PART2: कश्मीर की मेहमानवाजी कभी भुलाई नहीं जा सकती

आप यायावरी कर रहीं पत्रकार भारती द्विवेदी की नजर से कश्मीर घूम रहे हैं. पिछले पार्ट में आप मशहूर डल झील से लेकर लाल चौक से रूबरू हुए हैं. अब जानिए बारामुला की खूबसूरती को जहां कश्मीरी मेहमानवाजी आपका मन-मिजाज खुश कर देगी.

कश्मीर में स्वागत.

बारामूला के लिए निकली भारती द्विवेदी का ठहराव अपनी एक दोस्त के पास होना था. उनसे कश्मीर ट्रिप के दौरान ही दोस्ती हुई थी. लिहाजा, उन्हें बारामुला देखने का इनविटेशन मिला और वो ना नहीं कर सकीं. बारामूला की मेजबान पहले ही सूमो स्टैंड पहुंच चुकी थीं. कश्मीर में स्वागत भी अलग अंदाज में होता है. गले मिलकर दोस्त ने स्वागत किया. फिर गालों को चूमकर कश्मीरियत का एहसास कराया. फिर सब मिलकर निकल पड़े घर की ओर. जहां हमें ठहरना था. दोस्त की ननिहाल में हमलोग ठहरनेवाले थे. वो घर ओल्ड बारमूला टाउन में ही है. यहां पहुंचते ही 6-7 बच्चों ने सभी का स्वागत किया. सब मिलकर हमें एक बड़े से गेस्ट रूम में लेकर गए. बेहद ही तरीके से सजा हुआ रूम था. जहां पर्दे, कालीन, दीवार पर फोटोफ्रेम के रूप में टंगी कुछ ऊर्दू के शब्द थे. तीन दिन में मुझे ये समझ आ गया था कि कश्मीर का हर घर कालीन, पर्दों से सजा होता है. कालीन के पीछे की वजह शायद वहां पड़ने वाली ठंड है. थोड़ी ही देर में हमारे सामाने जूस, मेवा और चिप्स की ट्रे के साथ घर की एक सदस्या आती हैं और बेहद प्यार से गले मिलकर गालों को चूमती हैं (और ये एक शानदार रिवाज है). साथ ही एक-एक करके घर के सदस्य हमसे मिलने आ रहे थे. मेल-मिलाप के साथ ही घर के सबसे बुजुर्ग सदस्य की रूम में एंट्री होती है उनके साथ एक और शख्स होते हैं जो कि उनके बड़े बेटे थे. उन्होंने हमसे हमारा नाम पूछने के बाद कहा आप हिंदू हो? हमारा जवाब था-जी. तभी वहां मौजूद घर से सबसे बुजुर्ग सदस्य ने कहा कि हमें हिंदुओं से बेहद प्यार है.

कश्मीर में याराना.

फिर शुरू हुआ हमारे खातिरदारी का दौर, जिसके लिए हमे पिछले दो दिन से तरस रहे थे. बेहद प्यार से हमारे सामने दस्तरखान (हमारे यहां डाइनिंग टेबल क्लॉथ कहते होंगे) बिछाया गया. उसमें भी कश्मीरियत की झलक थी. दस्तरखान बिछाने के बाद घर की एक छोटी सदस्य एक छोटा सा टब और मग में पानी लेकर आती हैं और हमारा हाथ धुलाती हैं. इन सारी चीजों को मैं बेहद हैरानी से देख रही थी. क्योंकि मैंने पहली बार ऐसी मेहमान नवाजी देखी थी. हाथ धोने के बाद हमारे सामने नॉनवेज और वेज की अलग-अलग डिश परोसी गईं. जिसमें अलग तरह का ऑमलेट, वाजवान की दो डिश, डोसा से मिलती-जुलती कोई रोटी, पनीर, काबुली चने की सब्जी और भाता (चावल) था. हमारे यहां खाना खाने के दौरान दाल के लिए अलग कटोरी, सब्जी के लिए अलग सा छोटा प्लेट होता है. यहां पर वैसा कुछ नहीं है. यहां पर एक छोटा सा प्लेट होता है जो गोल और थोड़ा गहरा होता है. लेकिन आपके सामने जो डिश लाई जाती है वो अलग-अलग बर्तन (डिनर सेट जैसा कुछ) में होता है. आप खाना उनमें से निकाल कर अपने प्लेट मे रख सकते हैं. खाना खाने के बाद फिर से हमारा हाथ टब में घुलाया गया और हाथ साफ करने के लिए तौलिया दिया गया. उसके बाद मेरी दोस्त हमें लेकर उरी दिखाने निकल पड़ी. उन्होंने अपनी गाड़ी से हमें उरी का पूरा इलाका दिखाया, झेलम नदी को दिखाया. उस दौरान हमनें कुछ ऐसी जगह को भी देखा जो फेमस तो नहीं है लेकिन बेहद खूबसूरत हैं.

