स्पिति यात्रा का आज तीसरा दिन है। नारकंडा से करीब 15 किमी पहले अंधेरा होने पर रूक गया था। सुबह नींद खुली तो सबसे पहले खिड़की खोली। बाहर का नजारा देखते ही तत्काल बिस्तर छोड़ दिया। बाहर निकला तो कुछ देर तक देखता ही रह गया। लग रहा था ऊंचे पहाड़ों से बादल हमारी ओर दोस्ती का हाथ बढ़ा रहा है। ठंडी हवाओं के झोंके से चेहरे पर गजब की ताजगी महसूस हो रही थी। होटल की दीवार और पहाड़ सटे हुए थे। सेब की खेती भी स्थानीय लोग किए हुए थे।

पहाड़ों में खेती बड़ी चुनौती
पहाड़ों में खेती भी बड़ी चुनौती होती है। सेब की भी खेती को जानने-समझने के लिए होटल से निकल पहाड़ों की ओर बढ़ गए। सेब के पेड़ों को जाली से ढका गया था। जाली पूरी तरह से मच्छरदानी की तरह दिख रही थी। पेड़ों में लगे सेब अभी पूरी तरह से कच्चे थे। रखवाली कर रहे शख्स ने बताया कि अक्टूबर से माल निकलना शुरू हो जाता है। कीट-पतंगों से बचाने के लिए जाली लगाई जाती है। सेब के पेड़ों के बीच कुछ फोटोग्राफी करते हुए आगे और बढ़ गए। पहाड़ों में थोड़ी चढ़ाई करने पर मिट्टी का छोटा सा घर दिखा। बिल्कुल छोटे दरवाजे। जैसे पहले हमारे गांव में हुआ करते थे। सिर झुकाकर अंदर जाना होता था। घर के बाहर किनारे में एक छोटा सा स्टोरेज कमरा दिखा। उसमें खेती से जुड़ा औजार रखा जाता है। इसका दरवाजा और उसमें लगी कुंडी में गजब का आकर्षण है।

जमीन पहाड़ का, खेती दिल्ली के बिजनेसमैन का
बातचीत में पता चला कि जमीन लोकल पहाड़ के व्यक्ति की है। सेब की खेती दिल्ली का बिजनेसमैन कराता है। काम करने वाले नेपाल से आए हुए हैं। उन्होंने बताया कि पूरे साल काम करने का कॉन्ट्रैक्ट होता है। हमलोग परिवार के साथ साल भर इसी घर में रहते हैं। सर्दियों में लकड़ियां ही सहारा होती है। कुछ तस्वीरें उतारने के बाद वापस होटल की तरफ आ गया। अब यहां से निकल रहा था। सबसे पहला टारगेट नारकंडा में हाटू पीक जाना था। हाटू पीक जिसे हाटू माता मंदिर भी बोलते हैं। इसकी ऊंचाई करीब 11 हजार 200 फीट है। बेहतरीन नाश्ता निपटाने के बाद नारकंडा की ओर चल पड़े। हसीन वादियों से होते हुए करीब एक घंटे में नारकंडा पहुंच गया।

हाटू पिक का रास्ता बेहद संकरा और खतरनाक
यहां से शुरु हुई हाटू पीक की चढ़ाई। कहने को तो मंदिर तक सड़क बनी हुई है। लेकिन, बेहद संकरा रास्ता है। जैसे-जैसे ऊपर चलते हैं तीखे मोड़ आते हैं। ऐसे मोड़ जिसके एक तरफ गहरी खाई है, दूसरी तरफ पहाड़, आगे की ओर सीधी चढ़ाई और पीछे से चढ़ती दूसरी गाड़ियां। इनके बीच ऊपर चढ़ना फुल एडवेंचर देता है। कई बार डर से गला भी सूख जाता है। क्योंकि, हाटू पीक आप गाड़ी लेकर लोकल ड्राइवर के साथ ही चढ़ें। या फिर आप पहाड़ों के पूरी तरह से अनुभवी ड्राइवर हैं। हमारे पास न तो लोकल ड्राइवर थे, न ही हम पहाड़ों के अनुभवी ड्राइवर। फिर भी सावधानी और हिम्मत दिखाते हुए 11 हजार 200 फीट तक चढ़ गए। इस दौरान एक जगह गाड़ी हल्की पीछे आ गई। क्योंकि आगे मुड़ने की जगह नहीं थी। पीछे वाली गाड़ी बिल्कुल नजदीक आ गई थी। अब हमें कुछ इंच पीछे आकर गा़ड़ी ऊपर ले जानी थी। इस दौरान अपनी उर्मिला पीछे वाली गाड़ी से थोड़ी नमस्कार-चमत्कार कर ली। यहां सबसे मजेदार बात ये थी कि जिन्होंने कुछ देर पहले हमारी मदद की थी। उन्हीं की गाड़ी में जाकर सट गई। अब हम दोनों एक-दूसरे को सिर्फ देखते रह गए।

भीम का चूल्हा भी मौजूद
आठ किमी की दूरी तय करने में करीब एक घंटे लग गए। हाटू पीक पहुंचा तो सबसे पहले हाटू माता मंदिर की ओर निकल पड़ा। एक छोटा सा मंदिर। पूरी तरह से लकड़ी की बनी हुई है। यहां दो तरह की मान्यताएं हैं। पहली यह है कि रावण की पत्नी मंदोदरी यहां आकर हाटू माता की पूजा करती थी। उन्होंने ही सबसे पहले इसका निर्माण कराया था। दूसरी मान्यता महाभारत काल से जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि अज्ञातवास के दौरान पांडव कुछ दिन यहां ठहरे थे। कई चूल्हे की आकृति नजर आती है, जिसे स्थानीय लोग भीम का चूल्हा बोलते हैं। सर्दियों में यह जगह पूरी तरह से बर्फ से ढक जाता है। यहां पर रात में रूकने के लिए छोटा सा गेस्ट हाउस भी है, जो मंदिर ट्रस्ट चलाती है।

सारी थकान गायब
हाटू माता मंदिर में कुछ देर रूकने के बाद दूसरी तरफ निकल गया। वहां से नजारे शानदार दिखते हैं। हाटू पीक की असली खूबसूरती यहीं से नजर आती है। हवा के झोंके यहां पर ऐसे आपको छूते हैं कि लगेगा चीर के जंगलों की ओर लेकर जाएगा। कुछ देर आंखें बंद कर यहां बैठ जाइए। आपकी सारी थकान गायब महसूस होगी। इस जगह को कुदरत ने भरपूर प्यार दिया है। उस प्यार के कुछ छींटे आप पर भी पड़ेंगे।
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