पेशे से पत्रकार और घुमक्कड़ी में जिंदगानी सर्च करनेवाली भारती द्विवेदी देश के सबसे खूबसूरत राज्य से लौटी हैं. जिसे जन्नत भी कहा जाता है. उन्होंने बड़े ही सलीके और मजेदार तरीके से जन्नत की कहानी बताई है..जी हां, कश्मीर और कश्मीरियत को बयां किया है…अब आप भी जानें धरती के स्वर्ग को #BhartiDwivedi की नजर से…


हिम्मत नहीं नजरिए की जरूरत
कश्मीर…इस नाम के साथ आमलोगों के जेहन में दो ही ख्याल आते हैं खूबसूरती और खतरा…मैं लोगों से मिलना चाहती हूं. नए लोगों से मिलना, उनकी लाइफ स्टाइल को जानना, बातें करना तो मुझे बचपन से पसंद है. लेकिन लोगों को जानने के लिए घूमना पड़ेगा..घूमना और दुनिया को देखने की बात हाल-फिलहाल मेरे अंदर आई हैं. और अब मुझे दुनिया की खूबसूरती नहीं देखनी, मुझे वो देखना है जिसमें लोगों की दिलचस्पी कम होती है. उदाहरण के लिए कश्मीर…इस नाम के साथ आमलोगों के जेहन में दो ही ख्याल आते हैं खूबसूरती और खतरा..मैं लोगों से मिलना चाहती हूं. नए लोगों से मिलना, उनकी लाइफ स्टाइल को जानना, बातें करना तो मुझे बचपन से पसंद है. लेकिन लोगों को जानने के लिए घूमना पड़ेगा. घूमना और दुनिया को देखने की बात हाल-फिलहाल मेरे अंदर आई हैं. और अब मुझे दुनिया की खूबसूरती नहीं देखनी, मुझे वो देखना है जिसमें लोगों की दिलचस्पी कम होती है. उदाहरण के लिए समझिए कि जैसे आपको कश्मीर टूरिस्ट की तरह जाना है, वहां की खूबसूरती तो देखनी है लेकिन वहां के लोगों के बारे में या लोकल लाइफ के बारे में जानने की इच्छा बहुत कम लोगों को ही होती है. लेकिन मेरी दिलचस्पी इन्हीं में है और हां कश्मीर जाने के लिए हिम्मत नहीं, अलग नजरिए की जरूरत है. मैंने जब कश्मीर जाने का फैसला किया तब मैं अंदर से पूरी तरह खुद को तैयार कर चूकी थी कि मुझे वहां टूरिस्ट बनकर नहीं जाना. मैं जिस तरह से कश्मीर को घूमना चाहती थी उसके लिए वहां के लोगों से जान-पहचान होना बेहद जरूरी है. इस लालच में मैं सोशल मीडिया के जरिए कई कश्मीरियों से जुड़ी. हालांकि सोशल मीडिया से जुड़ने के बाद हमारे बीच बातचीत नहीं हुई. अगर आप पत्रकार है तो चाहे या ना चाहे आप देश के हर कोने से रूबरू हो ही जाते हैं. कश्मीर तो एक ऐसी जगह है, जहां हर किसी की दिलचस्पी होती है. कश्मीर में मेरी दिलचस्पी की वजह उसका कॉनफिलक्ट जोन होना तो है ही. साथ में एक और वजह थी. वो था एक कश्मीरी पर मेरा क्रश होना. इसके अलावा हर रोज कश्मीर एनकाउंटर की खबर बनाने के बाद आप ऐसे ही कश्मीर की जगह को जानने लगते हैं और इस दौरान मेरे ऑफिस में ऐसा हुआ कि हमारे कश्मीर के जो लोकल रिपोर्टर थे उनकी खबर भी मुझे असाइन की जाने लगी. मतलब कुछ दिनों से मेरी जिंदगी कश्मीर के आस-पास ही घूम रही थी.

