qutubminartocharminar3: बीहड़ की मेहमानवाजी भुलाई नहीं जा सकती

पिछले पार्ट में आपने पढ़ा कि आगरा से चलकर यायावर बानमोर तक पहुंचा. यहां दोस्त विजय के घर पर एक दिन का ठहराव था. सूरज डूबने से पहले घर में मेरी दस्तक हो चुकी थी. परिवार के सभी सदस्यों से मुलाकात हुई. बातचीत हुई. और फिर शुरू हुआ शानदार मेहमानवाजी का दौर. देश के हर इलाके में नाश्ता, भोजन कराने का तरीका भी अलग होता है. लिहाजा, बीहड़ में भी नया अंदाज देखने को मिला.

परिवार के सदस्य की तरह स्वागत

कुछ ही देर में सभी लोगों के साथ घुलमिल गया. दिनभर बाइक चलाने की वजह से शरीर में दर्द भी हो रहा था. तुरंत राहत मिले इसलिए नाश्ता से पहले फ्रेश होने का सोचा. स्नान करने के बाद राहत मिली. अब लग रहा था कि नींद चारों से घेरेबंदी कर ली है. लगातार पलक झपक रहा था. इस बीच ही चाची जी (विजय की मां) नाश्ता लेकर आईं. दो-तीन तरह की मिठाइयां, कुछ नमकीन और हलवा. भूख भी लग ही गई थी. नाश्ता का लुत्फ उठाने के बाद गरमा-गरम चाय आ गई. इस बीच बातचीत का सिलसिला लगातार चल रहा था. लग ही नहीं रहा था कि कुछ ही देर पहले इस परिवार से मेरी मुलाकात हुई है. विजय के दोनों भाई भी साथ में बैठे हुए थे. पता चला कि एक भाई डांसर है. और वो बानमोर में बच्चों को इसकी ट्रेनिंग भी देता है. यह जानकर मुझे काफी खुशी हुई कि बानमोर जैसी छोटी जगह पर अपनी ललक और इच्छाशक्ति के बदौलत वो डांस सिख रहा है. साथ ही बच्चों को भी सीखा रहा है.

गायब हो गई नींद

आप तो जानते ही हैं कि आपका यायावर है गप्पी. फिर क्या था नींद भी भाग गई. डिसाइड हुआ कि डांस क्लास की ओर चला जाए. साथ ही शहर का मुआयना किया जाए. फर्स्ट फ्लोर से उतरने के बाद कैंपस के पिछले हिस्से में डांस क्लास चल रहा था. कुछ बच्चे भी परफॉर्मेंस दे रहे थे. विजय का भाई उन्हें सीखा रहा था. बचपन में मुझे भी इच्छा थी कि डांस सिखना चाहिए. सच तो ये है कि कॉलेज के दिनों में एक डांस क्लास में मैंने एडमिशन भी लिया था. लेकिन, कॉलेज में इतना मन लग गया कि एक सप्ताह के बाद ही डांस क्लास जाना छोड़ दिया था. खैर, वो तो पुरानी बातें है. इधर, धमाधम म्यूजिक चल रहा था. कुछ गानों की मैंने भी फरमाइश की. बच्चों का टैलेंट देखकर दंग रह गया. विजय का भाई ने बताया कि बानमोर में डांस को लोग अच्छा नहीं मानते हैं. कुछ बच्चे आते हैं सीखने. सिखाने के बदले छोटी सी रकम मिलती है. फिर भी डांस क्लास चलाता हूं क्योंकि यह मेरा पेशा नहीं शौक है.

बानमोर में टफरी

रात के करीब 8 बज चुके थे. नेशनल हाइवे होने की वजह से ट्रक और गाड़ियों की आने-जाने की आवाज लगातार आ रही थी. अब इच्छा हुई कि बाजार का जायजा लिया जाए. थोड़ा घुमा-फिरा जाए. फिर विकास (विजय का भाई) के साथ चल दिया मार्केट की ओर. बानमोर छोटा सा मार्केट है. रेलवे स्टेशन भी है. जरूरत की सारी चीजें यहां उपलब्ध है. ग्वालियर से करीब 12 किमी पहले है. चायनीज फूड का यहां भी बोलबाला दिखा. चौक-चौराहों पर चौमीन की दुकानों पर भीड़ लगी थी. सबसे खास थी यहां की भाषा. लोगों का आपस में बात करना. बोल तो हिंदी ही रहे थे. लेकिन, समझ में हर शब्द नहीं आ रहा था. बीहड़ की तरह यहां की भाषा में भी तल्खी काफी है. लोग आपस में प्यार से बातें कर रहे थे. लेकिन, मुझे लग रहा था कि वो गुस्से में बातचीत कर रहे हैं. हर जगह की बोली अलग होती है. वो वहां की माटी से निकलती है. ठीक वैसे ही बीहड़ की बोली का टोन अलग है. बातचीत करते-करते हमलोग करीब 2 किमी की सैर कर आएं. फिर वापस घर की ओर निकल पड़े. क्योंकि भोजन के लिए घर से कॉल आ गया था.

