर एक टपरी पर चाय पीने लगा. वहीं, कुछ और लोग पहुंच गए. बाइक पर बंधा लगेज देखकर तमाम तरह के सवाल करने लगे. अब मैं ठंड से बचूं या उन्हें जवाब दूं. वहीं, बगल में अलाव जल रहा था. बिना देर किए मैं आग सेंकने लगा. तब जाकर कुछ राहत मिली. फिर लोगों के सवालों का जवाब दिया.

दोस्त से मुलाकात
चाय पीने के बाद सोचा अब सीधे भोपाल ही निकलता हूं. दोस्त से मिलना संभव नहीं लग रहा है. क्योंकि फोन अभी भी स्विच ऑफ था. इस बीच मुझे याद आया कि चलों लोगों से उसकी फैमिली के बारे में बता कर घर पता करने की कोशिश करते हैं. जानकारी देने पर कुछ लोगों ने एक-दो मोहल्ले का नाम बता दिया. मैं भी उधर की ओर निकल पड़ा. लेकिन, निराशा ही हाथ लगी. अब तक आठ बज चुके थे. सड़क पर हल्की धूप आ गई थी. ठंड से थोड़ी राहत मिल रही थी. सोचा, चलो एक बार और कोशिश करते हैं. वहीं, एक दुकानदार से पूछा तो उसने फिर नए मोहल्ले का नाम बताया. अंतिम प्रयास सोचकर मैं उधर की ओर निकल पड़ा. पहुंचने पर एक-दो लोगों से जानकारी ली. लेकिन, सही ठिकाना कोई नहीं बता पाया. तभी एक पुलिसकर्मी दिखा. उससे जब मैंने पूछा तो पहले वो बाइक और मेरा ड्रेस देखकर कई सवाल करने लगा. किसी तरह उसे जवाब दिया. फिर उसने एक गली में जाकर पूछने को कहा. थोड़ी देर में मैं उस गली में पहुंच गया. पूछने पर शायद तीसरा मकान बताया गया. अब, मैं उस मकान के गेट पर था. सुबह के नौ बज गए थे. गेट अंदर से बंद था. अनजान शहर में अनजान घर के दरवाजे को खटखटाया. उधर से एक शख्स बाहर निकलें. उन्हें पूरी जानकारी दी तो फिर उन्होंने कहा यही घर है. यह सुनते ही विश्वास हो गया कि कोशिशें कामयाब होती है और वादें टूट जाते हैं. फाइनली मैं इमरान के घर में था. मित्र हमारे गहरी नींद में सो रहे थे. फोन उनका कहीं और पड़ा था.

स्वादिष्ट पोहा का उठाया लुत्फ
घर के किसी सदस्य ने उन्हें बताया कि कोई संतोष शाही नाम का आपसे मिलने आया है. यह सुनकर इमरान की नींद खुली. फिर मैं कमरे में पहुंचा. भाई साहब कह रहे हैं कि तीन बजे सुबह में साइट पर से घर लौटा था. तीन दिन पहले बात हुई थी. विश्वास ही नहीं हो रहा था कि तुम आओगे. संयोग से मोबाइल भी स्विच ऑफ हो गया था. हंसते हुए मैंने कहा कोई बात नहीं. बिना जानकारी के इस शहर में तुम्हारा घर खोज लिया मैं. फिर बातचीत का दौर शुरू हो गया. कॉलेज की यादें और कुछ पुराने दोस्तों की चर्चा हुई. उसे बताया कि बानमोर में रूका था. अब भोपाल निकल रहा हूं. यह सुन इमरान बोल पड़ा कि यार एक दिन तो दतिया में भी बनता है. यह तो पीताम्बरा देवी का शहर है. दर्शन करने के बाद अगले दिन निकलना. लेकिन, मुझे तो तीन दिन बाद हैदराबाद पहुंचना था. अपनी मजबूरी बताई तो फिर जाने की इजाजत मिली. इस बीच फोहा का नाश्ता भी आ गया. गरमा-गरम घर का फोहा खाकर मिजाज खुश हो गया. थोड़ी थकान भी दूर हुई. अभी 350 किमी का सफर तय कर भोपाल पहुंचना था. ज्यादा देर होने पर फिर ठंड का सामना करना पड़ता. बातचीत के दौरान ही घर में टहल रहे कड़कनाथ मुर्गा पर नजर पड़ी. दरअसल, कड़कनाथ खास प्रजाति का मुर्गा होता है. यह पूरी तरह से काला होता है. इसका मांस और ब्लड भी काला ही होता है. बाजार में इसकी कीमत काफी ज्यादा होती है. इसमें प्रोटिन की काफी मात्रा होती है. यहां तक कि इस मुर्गे के लिए मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ सरकार के बीच विवाद भी हुआ है. अब, मुझे तो तुरंत निकलना था. इस वजह से कड़कनाथ के लाजवाब स्वाद का लुत्फ नहीं उठा सका. दो घंटे के बाद करीब 11 बजे इमरान से विदा लिया. छोटी मगर बहुत ही प्यारी मुलाकात रही यह. सबसे ज्यादा रोमांचकारी रहा घर खोजना.