लोगों का काम है कहना
अपनी कश्मीर ट्रिप के बारे में जब मैंने अपने आस-पास के लोगों को बताया, दोस्तों को बताया तो सबका रिएक्शन एकदम वैसा ही था, जैसा मैंने उम्मीद की थी. दुनिया में कही चली जाओ कश्मीर क्यों? वहां अभी माहौल ठीक नहीं है, अभी तो वहां पंचायत चुनाव भी है. जा रही भारती बनकर आओगी रूखसाना बनाकर (ये मजाक में कही गई बात थी लेकिन थी) हां अपनी ट्रिप का जिक्र मैंने अपने घर में भी किया और मुझे उम्मीद थी कि घर से मुझे जवाब ना मिलने वाला है. लेकिन मेरी मां और भाई का रिएक्शन बेहद नॉर्मल था, जो कि मुझे हैरान कर गया. मां ने कहा तुम वहां पहले जा चुकी हो तो अब क्यों जाना. खैर जाओ. भाई ने कहा अपना ख्याल रखना और सारी जानकारी मुझे देकर जाना. कश्मीर ना जाने को लेकर जितनी नसीहतें मिलती गई, मेरा इरादा कश्मीर को लेकर उतना ही मजबूत होते जा रहा था. इन सारे ऊहापोह के बीच मैं और मेरी दोस्त स्नेहा ट्रेन में स्लीपर टिकट बुक करने बैठें लेकिन तभी मुझे अपने एक कश्मीरी दोस्त का ख्याल आया (ये सोशल मीडिया वाली दोस्ती नहीं है). मैंने अपने दोस्त को फोन कर अपनी प्लानिंग बताई तो उसने हमारी ट्रेन की प्लानिंग को मना करते हुए कहा कि प्लाइट लो और बस आ जाओ. यहां से सारी जिम्मेदारी मेरी. मेरे यहां होते तुम्हें किसी बात की चिंता करने की जरूरत नहीं. मेरे दोस्त ने मुझे कश्मीर में अलग-अलग जगहों पर लोगों से कनेक्ट भी कराया ताकि जब मैं वहां जाऊं तो मुझे कोई दिक्कत ना हो. उनकी बात मान हमने ट्रेन की प्लानिंग रद्द कर प्लाइट की टिकट बुक कराई.

जन्मदिन पर विशेष सौगात
कश्मीर जाने की तारीख 9 अक्टूबर तय हुई और उस दिन मेरा जन्मदिन था. जाने के लिए हमने करीब 10 दिन पहले टिकट बुक करा लिया था. उस 10 दिन में हमने अलग-अलग लोगों से कश्मीर को जानने की कोशिश की. नेट पर बैठकर जगह तलाशा, मेरी दोस्त स्नेहा ने पेन-पेपर लेकर लंबी सी लिस्ट बनाई. उन दस दिनों में हर रोज मेरी पेट में अजीब सी गुदगुदी होती रही, ऐसा लगता कि काश पैसे थोड़े ज्यादा होते तो टिकट कैंसिल करा कर मैं आज की ही फ्लाइट ले लेती. तब तक अपना हर रोज की रूटीन लाइफ चलती रही. रूम से ऑफिस, ऑफिस से रूम. साथ में कश्मीर जाने की तैयारी.
और आखिरकार 9 की वो सुबह भी आ गई, जब स्नेहा अपनी नाइट शिफ्ट खत्म कर और मैं दिल्ली के दोस्तों के साथ जन्मदिन मना एयरपोर्ट के लिए निकल पड़ी. कदम जैसे-जैसे एयरपोर्ट की तरफ बढ़ रहे थे, कश्मीर के पास होने का एहसास बढ़ता जा रहा था. सुबह 5:30 की फ्लाइट से हम कश्मीर के लिए रवाना हुए. प्लाइट में जो हमारे को-पैसेंजर थे वो ज़नाब भी कश्मीरी थे और उनका नाम अरशद था. डेढ़ घंटे की यात्रा के दौरान थोड़ी से फॉर्मल बातचीत के बाद हम तीनों आपस में सहज हो चुके थे.
