PART-3: साउथ में बैंबू चिकेन खाना हो तो पापीकोंडालू जरूर आएं

घूमने के शौकिनों से माफी मांगनी पड़ रही है. करीब दो महीने बाद पापीकोंडालू यात्रा की तीसरी कड़ी लिख रहा हूं. इस बीच कई नई जगहों से रुबरू हुआ हूं. उसकी कहानी भी आपको बताए बिना तो रह नहीं पाऊंगा. लेकिन, इससे पहले आपको लिए चलता हूं पापीकोंडालू जहां यायावर को रात बितानी थी. पिछली पोस्ट में आपने पढ़ा था कि बेहद रोमांचक यात्रा तय कर आपका साथी यहां तक पहुंचा था. अब पढ़ें, आगे की यायावरी.

शाम चार बजे के करीब पापीकोंडालू के पास कोलूर गांव पहुंच चुका था. स्टीमर से उतरते ही लग रहा था कि किसी टापू पर पहुंच चुका हूं. चारों ओर ऊंची-ऊंची पहाड़ियां दिख रही थी. वो भी निर्जन नहीं. बल्कि, घने जंगल वाली खूबसूरत पहाड़ियां. सामने गोदावरी बह रही थी. लग रहा था समंदर के बीच में किसी ऊंची जगह पर नाव आकर ठहर गया हो. कुछ देर तक रेत पर मस्ती करते रहे. फिर कोलुर गांव की तरफ आगे बढ़ गए. कहने को तो गांव. लेकिन 20 से ज्यादा घर यहां नहीं होंगे. पूरा गांव आदिवासियों का है. जो इस खूबसूरत जगह के राजा कहलाते हैं. बांस की फट्टियों से इनका मकान नहीं घर बना हुआ है. बिजली तो नहीं है. लेकिन, टीवी और लाइट के लिए सोलर का इस्तेमाल किया जाता है.


भाषा नहीं इशारों से काम
साथ में कुछ प्रेमी जोड़े भी यहां पहुंचे थे. टेंट मिलने के बाद ही वो प्रकृति की खुबसूरती में खो गए थे. कुछ देर बाद गेस्ट हाउस की ओर से नाश्ता दिया गया. सभी को अगले दिन तक का टोकन दिया गया. इसको दिखाकर ही नाश्ता और खाना मिलना था. मोबाइल चार्जिंग की व्यवस्था टेंट से दूर एक दुकान में की गई थी. कुछ जरूरी सामान भी यहां मिलता था. कुछ देर तक आराम करने के बाद हम बैंबू चिकन की खोज में निकल गए. बताया गया कि पीछे गांव में आदिवासी लोग बनाते हैं. गेस्ट हाउस वाले भी मंगाते थे. लेकिन, असली मजा तो उसे बनते देखने में था. यही सोचकर सहयात्री के साथ बैंबू चिकेन की तलाश में निकल पड़े. गांव में अंदर घुसते ही कई घरों के आगे बांस में रखकर चिकेन को पकाया जा रहा था. नजर पड़ते ही एक घर के सामने हम पहुंच गए. भाषा तो अलग थी. लेकिन, भावनाओं को हर जगह लोग समझ ही जाते हैं.

ऐसे बनता है बैंबू चिकेन
सबसे पहले हमने बैंबू चिकेन बनाने के तरीकों को समझा. चीकेन को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर सभी तरह के मसाले लपेट दिए जाते हैं. इसके बाद बांस की लकड़ी के अगले हिस्से को निकालकर उसमें चिकेन डाल दिया जाता है. फिर जंगल के पत्तों को आगे से रखकर बंद कर दिया जाता है. करीब आधे घंटे तक बांस की लकड़ी को आग पर रख दिया जाता है. उसे हर दस मिनट बाद घूमाया जाता है. सबसे खास बात ये है कि लकड़ी जलती नहीं है. पकने के बाद चीकेन निकाल लिया जाता है. बांस की लकड़ी का इस्तेमाल फिर से किया जाता है. चीकेन पकने के दौरान ही अलग तरह की खुशबू निकलने लगती है. लग रहा था आग से निकालकर खा लिय जाए. इशारों में ही बनानेवाले से कुछ देर बात हुई. फिर, हमलोगों के लिए बैंबू चिकेन पत्ते में परोसा गया. स्वाद तो गजब का था. मतलब हम तो मुरीद ही हो गए इस खास तरह के चीकेन का. अजीब बात तो ये है कि मात्र 100 रुपये में बैंबू चिकेन लोगों को यहां दिया जाता है.

