#QutubMinarToCharMinar2: ताजमहल की खूबसूरती के बाद बीहड़ में यात्रा का रोमांच

पिछले पार्ट में आपने पढ़ा कि दिल्ली से आगरा तक का सफर यायावर ने कैसे तय किया. अब, ताजमहल के दीदार के बाद ग्वालियर के लिए निकलना था. सूर्यास्त से पहले चंबल की धरती पर कदम रखना था. बीहड़ के जिस इलाके को सिर्फ फिल्मों में देखा था. और किताबों में पढ़ा था. वहां से रूबरू होना है.

ताजमहल में इंट्री से पहले का गेट

ताजमहल के पास पहुंच लंबी लाइन देखकर मेरे होश ही उड़ गए. सोचा था इतनी ठंड में कौन रजाई से निकलता है. लेकिन, यहां सैर करनेवालों की कोई कमी नहीं थी. दोपहर के बारह बज रहे थे. धूप चढ़ आई थी. जिससे थोड़ी राहत मिली. बाइक को पार्किंग में लगाते ही लोगों की भीड़ लग गई. फिर से तमाम तरह के सवाल. अब, मेरे पास समय तो कम था. जल्द ही ग्वालियर के लिए निकलना था. लोगों की संख्या देखकर लग रहा था कि आज ताजमहल दीदार का सपना पूरा नहीं होगा. तभी एक शख्स मेरे पास आया. वो काफी देर से मुझ पर नजर बनाए हुए था. आते ही उसने पूछा ताजमहल देखना है क्या. मुझे लगा अजीब सवाल पूछ रहा है यहां कोई कुतुबमीनार देखने आएगा क्या. फिर भी मैंने कहा देखना तो है. लेकिन, लाइन बहुत लंबी है और मुझे ग्वालियर के लिए निकलना भी है. उसने कहा कि 600 में आपको सीधे इंट्री करा दूंगा. दो घंटे में आप घुमकर निकल सकते हैं. इतनी बड़ी रकम तो मैं देनेवाला था ही नहीं. अभी तो सफर लंबा था. फिर जब मैंने उसे बताया कि भाई मुझे हैदराबाद तक बाइक से सफर करना है. पैसों की बचत जरूरी है. फिर वो 200 पर राजी हो गया. इसके बाद कुछ ही मिनटों में हमदोनों ताजमहल कैंपस के अंदर थे.

मुहब्बत की निशानी

फोटोग्राफी के लिए भीड़

ताजमहल के अलग-अलग हिस्सों के बारे में जानकारी देते हुए मुझे अंदर लाया. दुनिया के इस सातवें आश्चर्य को देखकर खुशी भी सातवें आसमान पर थी. बचपन से जिसे किताबों और फिल्मों के जरिए जाना था. वो ऐतिहासिक इमारत सामने थी. मुगलकालीन स्थापत्य और वास्तुकला की अद्भूत निशानी है ताजमहल. संगमरमर के पत्थरों की जो चमक है. वो इतने सालों बाद भी जस की तस है. हालांकि, कई रिपोर्ट का कहना है कि ताजमहल की दीवारों पर प्रदूषण का असर हो रहा है. इसकी चमक कम पड़ रही है. लेकिन, इस एंगल पर तो मुझे कुछ पता ही नहीं चल रहा था. बस इसकी खूबसूरती पर एकटक नजर बनाए हुए था. मोहब्बत की दुनिया में आज भी चांदनी रात, यमुना नदी और ताजमहल की खूबसूरती पर न जाने कितनी शायरी और कविताएं लोग बना देते हैं. चांदनी रात में ताजमहल को देखना संभव नहीं हो सका. लेकिन, दोपहर के दो बजे भी सूरज की कड़क धूप में इसे देखने का अलग अनुभव है.

यह पोज तो जरूरी है.

ताजमहल की कुछ बातें

इतिहासकारों की मानें तो ताजमहल को बनवाने में मुगल सम्राट शाहजहां ने 32 मिलियन डॉलर खर्च किया था. करीब 20 साल में यह पूरी तरह से बनकर तैयार हुआ था. ताजमहल की खासियत इसकी मीनारों में भी छिपी हुई है. सभी मीनार एक-दूसरे की ओर झूके हुए हैं. कहा जाता है कि वास्तुकारों ने मुमताज के मकबरा को बचाने के लिए ऐसा किया था. भूकंप और बिजली जैसी प्राकृतिक आपदा आने पर मीनार मकबरा की तरफ न गिरे. इस वजह से उसे झुकाया गया था. ऐतिहासिक पुस्तकों में जिक्र है कि मकबरा की उपरी दीवार पर एक छेद बना हुआ है. कहा जाता है कि शाहजहां ने ताजमहल बनानेवाले कारिगरों के हाथ काटने का आदेश दिया था. इससे गुस्सा में आए वास्तुकारों ने इसमें छेद छोड़ दिया था. इस वजह से मकबरा में हमेशा नमी ज्यादा रहती है. हालांकि, इस मान्यता के पीछे कोई ऐतिहासिक तथ्य नहीं है. इसकी कोई पुष्टी नहीं करता है. ताजमहल की एक और खास बात इसके रंग में बदलाव को लेकर है. सूरज की रोशनी के साथ-साथ इसका रंग बदलता है. सुबह, शाम और रात में अगर आप ताजमहल को देखते हैं तो बदलते रंगों की सत्यता सामने आ जाएगी. ऐसी कई जानकारियां देते हुए गाइड मुझे ताजमहल का चक्कर लगवा रहा था. कई बातें तो दिमाग से निकल गई है. क्योंकि पूरे दो साल बाद लिखने बैठा हूं.