हां कश्मीर जाने के उत्साह के बीच हमने पैकिंग बिल्कुल खराब की थी. मैंने और मेरी दोस्त ने दिल्ली ट्रिप के हिसाब से कपड़े पैक कर रखा था. सुबह 7 बजे जब हम श्रीनगर एयरपोर्ट पहुंचे तो ठंड के साथ हमारे स्वागत के लिए अनजान मुस्कुराता से चेहरा वहां मौजूद था. ज़नाब का नाम था फैज़ और इन्हें हमारे लिए मेरे दोस्त ने भेजा था. इनकी गाड़ी से हमने जॉस्टल (जहां हम रुकने वाले थे) तक सफर पूरा किया. इस दौरान गाड़ी में और शहर दोनों में ही एक शांति थी. गाड़ी के अंदर की शांति मैं मेरी दोस्त अपनी बक-बक से और फैज़ कश्मीरी गाने से खत्म करने की कोशिश कर रहे थे. शहर में हर जगह शांति थी. हर दस कदम के बाद सीआरपीएफ के जवान मौजूद थी. कुछ छोटे-छोटे बच्चे स्कूल बस के इंतजार में सड़क के किनारे खड़े थे. दूर तक फैला नीला आसमान, डल झील का किनारा, कश्मीरी गाना, अंदर-बाहर की शांति के साथ मैं अपने अंदर के उत्साह को उस चुप्पी के साथ जोड़ना चाह रही थी.
कई लोकेशन का दीदार
फैज़ ने हमें जॉस्टल छोड़ा इस वादा के साथ कि जल्दी तैयार हो जाओ दोनों फिर हम घूमने निकलेंगे।मैं और मेरी दोस्त 2-3 रातों से ठीक से सो नहीं पाए थे इसलिए हमने सोचा कि पहले हम जाकर सो जाएंगे। लेकिन जॉस्टल पहुंचने का बाद हमारा इरादा बदल गया था। एक तो कश्मीर, ऊपर से खूबसूरत से लोकेशन पर सुंदर सा जॉस्टल. दोनों की खूबसूरती निहारते हुए हमने साथ में लाया हुए स्पीकर पर गाने बजाकर खूब डांस किया और फिर हम तैयार हो गए फैज़ के साथ श्रीनगर देखने के लिए वादे के मुताबिक फैज़ हमें लेने जॉस्टल पहुंच चुके थे. उनके साथ हमदोनों सबसे पहले लाल चौक पहुंचे. लाल चौक इसलिए क्योंकि मेरा जन्मदिन था और मुझे वहां लाल चौक के घंटा घर पर केक काटने का मन था. मन अपनी ये इच्छा जैसी ही फैज़ को बताई उन्होंने कहा कि क्यों झंडा नहीं फहराना वहां! मैंने ना कहते हुए अपनी तरफ से सवाल दागा कि तुमने (बॉन्डिंग इतनी अच्छी थी कि आधे दिन में ही आपसे तुम पर आ गए थे) ऐसा क्यों कहा? फैज़ का जवाब था कि इंडिया से लोग यहां आकर झंडा फहरा अपनी देशभक्ति दिखाना चाहते हैं. बातों से पता चला कि देश के दूसरे हिस्से से आए लोग घंटा घर पर झंडा फहराने वाली हरकत यहां के लोगों को चिढ़ाने के लिए करते हैं. हाल ही में किसी ने घंटा घर पर झंडा फहराने की कोशिश की थी, जिसकी पहले तो सीआरपीएफ वालों ने जमकर खबर ली थी. फिर, वहां की लोकल पुलिस ने. सीआरपीएफ और लोकल पुलिस इस बात का पूरा ध्यान रखती है कि किसी भी वजह से वहां का माहौल खराब न हो. हालांकि एक सच ये भी है कि 15 अगस्त हो या 26 जनवरी को वहां के लोग तिरंगा नहीं फहराते हैं क्योंकि उनका मानना है कि अल्लाह से पहले कोई नहीं. लेकिन एक सच ये भी है कि वहां लोग अगर भारत के साथ नहीं आना चाहते तो उन्हें पाकिस्तान भी नहीं जाना है. उन्हें आजाद कश्मीर चाहिए. अच्छा बातचीत के दौरान मुझे ये भी पता चला कि आए दिन जो यहां पाकिस्तान जिंदाबाद और आईएसआईएस का झंडा लहराया जाता है, वो सिर्फ चिढ़ाने की खातिर होता है. ना तो यहां के लोग पाकिस्तान जाना चाहते हैं और ना उन लड़कों का आईएसआईएस में कोई दिलचस्पी है. बात इतनी है कि दोस्त का दुश्मन दोस्त होता है. लेकिन मैं और मेरी दोस्त इस लॉजिक से कतई सहमत नहीं थे. हमारा प्वांइट ऑफ व्यू यही था कि जिस समय आप ऐसा कुछ करना शुरू करते हैं आप उसके लिए जिम्मेदार हो जाते हैं. चाहे वो मासूमियत में क्यों ना किया गया हो.