शाम में लौटते वक्त हम वहां एक कैफे में गए. कैफे के ओनर मेरी दोस्त के दोस्त थे. वहां भी हमारी मेहमान- नवाजी चलती रही. बातचीत के दौरान पता चला कि पुलिस और मिलिटेंट्स के बीच हुई एनकाउंटर में हिजुबल का कमांडर मन्नान वानी मारा गया है. मेरी दोस्त परेशान थी कि मन्नान की मौत के बाद कश्मीर में हालात बुरहान वानी की मौत के बाद जैसा ना हो जाए. हालांकि कश्मीरी में बातचीत होने की वजह से हमें कुछ ज्यादा समझ तो नहीं आ रहा था लेकिन बीच-बीच में हिंदी में बातचीत हो रही थी, जिससे ये पता चल रहा था कि वहां मौजूद हर शख्स मन्नान वानी की मौत से दुखी था. वहां के लोगों की माने तो दिल्ली और इंडियन आर्मी बेहद सेफ तरीके से गेम खेल रही है. मरने वाला चाहे मिलिटेंट हो या जम्मू-कश्मीर पुलिस दोनों ही कश्मीरी होते हैं. उनकी माने तो हाल-फिलहाल जितने भी जम्मू-कश्मीर पुलिस की हत्या हुई है, उसमें एजेंसी का हाथ है, क्योंकि मिलिटेंट्स अगर किसी को मारते हैं तो वो न्यूज देते हैं और मारने की वजह भी. और अगर कोई सफाई नहीं आई तो इसमें एजेंसी का हाथ होता है.
मन्नान वानी के एनकाउंटर को लेकर अगले दिन पूरे कश्मीर में बंद बुलाया गया था. जिन बच्चों के एग्जाम होने थे वो होल्ड कर दिए गए. इंटरनेट बंद होने वाला था. लोकल गाड़ियां नहीं चलने वाली थी. कैफे में बैठे दोस्तों के बीच हम बेहद अजीब सा महसूस कर रहे थे कि यहां के लोग कैसे जीते हैं. नौजवान कैसे बिना इंटरनेट सर्वाइव करते हैं.


ऐसी होती है कर्फ्यू में जिंदगी

हमदोनों से जब नहीं रहा गया तो हमने ये सवाल पूछ ही लिया. जवाब आया कि हम क्या करे! हमारे पास कोई विकल्प नहीं है. जब बुरहान वानी मारा गया था, तब हमसब छ महीने घर में बंद थे. ना कॉलेज जा सकते थे, ना इंटरनेट था और ना बाहर निकल सकते थे. एकमात्र सहारा न्यूजपेपर होता था. इन सारी बातों को सुनकर मैं एकदम से असमंजस में थी कि यहां तो ऐसे हालात है कि आप किसी को गलत नहीं कह सकते हैं. वहां के नौजवानों के देखकर आप खुद को लकी मानने लगते हैं. उसकी वजह भी है. वहां जब हालात खराब होते हैं तो महीनों नेट बंद, स्कूल-कॉलेज बंद, मार्केट बंद. हमारे बिहार में एजुकेशन सिस्टम की मेहरबानी से छात्र तीन साल का ग्रेजुएशन चार-पांच साल में पूरा करते हैं लेकिन कश्मीर में हालात की वजह से. वहां के नौजवान बहुत सारे चीजों से वंचित है. उन्हें नहीं पता कि देश-दुनिया क्या चल रहा है. फिल्मी जगत, साहित्य जगत या अलग-अलग फील्ड के बहुत सारे मशहूर नाम नहीं पता. पूछो तो जवाब होता है कि जब आप महीनों कर्फ्यू की वजह से घर में बंद हो तो आप क्या सोच सकते हो. उनका जवाब एक हद तक सही भी लगता है. बचपन से अगर ऐसा ही माहौल हो तो फिर इंसान वैसा ही सोचने लगता है. उसके पास हालात से बाहर सोचने का मौका नहीं होता या सोच ही नहीं पाएगा.

#kASHMIR में सपना चौधऱी की फैन

ये सारी चीजें सोचकर मेरा दिमाग फटा जा रहा था. हालात को समझने की कोशिश करते हुए हम वहां से घर की तरफ लौटे. बाहर का माहौल और सारी बातें सुनकर मैं जितनी ही अपसेट थी, घर पहुंचते ही कुछ देर के लिए सबकुछ भूल गई. वजह घर में मौजूद बच्चे थे. बच्चियां जो कि सपना चौधरी की बहुत बड़ी फैन थीं और उन्हें सपना चौधरी के गाने पर डांस करना था. उनकी डिमांड पर हमने सपना चौधरी का गाना ‘तेरी आंख्या का काजल’ बजाए और फिर हम सबने जमकर डांस किया. एकदिन में ही हम वहां के लोगों से ऐसे घुलमिल गए कि लग ही नहीं रहा था कि हम मेहमान हैं. भले ही कश्मीर के लोग खुद का जुड़ाव भारत से नहीं महसूस करते हो या वहां के लोग खुद को भारत का हिस्सा नहीं मानते हो लेकिन कुछ चीजें हैं जो उन्हें भारत से जोड़कर रखता है. और इस मामले में वो पूरे भारतीय हैं. हमारे यहां जैसे घर-घर में बिग बॉस, बालिका वधू (रिपीट टेलीकास्ट) या बाकी सीरियल्स देखा जाता है. कश्मीर में भी लोग वहीं देखते हैं. मुझे ये बात तब पता चली, जब वहां पर मौजूद सात साल की बच्ची (तहूर) हमें ड्रामा (सीरियल्स) देखने के लिए पूछती है. वहां के लोग खूब पंजाबी गाने सुनते हैं. डांस के बाद हम सबने खाना खाया. चेंज करने केलिए हमें कपड़े मिले, हमारा बिस्तर लगाया गया साथ ही गर्म पानी का बैग (हॉटबैग) दिया गया ताकि वहां के ठंड से हम बचे रहे.

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अगली कड़ी में पढ़ें खूबसूरत गुलमर्ग की यायवरी

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