पिछले पार्ट में आपने पढ़ा कि बानमोर में दोस्त के घर पर शानदार स्वागत हुआ. थकान की वजह से भरपूर नींद भी आई थी. सुबह में प्लानिंग हुई कि बीहड़ में कहां-कहां घुमना है. क्योंकि अपन के पास समय भी कम है. अगले दिन सुबह में भोपाल के लिए निकल पड़ना है. ऐसे में करह धाम (पटियावाले बाबा) और शनि देव मंदिर जाने पर सहमति बनी.

चंबल में मशहूर है करह धाम
दोपहर में भोजन करने के बाद बाइक से करह धाम की ओर निकल पड़े. शहर छोड़ते ही सिर्फ सन्नाटा. जैसे-जैसे बाइक करह धाम की ओर बढ़ रही थी. अचरज भरी निगाहों से पूरे इलाके को मैं देख रहा था. चारों ओर अजीब तरह का सन्नाटा पसरा था. सड़क तो पक्की थी. लेकिन, आस-पास कुछ भी नजर नहीं आ रहा था. न तो कोई घर, न ही कोई दुकान. दूर-दूर तक कोई गांव भी नजर नहीं आ रहा था. रास्ते में अगर किसी को प्यास लग जाए. तो कोई पिलानेवाला नहीं मिलेगा. सड़क से कुछ दूरी पर चिमनी भट्टे से निकलते धूंए नजर आ रहे थे. जो आसमान की स्वच्छता में काले गुबार भर रहा था. कहने को तो ये इलाका चंबल का ही है. लेकिन, बीहड़ की तरह मिट्टी के टीले यहां नहीं दिख रहे थे. कोई बाहर का शख्स अगर अकेले यहां से गुजरे तो एक बार डर का एहसास तो उसे जरूर होगा. अजीब सी खामोशी और सन्नाटा मैं महसूस कर रहा था. इन सड़कों पर बाइक धीरे-धीरे चल रही थी. और दोस्त विजय के साथ बीहड़ की बातों में मैं मशगूल था. बानमोर से करीब 2 किमी की दूरी पर करह धाम है. जिसे चंबल इलाके में लोग पाटियावाले बाबा भी कहते हैं. विजय ने बताया कि चंबल संभाग में करह धाम को आस्था का बड़ा केंद्र माना जाता है. पाटियावाले बाबा की जयकारों से पूरा इलाका अक्सर गूंजता रहता है.

आश्रम में प्रवेश
करह धाम में इंट्री करते ही सोंधी खूशबू आने लगी. लग रहा था कि मिट्टी के चूल्हे पर कहीं दूध गर्म किया जा रहा है. मेरा अनुमान बिल्कुल सही निकला. आश्रम के एक हिस्से में बहुत बड़ा हॉल दिखा. जहां कई चूल्हे जल रहे थे. कहीं खीर बन रहा था. तो कहीं मालपूआ और सब्जी. शुद्ध देशी घी में मालपूआ को छाना जा रहा था. जिसकी सुगंध चारों ओर फैल रही थी. घुमक्कड़ी के साथी विजय ने बताया कि मन्नत पूरी होने पर लोग यहां भंडारा का आयोजन करते हैं. मुख्य प्रसाद के तौर पर खीर और मालपूआ बनता है. पूरे सालभर यहां श्रद्धालुओं की ओर से भंडारा चलता रहता है. कहानी तो मैं विजय से जरूर सुन रहा था. लेकिन, ध्यान खीर और मालपूआ पर ही था. इसकी सोंधी सुगंध ने मुझे बेसब्र कर दिया था. लग रहा था कितनी जल्दी इस प्रसाद को ग्रहण किया जाए. खैर, मैं खुद को रोक नहीं पाया. पंक्ति में जाकर मैं और विजय पत्तल लेकर बैठ गया. भंडारा करा रहे भक्तों ने खीर, मालपूआ और सब्जी परोसी. वाह, क्या लिखूं. टेस्ट ऐसा कि लगा अब तक इस तरह का खीर खाया ही नहीं हूं. मालपूआ और सब्जी भी जबरदस्त. प्रसाद को भोजन समझ मैंने दोबारा भी खीर की मांग कर दी. हंसते हुए भाईसाहब ने फिर से मेरे पत्तल में खीर और मालपूआ रख दिया. खाने के बाद मन तृप्त लग रहा था. मानों किसी ने कुछ ऐसा दिया हो. जो अब तक नहीं मिला है. काफी देर तक प्रसाद के बारे में चर्चा करते हुए हमलोग भंडारागृह से बाहर निकल आए.


कुंआ का नाम है सरयू
करह धाम में एक कुंआ है. जिसे लोग सरयू के नाम से पुकारते हैं. कहा जाता है कि अयोध्या के पास बहनेवाली नदी सरयू का ही यहां पानी रहता है. पाटियावाले बाबा की कृपा से इस कुंआ में सरयू नदी का पानी है. आश्रम आनेवाला हर भक्त यहां के पानी का इस्तेमाल करता है. करह धाम में सेवक रवि गुप्ता बताते हैं कि इस पानी से चरम रोग से मुक्ति मिलती है. साथ ही कुत्ता काटने पर भी लोग इसका इस्तेमाल करते हैं. कुंआ का पानी इतना स्वच्छ है और शीतल है कि चेहरे पर डालते ही ताजगी महसूस होती है. इस कुंआ को देखकर आपको पुराने जमाने की भी याद आएगी. कुंआ से पानी निकालने का तरीका बिल्कुल पारंपरिक है. जो सालों पहले ग्रामीण इलाकों में देखा जाता था. चक्के के जरिए सरकता हुआ रस्सी कुंआ के अंदर जाता है. फिर आप उसी के सहारे पानी ऊपर की ओर खींचते हैं. अब तो सिर्फ फिल्मों और सिरियलों में ऐसा कुंआ देखने को मिलता है.