कश्मीर के मसले पर ढेर सारे गप्पबाजी के साथ ही फैज़ ने हमें डाउन टाउन, जामिया मस्जिद (जहां हर शुक्रवार पत्थरबाजी होती है) और वहां की फेमस जगहें दिखाई। फिर हम हरि पर्वत घूमने गए. एक ऐसी जगह जहां से पूरा कश्मीर दिखता है. टॉप पर खड़े होने के बाद आपको पूरा श्रीनगर क्रॉसिका जैसा दिखेगा (अगर अपना तमाशा फिल्म देखी है तो क्रॉसिका को देखा होगा) रंग-बिरंगी सी छतें, दूर तक फैला नीला और सफेद आसमान और पहाड़ की चोटियां. हमारे पास कैमरा नहीं था और ये बात मेरे दोस्त को पता थी तो उन्होंने फैज़ को कैमरे के साथ भेजा था. जिसकी वजह हर जगह फैज़ अपने कैमरे से हमारी तस्वीर उतार रहे थे…माफी फोटो उठा रहे थे (कश्मीर में लोग फोटो खींचाते नहीं उठाते हैं). कश्मीर में के नौजवान सोशल मीडिया पर फोटो अपलोड नहीं करते बल्कि चढ़ाते हैं.

जब पुलिस ने काटी चलान
हरि पर्वत से शहर को निहारने के बाद हम तीनों खाना खाने के लिए वैष्णव ढाबा (क्योंकि मेरी दोस्त वेजिटेरियन हैं) पहुंचे. खाना खाने के दौरान भी हम कुछ कश्मीरी सीखने की कोशिश कर रहे थे. साथ ही हम अपनी शिकायत दर्ज करवा रहे थे कि यार ये कश्मीर के लोगों इतना कम क्यों बोलते हैं. मतलब कि आप समाने वाले को पूरी रामायण सुना दे और बिना किसी सवाल-जवाब आखिरी में बस एक जवाब मिले ‘अच्छा ठीक है’. खाना खाने के बाद जब हम ढाबा से निकले हमारे दोस्त की गाड़ी ट्रैफिक पुलिस वाले लेकर जा चुके थे. फिर आधे दिन से उस गाड़ी को वापस लाने की हमारी जेद्दजेहाद शुरू हुई. ट्रैफिक पुलिस ऑफिस से लेकर सीआईडी ऑफिस तक हमने खूब चक्कर काटे. मैं दुखी थी कि हमारी वजह से पहले ही बंदे की गाड़ी का चालान काट चुका है और अब गाड़ी ही चली गई. मेरी शक्ल देख फैज़ हर बार कहते ‘अरे आप क्यों उदास हो? आपदोनों को दुखी देख कर अब मैं भी दुखी हो जाऊंगा. अभी तो लाल चौक पर केक काटना है.’ लेकिन मेरा सारा उत्साह ठंडा पड़ चुका था. जैसे-तैसे चार-पांच घंटे की मशक्कत के बाद हमें हमारी गाड़ी मिली फिर हम तीनों अपना मूड ठीक करने के लिए एक अच्छे से कैफे पहुंचे. वहां मेरे दोस्त (जिन्होंने हमारी जिम्मेदारी ली थी) भी आ चुके थे. हमने चारों ने साथ में कॉफी पी. इधर-उधर की बात और फिर फैज़ ने हमें जॉस्टल ड्रॉप किया. बता दूं कि इस पूरे एक दिन में हमने कश्मीरी सीखने की बहुत कोशिश की लेकिन ‘शुक्रिया जनाब’ से ज्यादा कुछ हासिल न हुआ.
