पिछले पार्ट में आपने पढ़ा मलाना गांव में बर्फबारी का जमकर लुत्फ उठाया गया. साथ ही डर भी सता रहा था कि यहां से कैसे निकला जाएगा. इस कड़ी में पढ़ें नींद खुलने पर क्यों सभी बाहर का नजारा देख हैरान रह गए…

पहली बार दिखा ऐसा दृश्य
सुबह हो चुकी थी. हमलोगों की नींद भी खुल चुकी थी. घड़ी की सुइयां 6 की ओर इशारा कर रही थी. कमरे से बाहर निकला तो लगा पूरी जगह ही बदल गई है. चारों ओर बर्फ की चादर बिछ गई थी. रास्ता कहीं दिख ही नहीं रहा था. सभी घरों के ऊपर बर्फ की मोटी परत जमी हुई थी. मलाना के कुछ लोग बर्फबारी में भी जंगल की ओर निकलने की तैयारी कर रहे थे. बच्चे सुबह से बर्फ में खेल रहे थे. लाइफ में पहली बार ऐसा नजारा आंखों से देखा था.

बदल गया मलाना का नजारा
गांव का दृश्य बेहद खूबसूरत दिख रहा था. लेकिन, यहां से निकलने का सोच कर डर लग रहा था. कमरे में आकर सभी की नींद मैंने तुड़वाई. आंख खुलते ही पहला सवाल- बर्फबारी बंद हुई क्या. मैंने कहा – हां, देखो बाहर आकर कितना अच्छा मौसम है. मेरा जवाब सुनकर सभी बाहर निकले. सभी के मुंह से एक ही आवाज निकली- बाप रे..ये क्या हो गया….अब कैसे निकलेंगे. मौसम को देखकर खुश तो सभी लोग थे. लेकिन डर भी लग रहा था. आपस में बातचीत करते हुए 2 घंटे बीत गए. सुबह 8 बजे के करीब गरमा गरम ग्लास में भरकर चाय आ गई.

नहीं मिल पाएगी गाड़ी
चाय की चुस्कियों के साथ बगल के कमरे में ठहरे हुए होस्ट से बातचीत होने लगी. वो भी दिल्ली से आए हुए थे. उनके ग्रुप में 6 लोग थे. वो भी यहां से निकलने की तरकीब सोचने में लगे हुए थे.लेकिन, बर्फबारी के बीच किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था. गेस्ट हाउस ऑनर ललीत से मैंने बातचीतकी. उन्होंने कहा कि 2-3 दिन तक ऐसा ही मौसम रह सकता है. आपलोगों को यहां ठहर जाना चाहिए. क्योंकि गांव से नीचे उतरने के बावजूद गाड़ी नहीं मिलेगी. बर्फ की वजह से रास्ते बंद हो चुके होंगे.

गांव से निकलना मुश्किल
गेस्ट हाउस ऑनर की बात सुनकर मैं भी घबरा गया. अगर दो दिन बाद भी बर्फबारी नहीं रूकी तो निकलना और भी मुश्किल हो जाएगा. गांव से नीचे उतरने के बाद जरी तक बर्फ की चादर और भी मोटी हो जाएगी. इंटिरियर इलाका होने की वजह से सरकार की ओर से भी बर्फ जल्दी नहीं हटाया जाता है. यानी, रूकने का मतलब कम से कम 2 स प्ताह तक भी फंसे रह सकते हैं. सारी बात मैंने साथ के लोगों को बताया. अगर रूकना है तो फिर रूके रहो. चलने में काफी रिस्क है. जान जोखिम में डालकर ही निकला जा सकता है.

नजर नहीं आ रहा रास्ता
कुछ लोग रूकने को कह रहे थे. कुछ का इरादा रिस्क लेने का था. समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए. सबसे ज्यादा खतरनाक था. गांव से नीचे सड़क तक उतरना. रास्ता बिल्कुल नजर नहीं आ रहा था. बर्फ के सिवाए कुछ भी नहीं दिख रहा था. सभई लोग संशय की स्थिति में थे. मैंने दोबारा ललीत से बातचीत की. उन्होंने कहा कि 4-5 किमी के बाद गाड़ी मिल सकती है. उस तरफ इतनी बर्फबारी नहीं हुई होगी. अब, हमलोग सोचने लगे कि कोई ऐसा बंदा चाहिए कि जो गाड़ी तक साथ चल सके. ललीत के सामने इसका प्रस्ताव रखा.

रिस्क लेने को तैयार हुए लोग
इतनी बर्फबारी में कोई भी जाने को तैयार नहीं हो रहा था. खैर, एक शख्स 2 हजार में गांव से नीचे तक जाने के लिए तैयार हो गया. सभी लोग रिस्क लेने को तैयार हो गए.पहले नाश्ता करने का प्लान बनाया गया. क्योंकि, पेट भरा रहने पर ही इस यात्रा को पूरी कर सकते हैं. गरमागरम पराठा और सब्जी का लुत्फ उठाया गया. कुछ पराठे साथ में रख लिए गए. इसके बाद सभी चलने को तैयार हो गए. ललीत का हिसाब-किताब कर उन्हें धन्यवाद दिया. अब, जीवन का सबसे खतरनाक यात्रा की शुरुआत होने वाली थी.

अगली कड़ी में पढ़ें जान जोखिम में रखकर की गई ट्रैकिंग
