स्पिति यात्रा का आज तीसरा दिन है। हाटू माता मंदिर से निकलने के बाद हमलोगों का टारगेट हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले का कल्पा या चितकुल था। किन्नौर हिमाचल के दुर्गम इलाकों में आता है। काफी सालों तक यह पर्यटकों से अछूता रहा था। क्योंकि यहां तक पहुंचने के रास्ते काफी दुर्गम थे। दुर्गम तो अभी भी है। लेकिन, रास्ते काफी हद तक बने हुए हैं। इसके ज्यादातर इलाके तिब्तत-चीन की सीमा से लगता है। शिमला से इसकी दूरी करीब 250 किमी है। इस सफर की दुर्गमता की झलक हाटू पीक से मिल गई थी।

पहाड़ों में तीन घंटे तक भटकता रहा
यहां से निकलते ही हाईवे से रामपुर बुशर होते हुए आगे निकलना था। लेकिन, गलती से दूसरा रास्ता पकड़ लिया। यही गलती हमारे लिए सफर के मजे को डबल कर दिया। हिमाचल के ग्रामीण इलाकों से रूबरू होने का मौका मिल गया। सिंगल घुमावदार सड़कों पर चलता रहा। हाईवे का रास्ता मिल ही नहीं रहा था। पहाड़ों में करीब 3 घंटे तक घूमता रहा। लेकिन, रामपुर बुशरा सड़क नहीं मिली। भूख भी लग गई थी। सड़क किनारे सेब के पेड़ नजर आए। ज्यादातर तो कच्चे थे। लेकिन, कुछ पके हुए भी दिखे। हम मैदानी इलाके के लोग अमरूद की तरह उसे तोड़ पेट की आग को सबसे पहले शांत किया। मैं तो पहली बार इस तरह से सेब खा रहा था। टेस्ट भी बिल्कुल अलग था।

250 में आलू बुखारा का कार्टून लिया
सेब खाकर निकला तो एक छोटे से घर के पास एक किसान कोई फल पैकेजिंग कर रहा था। सच बताऊं तो मैं नहीं पहचानता था। उनसे पूछा तो बताया कि यह आलू बुखारा है। यहां हमलोग पैकेजिंग कर रखते हैं। ठेकेदार खरीद कर ले जाते हैं। मात्र 250 में आलू बुखारा पूरा बड़ा सा कार्टून हमलोगों को मिल गया। हल्की नमकीन, ज्यादा मीठा, अंदर में रस भी। स्वाद जबरदस्त लगा। अगर हाईवे से निकल गए होते तो यात्रा के इस सुख से वंचित रह जाता।

पहाड़ों में माइलस्टोन बहुत कम दिखता है
खैर, इस पहाड़ से उस पहाड़ का चक्कर लगाते हुए दूर से नीचे ढलान पर हाईवे नजर आया। पहाड़ों में रिमोट एरिया में जब आप घुस जाते हैं तो वहां साइन बोर्ड कम नजर आता है। कई जगह पर स्थानीय लोगों ने रास्ता भी बताया। लेकिन, जहां से मुड़ने को वो बोलते थे। वो समझ ही नहीं आता था। क्योंकि, वहां कुछ उस तरह का साइन नहीं दिखता था। स्थानीय लोगों का अपना कुछ चिन्ह या लैंडमार्क होता है, जिसे वे समझ लेते हैं। हम मैदानी इलाके के लोगों को बाकायदा डॉयरेक्शन के साथ जगह का नाम और ऐरो से दिशा भी लिखा हुआ चाहिए।

किन्नौर की वादियों में हुई एंट्री
रास्ता भूलने की यह गलती हमारे लिए शानदार अनुभव लेकर आई। यात्रा के रोमांच को बढ़ा दी। हाईवे पकड़ते ही फिर हमलोग आगे की ओर निकल पड़े। रामपुर बुशरा क्रॉस करने के बाद सड़कें किन्नौर की अनुभूति कराने लगी थी। इधर, अंधेरा भी होने लगा था और सूर्यास्त के बाद मेरी फिर वही आदत सामने आ जाती है। पहाड़ों में मैं अंधेरे में नहीं चलता हूं। तो कहीं रूकने की व्यवस्था देखने लगा। मौसम भी बढ़ियां हो गया था।

कई वॉटरफॉल नजर आता है
हल्की बारिश ने पहाड़ों की खूबसूरती को बढ़ा दिया था। सड़कें भी चमक रही थी। उर्मिला के शीशों पर पड़ने वाली पानी की बूंदों से होते हुए आगे बादलों को देखना काफी अच्छा लग रहा था। गाड़ी की स्पीड कम कर मौसम का लुत्फ उठा रहे थे। इस बीच ही किन्नौर का एंट्री गेट दिख गया। आपका किन्नौर में स्वागत है। इसके ठीक आगे हाईवे किनारे खूबसूरत वॉटरफॉल नजर आया। इसकी खूबसूरती को महसूस करने के लिए गाड़ी से उतर गया। कुछ देर यहीं से पहाड़ और गिरते पानी को देखता रहा। अद्भूत दृश्य, बेहद खूबसूरत, पानी का रंग इतना साफ की लग रहा था कि पहाड़ों से दूध की धारा बह रही हो। कुछ देर तक यहां फोटो-वीडियो करने के बाद आगे की ओर निकल पड़े।

रात टेंट में बिताया
पता चला कि आगे तारांडा माता का मंदिर है, एक हाइड्रो प्रोजेक्ट है। कहा जाता है कि इस जगह पर निर्माण नहीं हो पा रहा था। स्थानीय लोगों ने बीआरओ (बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन) की टीम को माता की पूजा करने के लिए कहा। यहां पूजा की गई। फिर निर्माण काम पूरा हुआ। इधर से गुजरनेवाली हर गाड़ी इस जगह पर रूकती है। माता का दर्शन लोग करते हैं। इसके बाद आगे बढ़ते हैं। हमलोग भी रूक गए। माता को प्रणाम कर आगे बढ़े। कुछ दूर आगे जाने पर एक खूबसूरत सा होटल दिखा। छोटे से बाजार में। वहीं रात्रि विश्राम के लिए रूक गया। अगले दिन का टारगेट कल्पा रहेगा…