प्लान के मुताबिक अगले दिन सुबह मुझे और मेरी फ्रेंड को नॉर्थ कश्मीर यानी कि बारामूला जाना था लेकिन पंचायत चुनाव के विरोध में अलगवादियों ने बंद बुलाया था, जिसकी वजह से पूरा कश्मीर बंद था. दूसरे दिन मुझे और मेरी दोस्त को अकेले ही ट्रैवल करना था, नई जगह के बारे में कुछ आइडिया नहीं था इसलिए हमने एक और दिन श्रीनगर में गुजारने का फैसला किया. हालांकि हम खुश नहीं थे. छह दिन की ट्रिप में हम सारे कश्मीर को समेट लेना चाहते थे. फिर भी जॉस्टल में बैठने से अच्छा था कि हम श्रीनगर को ही जाने. बंद होने की वजह उस दिन बहुत कम गाड़ियां चल रही थीं. जॉस्टल से बाहर निकलने के बाद हमें एक शेयरिंग कैब मिल गई थी, जिसमें बैठकर हम डल झील के नेहरू पार्क पहुंचना था. यहां पर हमारे दूसरे दिन के गाइड ‘अब्दुल्ला’ मिलने वाले थे. इन्हें भी हमारे पास मेरे दोस्त ने ही भेजा था. अब्दुल्ला को देखकर आप उन्हें चीनी समझने की गलती कर सकते हैं लेकिन वो हैं कश्मीरी. मूलत: वो तिबब्त से हैं लेकिन बहुत पहले उनकी फैमिली कश्मीर आ गई थी. तो अब वो पूरे कश्मीरी हैं. अब्दुल्ला के साथ हमने डल झील को अच्छे से घूमने का प्लान बनाया.

मीडिया से भागते लोग
कश्मीर में घूमने के दौरान मैं और मेरी दोस्त वहां से कुछ ऐसी कहानियां लेकर आना चाहते थे जो कि मीडिया में ना के बराबर आती है. हमारी प्लानिंग थी कि हम डल झील पर रहने वाले लोगों की जिंदगी के बारे में वीडियो या स्टोरी करेंगे. लेकिन वहां ऑन कैमरा कोई कुछ बात नहीं करना चाहता है. लोगों को कैमरा और मीडिया से भागते देखना हो तो कश्मीर जाइए. यहां लोग हालात के लिए इंडियन आर्मी से ज्यादा नेशनल मीडिया को जिम्मेदार मानते हैं. शिकारा में बैठने के बाद हमने शिकारा वाले भाई से डल झील के पास बसे उनके गांव, पानी पर बना उनका मार्केट और लोगों से बात करने की डिमांड रखी. भाई ने हमें गांव दिखाया, मार्केट दिखाया लेकिन बातचीत के लिए कहा- ‘मैडम कोई कुछ बोलेगा ही नहीं क्या करोगी बात करके. हम बोलेंगे कुछ और आपलोग जाकर दिखाओगे कुछ और.’ उनकी इस लाइन से हमें पता चला चुका था कि हमारी मीडिया ने क्या इज्जत हासिल की है. बातचीत के दौरान उन्होंने हमें कश्मीर के मौसम और मुंबई के फैशन का कनेक्शन बताया. जैसे कि मुंबई का फैशन और कश्मीर का मौसम कब बदल जाए पता ही नहीं चलता. साथ ही ये भी कि कैसे उनलोगों को बिजनेस राजनीति का भेंट चढ़ जाता है. डल झील घूमने के बाद हम तीनों ने हजरत बल और कश्मीर यूनिवर्सिटी घूमने का प्लान बनाया और तय हुआ कि पहले पैदल चलेंगे फिर कोई ऑटो लेंगे. पैदल चलने की पीछे भी वजह थी. हम वहां से भागना नहीं चाहते थे बल्कि कश्मीर उसकी खूबसूरती को समेटना चाहते थे. पैदल चलने के दौरान ऐसा हुआ कि एक काले रंग की सूमो ने हमें दो बार फॉलो किया और हूटिंग करते निकल गए. इस घटना के बाद एहसास हुआ कि कहीं चले जाओ लड़के एक जैसे ही होते हैं. फिर हमने ऑटो लिया और हम कश्मीर यूनिवर्सिटी पहुंचे. वहां पहुंचकर दो दिन में पहली बार मैंने लड़के-लड़की को साथ बैठकर बात करते देखा या साथ देखा. दिल्ली या बाकी जगह अगर आप लड़का-लड़की की दोस्ती से परेशान है तो कश्मीर में आपकी आंखे तरस जाएगी साथ देखने को. वहां की कैंटीन में खाने के बाद, फोटो क्लिक करने के बाद हमने हजरत बल जाने का सोचा.