खूबसूरती की ओर एकटक

डायना बेंच पर फोटोबाजी

ताजमहल दीदार करनेवाले यहां डायना बेंच पर फोटोज जरूर क्लिक कराते हैं. ताजमहल का दूसरा पर्याय बन गया है डायना बेंच. दरअसल, इसका निर्माण शाहजहां ने नहीं करवाया था. सालों बाद एक अंग्रेज अफसर ने ताजमहल को देखने के लिए इसको बनवाया. साल 1992 में ब्रिटेन शाही परिवार की राजकुमारी डायना परिवार के साथ ताजमहल घुमने आई थी. यहां इस बेंच पर बैठकर उन्होंने फोटो क्लिक कराई. तब से इस बेंच का नाम डायना बेंच पड़ गया. इसपर बैठकर फोटो खिंचाने के लिए मारामारी होती है. लोगों की भीड़ लगी रहती है. लेकिन, मुझे तो जल्द निकलना था. इस वजह से डायना बेंच के चक्कर में मैं नहीं पड़ा. साइड में अकेलापन महसूस कर रहा एक बेंच पर मैं बैठ गया और इसी को डायना बेंच समझकर फोटो क्लिक करा लिया.

डायना बेंच की बहन

चंबल निकलने की तैयारी

घड़ी की सूई टक-टक चल रही थी. यहां से निकलने की इच्छा तो नहीं हो रही थी. लेकिन, आगे का सफर आसान नहीं था. ग्वालियर तक पहुंचना था. ज्यादा देर होने पर ठंड से फिर जंग लड़नी पड़ सकती थी. यही सोचकर ताजमहल से विदा लिया और बाइक पार्किंग के पास पहुंच गया. अब इतनी देर में गाइड को पता चल गया कि मैं पेशे से पत्रकार हूं. अब तो वो कई किस्से सुनाने लगा. आस-पास की कहानियां बताने लगा. पर्यटकों को होनेवाली समस्याओं से रूबरू होने लगा. साथ ही ताजमहल के पीछे यमुना किनारे होनेवाले जुआ के खेलों पर खबर बनवाने का अनुरोध करने लगा. करीब एक घंटे तक गाइड से पार्किंग में बात करने के बाद निकलने की तैयारी करने लगा. तभी गाइड बोल पड़ा भैया अगली बार परिवार के साथ आइए. आपसे पैसा नहीं लूंगा. यह सुनते ही मैं हंस पड़ा और धन्यवाद बोल धन्नो के साथ निकल गया.

आगरा टू ग्वालियर

चंबल नदी का दर्शन

अब, अपनी धन्नो आगरा टू ग्वालियर हाइवे पर चल रही थी. करीब 107 किमी का सफर तय कर बानमोर पहुंचना था. ग्वालियर से करीब 17 किमी पहले बानमोर में ही रात का ठहराव था. अपना सगा हुआ मित्र विजय सिंह राठौर का घर यहीं है. भाई तब भोपाल में रिपोर्टिंग करता था. अब ग्वालियर में ही जमा हुआ है. तो करीब 50 किमी के बाद ही हवा, पानी और बोली में बदलाव शुरू हो गया था. पान सिंह तोमर और सोनचिड़िया फिल्म अगर आपने देखी होगी. तो यहां की बोली बिल्कुल दोनों फिल्मों के संवाद से मिल रही थी. और हाइवे से कुछ ही दूरी पर मिट्टी के टीलें भी दिखने लगे थे. बिल्कुल निर्जन पहाड़ की तरह. आस-पास सिर्फ कुछ झाड़ियां और कहीं वो भी नहीं. देश की इस नई भौगोलिक स्वरूप से मुझमें रोमांच का संचार हो रहा था. इधर सूरज भी डूबने को तैयार था और ठंड धीरे-धीरे बढ़ने लगी थी. मुझे फिर नोएडा एक्सप्रेसवे की याद आ गई और मैंने जल्द ही स्लेटर पर दबाव बढ़ा दिया. सड़कें तो चौड़ी बनी हुई है. लेकिन, इधर लोगों का कोई भरोसा नहीं. पता नहीं कब, किधर से मेन रोड पर आ जा रहे थे. गाड़ियों से बिल्कुल डर नहीं. खैर, पहली बार चंबल नदी को देखा और मुझे अविरल बहती नदियों से गजब का प्यार है. धन्नो को रोककर चंबल की खूबसूरती देखी. लोगों ने बताया कि यह एरिया घड़ियालों के लिए सुरक्षित है. नदी में बड़ी संख्या में घड़ियाल पाए जाते हैं. हालांकि, मुझे देर हो रही थी और किसी तरह बानमोर पहुंचना था. तो मैं जल्द ही निकल पड़ा.

बीहड़ में चंबल की धार

बानमोर में हुई एंट्री

अंधेरा होने से पहले ही मैं निश्चित स्थान पर पहुंच चुका था. मित्र विजय के परिजनों से मुलाकात हुई. क्या कहा जाए. परिवार के सदस्य की तरह मेरा स्वागत हुआ. हालांकि, विजय आधी रात तक घर पहुंचनेवाला था. लेकिन, उसने मेरे पहुंचने की जानकारी पहले ही दे दी थी. बेफिक्र होकर नाश्ते का लुत्फ उठाया गया. इसके बाद फिर शुरू हुआ बातचीत का दौर. कई लोग तो बाइक के पास आकर खड़े हो गए. तमाम तरह के सवाल फिर विजय के भाई से लोग पूछने लगे. मैं पहले हंसता फिर जवाब देता. लेकिन, मजा भरचूक आ रहा था.

अगली कड़ी में पढ़ें बीहड़ के कई इलाकों में कैसा रहा सफर

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