ये है ट्रैफिक चचा की कहानी। माफ कीजियेगा, इनका नामकरण मैं कर रहा हूं। मुझे नहीं पता इनको यहां लोग किस नाम से पुकारते हैं। वैसे इनका नाम रामदास है। आज सुबह सवेरे इनसे मुलाकात हुई। सिकंदराबाद रेलवे स्टेशन के बाहर। ये एक ऐसा काम करते हैं जो इनका है ही नहीं। फिर भी जिम्मेदारी इन्होंने खुद ही अपने कंधों पे उठा रखी है। स्टेशन रोड के एक चौराहे पर बैठकर यहां का पूरा ट्रैफिक मैनेज करते हैं। मैं रास्ते से गुजर रहा था। तभी मेरी नज़र इनपर पड़ी, गले में दो सीटियां लटक रही थीं। एक लाल और एक पीली रंग की, शर्ट के ऊपर एक सफेद कमीज में चचा हर आने जाने वाली गाड़ी को पास दे रहे थे। ट्रैफिक के साथ हर पैदल मुसाफिर को ये सलाम भी कर रहे थे। मैंने अपने मोबाइल में इनकी कुछ तस्वीरें निकाल लीं और आगे बढ़ गया। चार कदम बाद मेरे पैर रुक गए। मुझे लगा, मेरे सामने से एक कहानी गुज़र रही है। मैंने जाकर चचा से हाथ मिलाया और बात करने लगा। जब वो शुरू हुए तो मानो उनके पास हज़ारों कहानियां थीं। और ये सब बताते हुए उनके अंदर इतना उत्साह था कि बयां नहीं कर सकता।  उन्होंने बताया कि बेटे ने नया घर खरीदा है 20 लाख रुपए का। पर उस घर में बाप की एंट्री नहीं है। जिसने उसे उस लायक बनाया था। चचा कभी डब्बा फैक्ट्री में काम करते थे। किसी तरह अपनी दो बेटियों की शादी की थी। बेटे को पढ़ाकर नौकरी लायक बनाया था। 15 साल तक नौकरी करते वक़्त बाप ने उससे कुछ नहीं मांगा। उसी पैसों से उसने अपना नया आशियाना बना लिया, जिसमे कभी माँ को भी नहीं बुलाया। ये सब बताते हुए चचा ठहाके लगा रहे थे। मैंने उनसे पूछा- आप इतना खुश कैसे रहते हैं? जवाब में उन्होंने कहा कि बेटा मैं 24 घंटे इतना ही खुश रहता हूं। मैंने उनसे पूछा- चचा घर कैसे चलता है? वो बोले कि लोग एक, दो या 5-10 रुपये दे जाते हैं जिसका मन होता है। ऐसे करके 2-3 सौ रुपये हो जाते हैं। जो मैं अपनी बूढ़ी पत्नी को दे देता हूं। तो घर मैं नहीं वो चलाती है। समझे बेटा... मुझे ऑफिस के लिए देर हो रही थी, तो मैंने चचा के साथ सेल्फी ली और चलने की इजाज़त मांगी। चचा बोले, बेटा इतनी देर बतियाये हो एक चाय पीते जाओ? भाईसाब.... मुझसे कोई चाय पूछे और मैं मना कर दूं ऐसा तो होता ही नहीं। तो फिर क्या था हो गयी, 'चाय विद चचा'

जीवन में खुश रहना है तो जरा ट्रैफिक वाले चचा को पढ़ लें

ये है ट्रैफिक चचा की कहानी। माफ कीजियेगा, इनका नामकरण मैं कर रहा हूं। मुझे नहीं पता इनको यहां लोग किस नाम से पुकारते हैं। वैसे इनका नाम रामदास है।

उम्र नहीं काम देखें

काम देख होगी हैरानी

आज सुबह सवेरे इनसे मुलाकात हुई। सिकंद्राबाद रेलवे स्टेशन के बाहर। ये एक ऐसा काम करते हैं जो इनका है ही नहीं। फिर भी जिम्मेदारी इन्होंने खुद ही अपने कंधों पे उठा रखी है। स्टेशन रोड के एक चौराहे पर बैठकर यहां का पूरा ट्रैफिक मैनेज करते हैं।

कहानीकार के साथ ट्रैफिक चचा

मुसाफिरों को चचा का सलाम

मैं रास्ते से गुजर रहा था। तभी मेरी नज़र इनपर पड़ी, गले में दो सीटियां लटक रही थीं। एक लाल और एक पीली रंग की, शर्ट के ऊपर एक सफेद कमीज में चचा हर आने जाने वाली गाड़ी को पास दे रहे थे। ट्रैफिक के साथ हर पैदल मुसाफिर को ये सलाम भी कर रहे थे। मैंने अपने मोबाइल में इनकी कुछ तस्वीरें निकाल लीं और आगे बढ़ गया।

सिटी है चाचा की पहचान

इसलिए थम गए पैर

चार कदम बाद मेरे पैर रुक गए। मुझे लगा, मेरे सामने से एक कहानी गुज़र रही है। मैंने जाकर चचा से हाथ मिलाया और बात करने लगा। जब वो शुरू हुए तो मानो उनके पास हज़ारों कहानियां थीं। और ये सब बताते हुए उनके अंदर इतना उत्साह था कि बयां नहीं कर सकता। उन्होंने बताया कि बेटे ने नया घर खरीदा है 20 लाख रुपए का। पर उस घर में बाप की एंट्री नहीं है। जिसने उसे उस लायक बनाया था। चचा कभी डब्बा फैक्ट्री में काम करते थे। किसी तरह अपनी दो बेटियों की शादी की थी। बेटे को पढ़ाकर नौकरी लायक बनाया था। 15 साल तक नौकरी करते वक़्त बाप ने उससे कुछ नहीं मांगा। उसी पैसों से उसने अपना नया आशियाना बना लिया, जिसमे कभी माँ को भी नहीं बुलाया।

चचा का स्टाइल

बेटे पर चचा का ठहाका

ये सब बताते हुए चचा ठहाके लगा रहे थे। मैंने उनसे पूछा- आप इतना खुश कैसे रहते हैं? जवाब में उन्होंने कहा कि बेटा मैं 24 घंटे इतना ही खुश रहता हूं। मैंने उनसे पूछा- चचा घर कैसे चलता है? वो बोले कि लोग एक, दो या 5-10 रुपये दे जाते हैं जिसका मन होता है। ऐसे करके 2-3 सौ रुपये हो जाते हैं। जो मैं अपनी बूढ़ी पत्नी को दे देता हूं। तो घर मैं नहीं वो चलाती है। समझे बेटा…

सेल्फी विद चचा

चाय तो बनती है

मुझे ऑफिस के लिए देर हो रही थी, तो मैंने चचा के साथ सेल्फी ली और चलने की इजाज़त मांगी। चचा बोले, बेटा इतनी देर बतियाये हो एक चाय पीते जाओ? भाईसाब…. मुझसे कोई चाय पूछे और मैं मना कर दूं ऐसा तो होता ही नहीं. तो फिर क्या था हो गयी, ‘चाय विद चचा’

चचा का स्टाइल

ये प्यारी सी दास्तान हमें लिख भेजा है फैसल साहब ने. जी हां, फैसल साहब बड़े ही जिंदादिल इंसान हैं. हाजिरजवाबी तो गजब के..तभी तो बतौर पत्रकार की-बोर्ड पर अक्सर शब्दों  से समां बांधते रहते हैं…

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