नींद भी तो जरूरी है

घर पहुंचा तो पता चला कि विजय भी रात को भोपाल से आनेवाला है. अब तो दोस्त से भी मुलाकात हो जाएगी और साथ में घुमक्कड़ी भी. यह सोचकर मैं काफी खुश था. क्योंकि बानमोर के आसपास की जगह को विजय काफी अच्छे से जानता है. उसके साथ घुमने का आनंद ही अलग होगा. रात के करीब 10 बज गए थे. भोजन का टेबल पूरी तरह से सज गया था. परिवार के सभी सदस्य मौजूद थे. चाची जी (विजय की मां) के हाथों का खाना काफी टेस्टी था. और वो बड़े ही प्यार से खिला रही थीं. जितना मैं खाता हूं. उससे ज्यादा ही भोजन दबा दिया. साथ में बातचीत भी चलती रही.विजय के पापा ने पूछा बेटा इतनी दूर से बाइक से आ रहे हो. शरीर में दर्द नहीं होता है. कैसे चला लेते हो इतना. अब क्या ही मैं बोलता. बस इतना कहा कि चाचा जी शौक है यह. अपने देश को जानने का. समझने का. दर्द तो जरूर होता है. लेकिन, आप जैसे लोगों से मिलकर खुशियां इतनी मिलती है कि सब भूल जाता हूं. साथ में दूसरा सवाल भी था. जो मुझसे अक्सर पूछा जाता है कि बेटा शादी कब करोगे. हंसते हुए मैंने रटा-रटाया जवाब दे दिया. इस इलाके में ठंड भी काफी होती है. और रात के ग्यारह बजनेवाले थे. अब नींद मुझे मात दे रही थी. तभी चाची जी ने रजाई दिलवायी. और कहा अब सो जाओ बाकी की बातचीत कल होगी. सच बताऊं तो रजाई के अंदर सोने का मजा ही कुछ और है. कंबल में वो फिलिंग नहीं आती. टीवी पर न्यूज चलता रहा. और मैं नींद की आगोश में डूब गया.

जनरल बोगी में सफर

दोस्त से मुलाकात

नींद खुली तो जानी-पहचानी आवाज दूसरे कमरे से आ रही थी. मैं समझ गया ये तो अपना विज्जू(विजय) है. सालों बाद दोस्त से मुलाकात हो रही थी. कॉलेज के तमाम दिन याद आने लगे थे. गले मिलने के बाद मैंने बोला- यार विश्वास नहीं हो रहा है कि तुम्हारे घर में तुमसे मुलाकात हो रही है. बातचीत का सिलसिला शुरू हो चुका था. तभी चाची जी चाय लेकर आ गईं. चाय पीने के बाद हमदोनों काफी देर तक पुरानी यादों को जिंदा करते रहे. फिर मैंने कहा तो यारा अब जरा अपने इलाके की सैर कराओ. फिर दो जगह जाने का तय हुआ. दोनों इस इलाके में मशहूर है. एक को करह धाम(पटियावाले बाबा) बोलते हैं. दूसरा शनि देव का प्रसिद्ध मंदिर. यहां के पूजारी का कहना है कि यहां से ही शनि देव की मूर्ति को शनि शिंगनापुर ले जाया गया था. नाश्ता करने के बाद प्लान बना कि पहले शनि देव का दर्शन करेंगे. फिर पटियावाले बाबा के दरबार पर जाएंगे.

अगली कड़ी में पढ़ें पटियावाले बाबा और शनि देव मंदिर की घुमक्कड़ी

#QutubMinarToCharMinar2: ताजमहल की खूबसूरती के बाद बीहड़ में यात्रा का रोमांच

#QutubMinarToCharMinar1: जब नोएडा एक्सप्रेस-वे पर लगा अब ठंड मार ही डालेगी

- Advertisement -spot_img

Related Posts

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here