बड़ी मुश्किल होती है दो साल के बाद उस यात्रा के बारे में लिखना. उस उत्साह और रोमांच को शब्दों में उतार पाना. फिर भी कोशिश किया हूं. कुतुबमीनार से चारमीनार तक बाइक से की गई यात्रा वृतांत को शब्दों में पिरोने का. जी हां, दिल्ली से हैदराबाद के सफर से मुझमें काफी बदलाव हुआ. भारतवर्ष को देखने का संकल्प और भी मजबूत हुआ. हाड़ कंपा देनेवाली ठंड के बीच बाइक से नॉर्थ टू साउथ का सफर रोमांच से भरा रहा.

देर रात तक पैकिंग चलती रही. सुबह दिल्ली से हैदराबाद के लिए निकलना था. उत्साह चरम पर था. लेह-लद्दाख के बाद यह दूसरी सबसे लंबी रोड ट्रिप पर निकलनेवाला था. लेकिन इस बार सिर्फ मैं और मेरी धन्नो. और सबसे बड़ी चुनौती ठंड की थी. महीना जनवरी का. शहर दिल्ली. आप समझ सकते हैं. जनवरी में नॉर्थ इंडिया की आबोहवा कैसी होती है. तमाम लोगों ने मना भी किया. फिर भी मैं और मेरी यात्रा अटल थी. धन्नो पर लगेज को रात में ही बांध दिया. फिर सोने की कोशिश की. लेकिन, बार-बार नींद खुल जा रही थी. किसी तरह दो-तीन घंटे की झपकी लगी. और अलार्म से नींद खुली. फटाफट तैयार हुआ. क्योंकि सुबह के 6 बज रहे थे. अब तक तो निकल जाना था. खैर, फ्रेश होने के बाद भाई को जगाया. वो भाई जिसने हमेशा प्रोत्साहित किया. सफलतापूर्वक यात्रा पूरी होने की शुभकामनाएं दी. और गले लगकर हस्तिनापुर से विदा किया.

उजाला हो गया था. लेकिन, दिल्ली अब तक सोई थी. सड़क पर सन्नाटा था. सिर्फ स्कूल जानेवाले छोटे बच्चे ठंड को मात देते दिख रहे थे. हाथ में थर्मस और पीठ पर भविष्य का बोझ लिए वो स्कूल बस का इंतजार कर रहे थे. मोहल्ले से निकला तो सीधा टारगेट नोएडा एक्सप्रेसवे पकड़ना था. उसी से आगरा तक निकलना था. फिर ताजमहल का दीदार कर ग्वालियर तक पहुंचना था. कुहासा ऐसा कि आगे कुछ दिख ही नहीं आ रहा था. गाड़ियों की लाइट से ही पता चल रहा था कि सामने से कुछ आ रहा है. नोएडा एक्सप्रेसवे तक पहुंचने में डेढ़ घंटे लग गए. अब और ज्यादा चुनौती थी. नोएडा एक्सप्रेसवे पर गाड़ियों की रफ्तार काफी तेज थी. कुहासे की वजह से विजिबिलिटी काफी कम. साथ ही पहली बार ऐसी सड़क पर बाइक दौड़ा रहा था. दस्ताना होने के बावजूद ठंड से हथेलियां ठिठुरने लगी थी. ग्रिप पूरी तरह से बन नहीं रहा था. और तेज हवा से आंखें बंद हो जा रही थी. क्योंकि कुहासे की वजह से हेलमेट का शिशा ऊपर करना पड़ रहा था. कई बार नोएडा एक्सप्रेसवे पर हर दिन होने वाली दुर्घटनाओं की तस्वीरें दिमाग में आ जाती थी. 100 किमी के बाद ही लग रहा था कि अब आगे नहीं चल पाएंगे. फैसला गलत था. फिर एक्सप्रेसवे के किनारे बाइक रोकी. उतरकर कुछ देर आराम से बैठा रहा. कुछ दूर खेतों में बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे. उन्हें निहारता रहा. आत्मविश्वास को जगाया. खुद को हिम्मत दिया. और सफर को पूरा करने के लिए फिर से निकल पड़ा.

अब सीधा टारगेट ताजमहल था. धन्नो की रफ्तार तेज कर दी. जैसे ही साइनबोर्ड पर ताजमहल 50 किमी दिखा तो राहत की सांस ली. ठंड अभी भी हिम्मत को हराने की भरपूर कोशिश कर रही थी. हवा चिटर और स्वेटर से अंदर घुसकर सीधे छाती पर हमला बोल रही थी. कुछ ही दूर आगे बढ़ने पर हल्की सी धूप आई. फिर से बाइक रोक दी. कुछ देर तक तो भगवान भास्कर से राहत मिली. लेकिन, कुहासा कहां पीछा छोड़नेवाला था. आंखों के आगे फिर से धूंध छाने लगा. और हमने स्लेटर पर दबाव बढ़ा दिया. एक्सप्रेसवे से आगरा शहर की ओर मुड़ते ही माहौल बदला हुआ दिख रहा था. 12 बजे के करीब लोग अलाव के सामने बैठे थे. हल्की धूप भी चढ़ गई थी. एक दुकान के आगे बाइक लगाई. गर्म-गर्म कचौड़ी और लिट्टी देख मन ललच गया. तुरंत ऑर्डर दिया. भाई कुछ खिला दो. अब खिलाने से पहले लोग सवाल करने लगे. कहां से आ रहे हो. कहां जाना है. इतनी ठंड में नहीं निकलना था. कैसे ग्वालियर तक आज जाओगे. इन सवालों का जवाब देने के दौरान लग रहा था कि ठंड से शरीर सिकुड़ सा गया है. बिना देर किए मैं कोयले के चूल्हे के पास पहुंच गया. करीब 15 से 20 मिनट तक उसकी आग से ठंड को मात देता रहा. फिर गर्म-गर्म जलेबी और कचौड़ी से राहत मिली. लोगों से विदा लिया और ताजमहल के दीदार के लिए निकल पड़ा. उत्साह चरम पर था. पहली बार ताजमहल को सामने से देख रहा था. अब तक फिल्मों और किताबों में पढ़ा था. मोहब्बत की इस निशानी को देखने की खुशी गजब की थी. इसकी एक और वजह थी. मैंने माउंटेनमैन दशरथ मांझी की उस सड़क को भी देखा था. जिसे उन्होंने पत्नी के लिए बना दिया था. अब, एक बादशाह और दूसरा अनजान सा इंसान की मोहब्बत के फर्क को समझना था. यही सब सोचते-सोचते दुनिया के सातवें आश्चर्य में शामिल ताजमहल के पास मैं पहुंच गया.

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