मलाना यात्रा की यह अंतिम कड़ी है. गेस्ट हाउस से निकलने के लिए सभी लोग तैयार हो गए. मैंने अपना पिठु बैग साथ चलनेवाले शख्स को दे दिया. बाहर निकलते ही डर लगने लगा था. रास्ता कहीं दिख ही नहीं रहा था. सबसे आगे लांपला चल रहा था. उसके पीछे मैं और फिर पूरी टीम. हल्की-हल्की बर्फबारी भी हो रही थी. धीरे-धीरे हमलोग आगे निकल रहे थे. बर्फबारी को देख कई बार सांसे थम जा रही थी. मलाना के ग्रामीण भी जाने से मना कर रहे थे. उन्हें पता था कि आगे का रास्ता काफी खतरनाक हो सकता है. मेरे पास सामान नहीं था. इस वजह से चलने में आसानी हो रही थी. सभी के हाथों में मैंने डंडा दिलवा दिया था. इससे रास्ता पता करने में मदद मिल रही थी.

चलते ही जाना है
जिस अनजान रास्ते पर हमलोग चल रहे थे. उसके एक तरफ हजारों फीट गहरी खाई थी. वहीं, दूसरी तरफ चट्टान. चट्टानों से भी जमे हुए बर्फ गिर रहे थे. ये भी डर था कि अगर वो सर पर गिर जाए तो समझो मौत ही आ गई. लांपला को जरा भी डर नहीं लग रहा था. वो सर पर सुटकेस और पीठ पर मेरा बैग रखकर आगे चल रहा था.कई बार उसे रोकना पड़ता था. क्योंकि सभी को साथ में उतरना था. शुरुआती आधे घंटे में ही दम फुलने लगा था. फिर भी मैं लोगों का उत्साह बढ़ा रहा था. एक तरह से टीम का कैप्टन मैं ही हो गया था.

मलाना के दो साथी
इस भीषण बर्फबारी में भी मलाना की महिलाएं लकड़ी काटने के लिए निकल रही थी. उन्हें देखकर काफी आश्चर्य हो रहा था. दो बार तो पैर भी फिसल गया. संयोग अच्छा था कि खाई की तरफ नहीं गिरे. खड़े होकर फिर से चलने लगे. जैसे-जैसे कदम आगे बढ़ रहे थे. मौत से निकलने जैसा एहसास हो रहा था. दरअसल, बर्फ के बीच चलने का यह पहला अनुभव था. संयोग से मलाना गांव के दो ‘साथी’ भी मिल गए. जो अंतिम यात्रा तक रास्ता दिखाते रहे. उनके बनाए गए पैर के रास्तों पर ही हम चल रहे थे. दरअसल वो साथी गांव के दो वफादार कुत्ते थे. दोनों ने अंतिम पड़ाव तक सबों का साथ दिया.

आगे का सफर आसान नहीं
कई बार हौसला बढ़ाने के लिए नारे भी लगाने पड़ रहे थे. करीब 3 घंटे के बाद सभी लोग मलाना गांव की पहाड़ियों से नीचे सड़क तक पहुंच सके. यहां सभी ने चाय पीकर ठंड को कम किया. सभी लोग राहत की सांस ले रहे थे. लेकिन, असली जंग तो अभी बाकी है. आगे का सफर इतना आसान नहीं है. करीब 15 किमी चलकर जरी मार्केट तक पहुंचना था. ललीत जी ने बताया था कि 3-4 किमी चलने पर कोई गाड़ी मिल जाएगी. लेकिन, बर्फबारी को देखकर ऐसा लग नहीं रहा था.

दिन में भी अंधेरा
कुछ देर बाद सभी साथियों को हिम्मत जगाकर आगे बढने के लिए मोटिवेट किया. अब, हमारे साथ कोई भी जानकार नहीं था. सिर्फ 4 पैरों वाले दो साथियों के. मलाना से आनेवाला लांपला भी वापस गांव की ओर मुड़ गया था. हमलोग धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे. चारों ओर बादल की वजह से अंधेरा लगा रहा था. पहाड़ों पर बर्फ ही बर्फ दिख रहा था. पेड़ सफेद दिख रहे थे. अजीब सा सन्नाटे के बीच हमलोग आगे बढ़ रहे थे. अब, तो पीठ पर वजन भी आ गया था. 2 किमी चलने में 3 घंटे लग गए थे. कई साथी तो एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पा रहे थे. क्योंकि डर और थकान पूरी तरह हावी हो गया था.