विश्ववि्द्यालय में इंसान नहीं पुतला!
कश्मीर यूनिवर्सिटी से निकलते समय मुझे चार-पांच की झुंड में बुर्के में लड़कियां दिखाना शुरू हुई. बता दूं कि वहां बिना हिजाब, बुर्का तो कोई लड़की दिखी ही नहीं लेकिन यहां मैं जो बताना चाह रही हूं वो ये था कि झुंड में जो लड़कियां थीं वो सर से पांव तक बुर्के में दिख रही थी. मुझे अजीब इसलिए लगा रहा था कि आप यूनिवर्सिटी में हैं. पढ़-लिख रही हैं उसके बाद बुर्के को ऐसे आगे बढ़ाना मेरी समझ से परे था. ऐसा लग रहा था कि उन लड़कियों की शक्ल में मैं इंसान नहीं पुतला देख रही हूं. वहां से निकलने के बाद हम तीनों हजरतबल गए. वहां पर हमने अंदर जाने की कोशिश की लेकिन हमें एंट्री नहीं मिली क्योंकि हमारे पास दुप्पटा नहीं था. लेकिन वहां पर मौजूद एक महिला ने जिस टोन के साथ दुप्पटे वाली बात कही हमें बुरी लगी और हमने फैसला किया कि हम अंदर नहीं जाएंगे. हजरत बल से निकलने के बाद हमतीनों ही वहां के लोकल मार्केट में घूमने लगे. उस दौरान हम वहां का खाना, बेकरी, हैंडमेड सामान को देखने और समझने का कोशिश कर रहे थे. लेकिन एक चीज जो हमें असहज कर जा रही थी वो थी लोगों की नजर. मुझे समझ नहीं आ रहा था कि लोग हमें लड़की होने की वजह से घूर रहे थे या हम तीनों ही कश्मीरी नहीं (अब्दुल्ला कश्मीरी हैं लेकिन लगते नहीं) थे, इस वजह से. मैं बता दूं कि अब्दुल्ला एक बेहद ही आजाद ख्याल के लड़के हैं. काफी मस्तमौला टाइप, जो कश्मीर का होते हुए भी वहां के राजनीति में ना पड़कर अच्छी बातों पर या पॉजिटिव बातों में अपना समय देना पसंद करते हैं.

कैफे में चर्चा
श्रीनगर में दो दिन बिताने के दौरान हर दो कदम बाद जवानों को भारी-भरकम हथियार और गेटअप के साथ देखकर हर बार दिमाग में एक अजीब सा सवाल आता. इन्हें कैसा लगता होगा एक ऐसी जगह पर खड़े होकर जहां कोई इन्हें पसंद नहीं करता. मतलब मैं वैसी जगह पागल हो जाऊंगी, जहां मुझे कोई पसंद नहीं करता वहां रहना पड़े तो. आप 24 घंटे वहां पर सुरक्षा दे रहे हो, जहां कोई आपको पसंद नहीं करता, जहां लोगों को आपकी मौजूदगी नहीं चाहिए. खैर कश्मीर में रहने पर आप हर पहलू पर सोचने के लिए मजबूर होते हैं. मार्केट घूमने के बाद फिर से फैज़ हमें लेने आए और हमसब साथ में विंटरफेल कैफे (गेम्स ऑफ थ्रोन्स की थीम पर बना कैफे) गए. वहां पर हमें एक युवा नेता मिले जो कि इस बार के पंचायत चुनाव में निर्दलीय खड़े थे (अब वो जीत चुके हैं). उनसे हमारी कश्मीर के मुद्दे पर लंबी बात हुई. बहुत सारी जगह हम एक-दूसरे से सहमत-असहमत हुए लेकिन चर्चा का निष्कर्ष यही निकला की हथियार कभी भी समस्या का हल नहीं हो सकता है. चाहे वो इधर से हो या उधर से. फिर हम सबने एक ढाबे में खाना खाया और दोस्तों ने हमें जॉस्टल ड्रॉप किया. हां इस दो दिन में मैं और मेरी दोस्त ये शिकायत करते रहे हैं कि हमें कश्मीरी खाना खाना है. अभी तक हम वहीं खा रहे थे जो दिल्ली में खाते हैं.