बाइक रायडर से दोस्ती
अब सूरज ढ़लने तक भोपाल पहुंचने का लक्ष्य बना लिया. इमरान ने भी बताया कि चंदेरी होते हुए भोपाल निकल जाना. सड़कें अच्छी मिलेगी और ट्रैफिक भी कम होगा. झीलों का शहर (भोपाल) से काफी लगाव रहा है. यहां से कॉलेज की पढ़ाई हुई है. इसके बाद जॉब भी किया हूं. इस वजह से शहर के हर मोहल्ले से अपनापन है. एक अलग तरह का लगाव है. कह सकते हैं कि भोपाल से मोहब्बत है. तो फिर उत्साह भी बढ़ गया था. स्लेटर पर जोर ज्यादा पड़ रहा था. और धन्नो तेजी से भाग रही थी. धूप रहने की वजह से ठंड नहीं लग रही थी. मतलब बाइक रायडिंग का मजा आ रहा था. मध्यप्रदेश के ग्रामीण इलाकों की झलक भी देखने को मिल रही थी. बाइक से यात्रा करने में यही फायदा है. यह गलियों से भी ले जाती है और चौड़ी सड़कों पर भी दौड़ती है. ढ़ाई घंटे तक लगातार चलने के बाद चंदेरी पहुंच गया. चंदेरी साड़ियों के लिए यह शहर पूरे देश में मशहूर है. साथ ही यहां काफी पुराना एक किला भी है. अगर आपने बॉलीवुड फिल्म स्त्री देखी होगी तो इसमें चंदेरी की पूरी झलक दिखती है. यहां इस फिल्म की काफी शूटिंग हुई है. चंदेरी शहर की घुमक्कड़ी दो साल पहले भी हो चुकी है. इस वजह से यहां रूका नहीं. भोपाल की ओर सीधा निकल पड़ा. दोपहर के 2 बजे के करीब भूख भी सताने लगी. फोहा की ताकत खत्म होने लगी थी. तभी एक ढ़ाबे पर नजर पड़ी. उस ओर धन्नो चल पड़ी. भोजन करने के दौरान ही एक और बाइकर पर नजर पड़ी. वो चाय पीने के लिए रूके हुए थे. दिल्ली नंबर बाइक देखकर वे बात करने के लिए पहुंच गए. भाई साहब मुरैना से थे. बाइक रायडिंग का शौक है. और भोपाल ही जा रहे थे. अब दोनों का शौक मिल गया तो दोस्ती होनी लाजिमी है. महोदय का नाम अरुण सिक्रिवार है. वे यूट्यूब पर ट्रैवलिंग का चैनल भी चलाते हैं. काफी देर तक दोनों के बीच बातचीत होती रही. फिर मैं विदा ले लिया. क्योंकि सूरज डूबने से पहले भोपाल पहुंचने का लक्ष्य था.

कर्क रेखा के पास फोटूबाजी
भोजन करने के बाद फिर से भोपाल की ओर धन्नो दौड़ पड़ी. अब सीधी नजर भोपाल पर थी. सड़कें अच्छी थी. और संयोग से ट्रैफिक भी कम. इस वजह से रफ्तार थोड़ी बढ़ गई थी. शाम होने से पहले ही हम सांची के नजदीक आ गए. बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए सांची महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है. यूनेस्को की हेरिटेज लिस्ट में भी सांची का नाम है. दरअसल, यहां बौद्ध स्तूपों, मठों, मंदिरों के अलावा कई स्तंभ भी हैं. जिसे देखने के लिए पूरी दुनिया से टूरिस्ट पहुंचते हैं. कहा जाता है कि ईसा पूर्व तीसरी सदी से बारहवी सदी तक यहां अलग-अलग राजाओं के शासनकाल में निर्माणकार्य चलता रहा. सम्राट अशोक से लेकर पुष्यमित्र तक ने यहां अनेक मठों और बुद्ध की प्रतिमाओं का निर्माण करवाया. हालांकि, भोपाल से नजदीक होने की वजह से मैं यहां की कई यात्राएं पहले कर चुका हूं. इसलिए सीधा आगे बढ़ गया. लेकिन, थोड़ी दूर बढ़ने पर बाइक रोक दी. क्योंकि, इस जगह पर फोटो खींचान गर्व की बात होती है. जी हां, आपका यायावर उस स्थान पर था. जहां से कर्क रेखा गुजरती है. इस रास्ते से गुजरनेवाले बाहरी लोग यहां पर जरूर फोटूबाजी करते हैं. तो मैं कैसे पीछे रहता कुछ तस्वीरें उतारी गई और यात्रा को यादगार बनाया गया. करीब आधे घंटे बाद यहां से लक्ष्य की ओर निकल पड़ा. अब भोपाल बिल्कुल नजदीक था. लेकिन, ट्रैफिक बढ़ रही थी. भोपाल शहर की आबोहवा मुझमें उत्साह भर रही थी. तमाम थकान झीलों के शहर को देखकर दूर हो गई थी. सूर्यास्त होने के साथ-साथ ही शहर में धन्नो की इंट्री हो गई. शाम सात बजे तक आपका यायावर पसंदीदा कहें या यादों वाली जगह एमपी नगर प्रेस कॉम्पलेक्स पहुंच चुका था. इस तरह से बानमोर से भोपाल तक का 500 किमी का सफर पूरे दिन भर में पूरा हो गया.

अगली कड़ी में पढ़ें भोपाल से नागपुर का कैसा रहा सफर
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qutubminartocharminar3: बीहड़ की मेहमानवाजी भुलाई नहीं जा सकती
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