PART5: कश्मीर का वो इलाका जिसे लोकल इस्लामाबाद बोलते हैं!

कश्मीर की ये पांचवीं और अंतिम कड़ी है.पत्रकार भारती द्विवेदी ने बड़ी ही जीवंतता से घाटी के हर पहलु को बताने की कोशिशकी है. उन्होंने यायावरी के जरिए जन्नत की खूबसूरती से लेकर समस्याओं से रूबरू कराया.  

अनंतनाग से पहलगाम तक

यात्रा के अंतिम दिन हम साउथ कश्मीर के लिएनिकल गए.कश्मीर का हर रास्ता आपको अपनी खूबसूरती से चौंकाता है. हर एरिया अगर अपने साथ खतरा लिए हुए तो खूबसूरती का भी कोई तोड़ नहीं है.हमें पहले अंतननाग जाना था. अंतननाग जिसे वहांके लोकल इस्लामाबाद कहते हैं या फिर अंतनाग. वहां भी हमें एकनई दोस्त से मिलना था. उनके घर पहुंचकर हमनें उन्हें अपनेसाथ लिया और पहलगाम के लिए निकल गए. पहलगाम का पूरा रास्ता इतना सुंदर है कि आप हर जगह रूक उस जगह को अपने जेहन में कैद करना चाहते हैं.हरा और नीला रंग लिए बहता पानी, पानी का शोर,नीला आसामान और उस आसामन को छूता हुआ सफेद पर्वत. रंगों का इतना सुंदर मेल देख एक पल आपको अपनी आंखों पर यकीन नहीं होगा.लेकिन ये सब सच था. 

मशहूर मार्तंड सूर्य मंदिर

पहलगाम की खूबसूरती को घंटों निहारने केबाद हम मार्तंड सन टेंपल देखने निकल गए. इस टेंपलको आपने हाल-फिलहाल शाहिद कपूर की फिल्म ‘हैदर’ के गाने बिस्मिल्ल में देखा होगा या उससे पहलेकी बात करे तो सुचित्रा सेन और संजीव कुमार की फिल्म ‘आंधी’का गाना ‘तेरे बिना जिंदगी से कोई शिकावा’में देखा होगा. ये जगह भी कमाल की खूबसूरत है.जगह से भी ज्यादा सुंदर वहां तक पहुंचने का रास्ता. पहाड़ों के बीच जिंग-जैग करता रास्ता, सड़क के दोनों तरफ चिनार के पेड़ जो कि अपने पीले पत्तों के साथ गजब की खूबसूरती समेटे हुए थे. 

हर जगह मेहमानवाजी

पहलगाम से लौटकर हमने अपने नई कश्मीरीदोस्त के घर खाना खाया. फिर से वहीं पैटर्नदस्तरखान बिछाना, आपका हाथ धुलाना, फिरआपके सामने नॉनवेज-वेज बेहतरीन डिश पेश करना. कश्मीर के लोग बेहद इत्मीनान से आपको खाना खिलाते हैं, पहली बार में ही आपका प्लेट इतना भर जाता है कि मेरे जैसे कम खाने वालेलोग दोबारा कुछ लेने की हालात में नहीं होते हैं लेकिन उसके बाद भी आप से कहा जाताहै कि आप खुद से ले लो वरना हमारे यहां जबरदस्ती भी खिलाया जाता है. और ये चीज लगभग हर घर में हमारे साथ हुई. साथ ही मैंये बता दूं कि कश्मीर के लोग खाने में मिर्च का भरपूर इस्तेमाल करते हैं लेकिनमेरी दोस्त मिर्च बहुत कम खाती हैं तो इस बात का भी ख्याल रखा गया था. 

हजारों साल पुराना है मंदिर.

इसलिए छलक पड़े आंसू

शाम में अंतननाग से लौटकर हमने श्रीनगर केमशहूर ‘चाय जाय’ कैफे में जाने का सोचा. वहां जाकर हम सबको कुछ समय साथ बीताना था क्योंकि अगली सुबह हमें दिल्लीके लिए रवाना होना था. इन छह दिनों में हमें हर जगह इतनाप्यार मिला था कि अब हम कश्मीर रूकना चाहते थे. हर एक बीततेदिन के साथ एक-दूसरे से कहते थे यार हमें यहां से नहीं जाना.अभी लौटे भी नहीं थे तब तक फिर से वापस आने की प्लानिंग करने लगे थे.‘चाय जाय’ कैफे पहुंचकर मैं बिल्कुल शांत होचुकी थी. बस दिमाग में ये चल रहा था कि कल सुबह ये जगह हमसेछूटने वाली है. फैज़ और अब्दुल्ला मेरी ओर देख कर कह रहे थेअरे अभी तो पूरी रात है. लेकिन मैं कुछ भी बोलना नहीं चाहतीथी क्योंकि मुझे पता था कि मैं रो पडूंगी. गला भरा हुआ था,आंखों में आंसू थे. लेकिन मैं उन्हें बाहर नहींआने देना चाहती थी इसलिए नजर नीचे झुकाए जमीन को तब तक देखती रही जब तक कि आंसू रूक ना जाए. मैं उनलोगों के लिए रो रही थी, जिन्हें छह दिन पहले तक मैं जानती तक नहीं थी. 

कश्मीर से विदाई

ये उनकी अच्छाई और मेहमानवाजी थी, जिसने हमें इस कदर खुद से जोड़ा लिया था. ऐसा लग रहा था कि सालों से जानते हैं हम एक-दूसरे को. खैर अपनी भावनाओं के समेटते हुए मैं होटल पहुंची और फोन की गैलरी में पड़ी कश्मीर की एक-एक फोटो को देख उन सारे पलों को याद किया.कब आँख लगी पता ही नहीं चला. सुबह के अलार्म के साथ नींद खुली, हम तैयार हुए फिर से वादे के मुताबिक फैज़ हमें लेने आए थे. लेकिन इस बार कहीं घूमना के लिए बल्कि अलविदा कहने के लिए. उन्होंने हम दोनों को जम्मू जाने वाली गाड़ी में बिठाया. गाड़ी में बैठाने से पहले हमने एक-दूसरे के गले लगकर उनसे दिल्ली आने का वादा और श्रीनगर वापस आने का वादा किया. साथ ही ये भी कोई कहीं भी रहे एक-दूसरे बात करते रहेंगे और अपना ख्याल रखेंगे. जम्मूकी गाड़ी में बैठने का बाद गहरी उदासी के साथ मैं टिकट बुक कराने से लेकर आखिर दिन तक हर चीज को फिर से याद करने लगी. और इस तरह गाड़ी की रफ्तार के साथ कश्मीर बहुत पीछे छूट गया.   

DISCLAIMER/नोट: यायावरी की पूरी स्टोरी पत्रकार #BhartiDwivedi के फेसबुक से लेकर बनाई गई है. फोटो और स्टोरी लेने से पहले उनकी इजाजत ली गई है. 

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