मोबाइल की रोशनी में बढ़ते कदम
बैंबू चिकन खाते-खाते अंधेरा हो गया था. आसमान में तारे टिमटिमा रहे थे. सालों बाद तारों की इतनी बड़ी तादाद देखने को मिल रही थी. लग रहा था कि बचपन में जब घर के आगे सोया करते थे तो यूं ही तारे आसमान में नजर आते थे. मोबाइल की रोशनी में हमलोग अपने टेंट की ओर बढ़ रहे थे. हल्की-हल्की हवा बह रही थी जो जंगल की शांति में डर पैदा कर रही थी. काफी दूर ऊंची पहाड़ी पर रोशनी दिख रही थी. बताया गया कि आदिवासी लोग वहां पर पत्ते जला रहे हैं. मोबाइल नेटवर्क तो था ही नहीं. ऐसा लग रहा था कि पूरी दुनिया से अलग किसी जगह पर पहुंच गए हैं. लेकिन, इसका मजा ही कुछ और है. बिल्कुल अनजान जगह. जहां कोई आपकी भाषा भी नहीं समझ रहा हो. कोई जाननेवाला ही नहीं हो. आपकी कोई पहचान ही नहीं हो. यहां आकर गजब का अनुभव हो रहा था. बातचीत करते-करते रात के करीब 8 बज गए. कुछ ही देर में गेस्ट हाउस की ओर से भोजन दिया जाना था. क्योंकि, 9 बजे के बाद यहां सोना ही अंतिम विकल्प है. या फिर दोस्तों के साथ पार्टी करना.कई ग्रुप पास में ही वाइन पार्टी का लुत्फ उठा रहे थे. इस जंगल में वो खुद को सबसे खुशनसीब समझ रहे थे.


ताजी मछलियों का स्वाद
सभी लोगों को खाने के लिए बुला लिया गया. वहीं, पर एक झोपड़ी बनाया गया था. जिसके ऊपर में केवल लकड़ी का छत बनाया गया था. जबकि, चारों ओर से खुला हुआ था. बांस से चारों कोनों पर झोपड़ी को सहारा दिया गया था. यहां सभी को वेजिटेरियन और नॉनवेजिटेरियन दोनों का ख्याल रखा गया था. खैर, हम तो बैंबू चिकेन के बाद भी दोबारा मछली पर टूट पड़े. गोदावरी नदी से निकाली गई ताजी मछलियों को बनाया गया था. भई, गजब का स्वाद था. मछली-चावल के अलावा दूसरी ओर हमने ध्यान ही नहीं दिया. हां, कुछ चीकेन के पीस का भी टेस्ट किया गया. भोजन करने के बाद हमलोग अपने टेंट में वापस लौट आए. थकान होने की वजह से नींद भी आ रही थी. मोबाइल तो चल नहीं रहा था. फोटो खींचने के लिए बैट्री भी बचाकर रखना था. इस वजह से कुछ देर तक बाहर टहलने के लिए निकल पड़े. टेंट के बाहर दोस्तों की टोली जमकर मस्ती कर रही थी. एक ओर मदिरापान का लुत्फ उठाया जा रहा था. तो दूसरी टोली धूएं उड़ा रही थी. हमें भी न्योता मिला. लेकिन, हमने नो थैंक्स कह दिया. इसके बाद वापस टेंट में आकर बिस्तर पर लेट गए. दरवाजे के तरफ से टेंट को हटा दिया गया. अब आसमान में साफ तारे दिख रहे थे. अंधेरी रात में तारों का टिमटिमाना क्या पता क्यों इतना अच्छा लग रहा था. दिल और दिमाग में कई ख्याल आ रहे थे. शहर का भागदौड़. ट्रेन की तरह भागते लोग. एक-दूसरे को पीछे छोड़ कुछ पा लेने की होड़ में लगी एक बड़ी आबादी. यहां सबकुछ अलग था. रात 9 बजे के करीब गांव में लोग सो चुके थे. चारों ओर सन्नाटा था. जंगल से चलनेवाली हवा और कुछ जानवरों की आवाज केवल महसूस कर रहे थे. इस तरह से पता नहीं कब नींद आ गई.

अगली कड़ी में पढ़ें पापीकोंडालू में की गई ट्रैकिंग और वापसी का सफर
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1 COMMENT

  1. जबरदस्त अभी भी याद आते है वो दिन आपने साबित कर दिया मैं गलत था मैं फिर से जाना चाहूंगा

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