डर के आगे जीत है
बर्फ की वजह से रास्ता बिल्कुल नहीं दिख रहा था. लगता था अगला कदम अंतिम न हो जाए. हालांकि, हमारे आगे-आगे अभी भी मलाना के दो वफादार साथी चल रहे थे. वो जो हमें रास्ता दिखा रहे थे. उसी पर हमारा कदम बढ़ रहा था. बर्फ में कई बार पैर पूरी तरह धंस जा रहा था. जूते के अंदर पानी की ठंडक पहुंच गई थी. जिससे पूरा शरीर कांप रहा था. इस बीच पहाड़ों के गिरने की भी आवाज आ रही थी. दूर कहीं लैंडस्लाइड हो रहा था. उसकी भयानक आवाजों से सभी की हालत खराब हो रही थी. हिम्मत जवाब दे रहा था. फिर भी कदम दर कदम हमलोग आगे किसी तरह बढ़ रहे थे.
शाम से पहले पहुंचने का लक्ष्य
सभी साथी सोच लिए थे कि शाम तक किसी भी हाल में जरी तक पहुंचना है. अगर ऐसा नहीं हुआ तो पूरी रात बर्फबारी में इन पहाड़ों में रूकना पड़ेगा. फिर जान बचने की कोई उम्मीद ही नहीं है. बीच रास्ते में थोड़ी देर रूकने में भी डर लग रहा था. अंधेरा होने पर तो बिल्कुल नहीं चल सकते थे. किसी तरह हमलोग आगे बढ़ रहे थे. एक दो जगह पर पहाड़ों के अंदर कुछ लकड़ियां जलती दिखी. साथियों ने कुछ देर तक वहां गर्माहट ली. लेकिन, आगे तो चलना ही था.

सुरंग में आराम
एक-दो को छोड़कर सभी का मोबाइल भी स्विच ऑफ हो चुका था. नेटवर्क भी नहीं था. ऐसे में रेस्कयू भी मुश्किल लग रहा था. किसी भी तरह से हम बाहर के लोगों से कनेक्ट नहीं हो पा रहे थे. इस बीच कुछ देर तक पास के ही सुरंग में कुछ देर तक हमलोग रूक गए. वहां बर्फबारी नहीं थी. ठंड इतनी कि कुछ लोग सफर के चार पैरों वाले साथी से लिपट कर जकड़न को कम करने की कोशिश कर रहे थे. कभी उसे पुचकारते. कभी उसे गोद में पकड़ते. फिर से लोगों का उत्साह बढ़ाया गया.

गाड़ी पर पड़ी नजर
मौत का डर तो सामने था ही. लिहाजा लोग चल पड़े. करीब 5 से 6 घंटा चलने के बाद सभी लोग जरी से 4 किमी पहले तक पहुंच गए थे. यानी 10 से 11 किमी का सफर तय कर चुके थे. अब सड़क दिख रही थी. बर्फबारी भी कम हो गई थी. सड़क पर बर्फ की मोटी चादर नहीं थी. लेकिन, बर्फ से ज्यादा मुश्किल हो रहा था सड़क पर जमे हुए पानी से निकलकर चलना. तभी एक की नजर पहाड़ी से दूर खड़ी एक गाड़ी पर पड़ी. देखते ही लोगों को लगा कि कोई मसीहा दिख गया हो. सभी ने राहत की सांस ली. लेकिन, ये भी डर था कि वो खराब है या लोगों को ले जाएगा की नहीं.

दिल्ली वाली बस
किसी तरह चलकर लोग गाड़ी के पास पहुंचे. ड्राइवर को ईश्वर का दूत समझकर बड़े ही प्यार से सभी ने बात की. जरी तक छोड़ने का अनुरोध किया. कहते हैं ना कि भलामानुष हर जगह है. वो सभी को जरी तक ले जाने को तैयार हो गया. कुछ ही देर में हमलोग गाड़ी में सवार हो गए. आधे घंटे का सफर तय करने के बाद हमलोग जरी पहुंच गए. यहां से मुझे सीधे भूंतर निकलना था. फिर दिल्ली की बस पकड़नी थी. बाकी लोगों को कसोल की ओर निकलना था. गाड़ीवाले को लख-लख धन्यवाद के साथ कुछ पैसे देकर मैं जरी में उतर गया. यहां से भूंतर के लिए तुरंत बस मिल गई. संयोग अच्छा था कि भूंतर से भी रात 10 के करीब बस दिल्ली के लिए थी. टिकट कटाकर तुरंत मैं एसी बस में सवार हो गया.

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