सिय-पिय मिलन समारोह
पटियावाले बाबा की पुण्यतिथि के मौके पर करह धाम में सिय-पिय मिलन महोत्सव का आयोजन किया जाता है. चंबल के अलावा पूरे देश से श्रद्धालु इस महोत्सव में हिस्सा लेने के लिए पहुंचते हैं. करह धाम के सेवक रवि गुप्ता बताते हैं कि 8 दिन तक यह महोत्सव चलता है. करीब 10 लाख श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं. सभी के लिए भंडारा का आयोजन किया जाता है. दूर-दूर से संत भी सिय-पिय मिलन समारोह में पहुंचते हैं. श्रद्धालुओं के लिए ठहरने की भी करह धाम में व्यवस्था की जाती है. आस-पास के गांव के लोग मिलकर भंडारा करते हैं. जिसमें खीर और मालपूआ का प्रसाद बनता है. करह धाम के संचालन के लिए श्री विजय राघव सरकार ट्रस्ट बनाया गया है. जो पूरे आश्रम का संचालन करती है. आश्रम की ओर से हॉस्पिटल और गौशाला भी चलाया जाता है. करह धाम के अलावा पटियावाले बाबा का वृंदावन, खेरागढ़, चित्रकुट और ग्वालियर में भी कई आश्रम है.

ये भी है मान्यता
करह धाम आनेवाले श्रद्धालुओं की मान्यता है कि पटियावाले बाबा रामदास जी के समय में भंडारा चल रहा था. मालपूआ प्रसाद बनाने के दौरान घी की कमी हो गई. भंडारा कर रहे लोग परेशान हो गए. सभी बाबा रामदास जी के पास पहुंचे. बाबा रामदास जी सबसे पहले सरयू कुंआ के पास पहुंचे. वहां से पानी निकालकर मालपूआ छाननेवाले कड़ाह में डाल दिया गया. सभी मालपूआ को इसी पानी में छाना गया. फिर उतना ही घी को सरयू कुंआ में डाल दिया गया. लोग कहते हैं कि करह धाम नाम भी इसका कड़ाहा से ही पड़ा है. सालों पहले यहां बड़ी संख्या में गाय होती थी. दूर-दूर से संत और श्रद्धालु यहां पहुंचते थे. सभी को कड़ाहा से ही दूध निकालकर दिया जाता था. इस वजह से इसका नाम बाद में बदलकर करह धाम हो गया.

जब खत्म हुआ पेट्रोल
करह धाम आश्रम घुमने के बाद हमलोग निकल पड़े वापस बानमोर के लिए. शाम हो चुकी थी. डूबते हुए सूरज की लालिमा भी आसमान से खत्म हो रही थी. ठंडी-ठंडी हवा बह रही थी. और सन्नाटे में हमलोग धीरे-धीरे मस्त अंदाज में बातचीत करते हुए आगे बढ़ रहे थे. करह धाम से एक किमी निकले ही थे कि बाइक बंद हो गई. 10 मिनट तक कोशिश करने के बाद पता चला कि पेट्रोल ही खत्म हो गया है. अब कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए. आसपास कुछ दिख भी नहीं रहा था. भई बीहड़ में दिखेगा भी कौन. आस-पास कोई गांव भी नहीं था. जहां जाकर मदद ली जाए. कुछ दूरी पर एक बाउंड्री दिखी. जिसके अंदर लाइट जल रही थी. दोनों वहां पहुंचे. लेकिन, सफलता हाथ नहीं लगी. पेट्रोल देने के लिए बंदा तैयार नहीं हुआ. मेरे लिए तो इलाका बिल्कुल ही नया था. विजय का घर था. फिर भी मुझे लगा कि वो भी थोड़ा भयभीत हो रहा है. क्योंकि, लूटपाट की आशंका इधर हो सकती थी. खैर, बाइक के साथ-साथ कुछ दूर पैदल हमलोग आगे निकले. फिर विजय ने अपने भाई को कॉल करके पूरी कहानी बताई. उसने 20 मिनट में आने का वादा किया. अब सामने तिराहा था. समझ में नहीं आ रहा था कि जाएं किधर. कोई इंडिकेशन भी नहीं लगा हुआ था. बड़ी मुश्किल से सोच-समझकर हमलोगों एक सड़क की ओर बढ़ गए. संयोग से वही रास्ता सही था. इस दौरान कभी बीहड़ की बातें तो कभी कॉलेज की यादों पर चर्चा होती रही. करीब आधे घंटे बाद विजय का भाई पहुंचा. उसने बाइक में पेट्रोल डाली. फिर हमलोग बानमोर की ओर निकल पड़े.

कैसे पहुंचे
- करह धाम आने के लिए सबसे पहले ग्वालियर पहुंचे.
- ग्वालियर से करीब 13 किमी की दूरी पर है पटियावाले बाबा का आश्रम
- बानमोर से करीब 3 किमी की दूरी पर है करह धाम
- पर्सनल व्हिकल या रेंट पर गाड़ी लेकर आ सकते हैं करह धाम.
- पब्लिक ट्रांसपोर्ट की गाड़ी डॉयरेक्ट करह धाम नहीं जाती है.

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