कश्मीर की यात्रा का ये तीसरा पड़ाव है. बारामुला की खूबसूरती का दीदार करने के बाद भारती द्विवेदी गुलमर्ग की ओर रवाना हो रही हैं. अब आप भी गुलमर्ग का सैर कीजिए. साथ ही कुछ कड़वे अनुभव से भी रूबरू होइए. घाटी की सच्चाई और लोगों की सोच जानने से दिमाग के बंद दरवाजे खुलेंगे…

अगली सुबह आंख खुलते के साथ हमारे सामने नून चाय, उबले अंडे और लवासा (चाय से खाई जाने वाली बड़ी सी रोटी) परोसी गई. नाश्ता करने के बाद हम गुलमर्ग जाने के लिए तैयार होने लगे. क्योंकिे कश्मीर बंद था और हम बारामूला से बाहर नहीं निकल सकते थे. मै, स्नेहा और मेरी कश्मीरी दोस्त ने गुलमर्ग, भारत के आखिर गांव के पास का वॉटर फॉल, बाबा ऋषि का मजार को देखा. ढेर सारी फोटो खिंचाई. गाड़ी के जो ड्राइवर थे पूरे समय कश्मीरी में ही बात करते रहे जो कि हमारे पल्ले नहीं पड़ा. ड्राइवर साहब अपने धर्म को लेकर बेहद सख्त थे इसलिए अजान का हवाला देकर उन्होंने गाड़ी में गाने नहीं बजाए. साथ ही बाबा ऋषि की मजार पर जाने से पहले उन्होंने हमें नसीहत दी कि सर पर दुप्पटा रखकर जाइए, हमने उनकी बात मानी भी.

बिंदी पर उठाए गए सवाल
लेकिन इस पूरी यात्रा के दौरान जो एक बात बेहद खटकी वो थी उनका बिंदी पर सवाल उठाना. दरअसल मैंने और स्नेहा ने बिंदी लगाई थी. मेरी कश्मीरी दोस्त को भी बिंदी लगानी थी, उन्होंने मुझसे मांगी और मैंने दे दिया. बिंदी लगाकर वो बेहद खुश थीं और प्यारी भी लग रही थीं. लेकिन लौटते समय ड्राइवर की नजर उनपर पड़ी और उन्होंने मेरी दोस्त को कहा- ‘आपने ये ठीक नहीं किया है. आप इस्लाम का अपमान कर रही हैं. हमारा धर्म इसकी इजाजत नहीं देता है.’ ‘मैं अपनी धर्म को बेहद इज्जत देती हूं और दिल से मानती हूं’ मेरी दोस्त अपने बचाव में बस इतना ही कह पाई और मैं चाहकर भी कुछ नहीं बोल पाई और मुझे इस बात का अफसोस है. बस मैं अच्छा फील नहीं कर रही थी और दिमाग में चल रहा था कि अगर मुझे ये बातें किसी अजनबी ने कहा होता या अगर ये कश्मीर नहीं होता तो मैं उसका मुंह तोड़ देती.

लड़कियों पर हर जगह पाबंदी
कश्मीर जाकर इतना समझ आ गया था कि लड़कियां चाहे कश्मीर की हो या बिहार की उनके लिए हालात एक जैसे ही होते हैं. पाबंदियां एक जैसी ही होती हैं. बुर्का किसी की पसंद नहीं हो सकती है. जो लड़कियां बुर्का में बाहर निकलती हैं, वो घर में आते ही कुछ और होती हैं. उन्हे अपने शरीर और सर से वो बोझ उतारना होता है. वो भी खुले बालों के साथ रहना चाहती हैं, सेल्फी लेना चाहती हैं, गानों पर खुलकर नाचना चाहती हैं, जींस-टीशर्ट में बाहर निकलना चाहती हैं. लेकिन धर्म आड़े आ जाता है. कश्मीर में लड़कियों को जॉब करने की इजाजत नहीं है. अगर करना भी है तो उन्हें सरकारी जॉब के लिए मोटिवेट किया जाता है.

इस्लाम के नाम पर हर चीज जस्टिफाई
एक चीज जो बेहद खटकी वो ये थी कि कश्मीर में धर्म बुरी तरह हावी (फिलहाल पूरा देश ही धर्म की चपेट में है) है. वहां के नौजवानों को या लोगों को हिंदुत्व से तो दिक्कत है लेकिन इस्लाम के नाम पर वो हर चीज को जस्टिफाई करते नजर आते हैं. उन्हें हिंदू राष्ट्र से दिक्कत है लेकिन कश्मीर को इस्लामिक देश बनाने में उन्हें कोई बुराई नहीं दिखता. और हद तो तब हो गई जब दोस्त के साथ फेसबुक पर डाली गई फोटो तक मुझे डिलीट करनी पड़ी क्योंकि मेरी दोस्त ने बिंदी लगाई थी और उनके दोस्तों (पढ़ी-लिखी नई पीढ़ी) ने उन्हें धर्म को लेकर इतने ताने दिए कि उन्होंने मुझसे रिक्वेस्ट किया कि मैं फोटो हटा दूं. हां एक और चीज जो बेहद अजीब है, वहां के लड़कों के हिसाब से कश्मीर के लड़कियां अपनी मर्जी से बुर्का पहनती हैं. मतलब बुर्का पहनने में लड़कियों का ही फायदा है क्योंकि वो उसकी आड़े में किसी से भी मिल सकती है या कुछ भी कर सकती हैं. (ये नतीजा मैंने कुछ लोगों से बात करने के बाद ही निकाला है)

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DISCLAIMER/नोट: यायावरी की पूरी स्टोरी पत्रकार #BhartiDwivedi के फेसबुक से लेकर बनाई गई है. फोटो और स्टोरी लेने से पहले उनकी इजाजत ली गई है.
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