वर्कशॉप में बच्चों से मुलाकात
हम दोनों जॉस्टल पहुंचे और सारा सामान पैक किया, जॉस्टल का हिसाब किया क्योंकि हमें सुबह नार्थ कश्मीर के लिए निकलना था. तीसरे दिन की सुबह फैज़ हमें लेने आ गए हमने जॉस्टल में सबको बॉय बोला और बारामूला के लिए निकल गए. श्रीनगर से बारामूला हमें फैज़ और गुलजार के साथ जाना था. ये दोनों ही एक वर्कशॉप के लिए पाटन जा रहे थे. वहां तक हम इनके साथ थे उसके बाद पाटन से बारामूला तक का सफर हमें खुद पूरा करना था. पाटन पहुंचने पर गुलजार ने हमें अपने वर्कशॉप का हिस्सा बनाया. वहां मौजूद लड़के-लड़कियों से हमारा परिचय कराया. मैं यहां बताना चाहूंगी कि गुलजार जैसे बहुत से पढ़े-लिखे युवा वहां है, जो कि ग्राउंड पर वहां के यूथ के लिए काम कर रहे हैं. अलग-अलग एनजीओ के साथ जुड़कर कश्मीर के यूथ को जागरूक कर रहे हैं. सवाल-जवाब के दौरान वर्कशॉप में मौजूद बच्चों ने हमसें ये पूछा कि कश्मीर कैसा लगा? उनके सवाल का जवाब देकर हम बारामूला के लिए निकल गए.

कैब ड्राइवर की जुबानी
हमें बारामूला पहुंचाने की जिम्मेदारी बिलाल ने ली. बिलाल एक कैब ड्राइवर हैं. उनकी गाड़ी में बैठने के बाद हमने कश्मीर के हालात पर थोड़ी बातचीत शुरू की. बातचीत के दौरान बिलाल कहते हैं- ‘हमें इंडियन आर्मी परेशान नहीं करती. हम तो सबसे ज्यादा जम्मू-कश्मीर पुलिस से परेशान हैं. ये लोगों हमारे साथ छोटी-छोटी बात पर बदतमीजी करते हैं. सच बोलूं तो अगर इंडियन आर्मी से कोई मरता है तो हमें दुख होता है. लेकिन जम्मू-कश्मीर पुलिस से कोई मरता है तो हमें खुश होते हैं.’ उनकी बातें सुन मैं और मेरी दोस्त चुप थे. हमें समझ नहीं आ रहा था कि यहां चल क्या रहा है. रास्ते में हमें एक सेब का बगीचा दिख गया था. बिलाल ने हमारी उत्सुकता को देखते हुए गाड़ी रोक दी और कहा आप उतरकर फोटो खींच लो. हम दोनों गाड़ी से उतरे और फोटो खींचने लगे. तभी बगीचे के मालिक आते हैं और उन्होंने हमारे साथ फोटो खींचाने की इच्छा जाहिर की. साथ में फोटो लेने के बाद हमने उन्होंने अलविदा कहा लेकिन जाने से पहले वो मेरा हाथ पकड़ दूसरी तरफ के बगीचे में ले गए. हमारा बैग मांग वो उसमें सेब भरने लगे. हमदोनों के बैग में जगह नहीं थी, फिर भी उन्होंने उसमें हर जगह से कोशिश करके सेब रखा. उनकी तरफ से मिल रहे प्यार को देखकर हमदोनों खुशी से एक-दूसरे की तरफ मुड़े और साथ में कहा यार इतनी खूबसूरत जगह को क्या बना दिया गया है. अलविदा कहने के बाद बिलाल ने हमें बारामुला हाइवे पर दूसरी कैब में बिठाया. साथ ही उन्होंने अपना नंबर दिया कि अगर रास्ते में कोई दिक्कत हो तो हम उन्हें कॉल कर ले…
नोट- यायावरी की पूरी कहानी फोटोज के साथ #BhartDwivedi के फेसबुक पेज से ली गई है..
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