402 KM का सफर तय कर पहुंचा नारकंडा, 68 साल पुराने अमरीक सुखदेव ढाबा में लजीज पराठा का स्वाद

स्पिति यात्रा का आज दूसरा दिन है। दिल्ली से शिमला के आगे नारकंडा तक जाने का लक्ष्य रखा गया। पटना से दिल्ली वाली थकान पूरे दिन सो कर निकाल ली गई थी। फिर शाम में लक्ष्मी नगर में लस्सी का लुत्फ उठाया गया था। गजब का स्वाद। जरा सा भी अलग से कोई फ्लेवर नहीं। मतलब स्वाद ऐसा लगा है कि अगली बार भी दिल्ली जाऊंगा तो लस्सी जरूर गले तक तर करूंगा। इसकी कहानी फिर कभी। फिलहाल हमलोग बढ़ते हैं दिल्ली से शिमला होते हुए नारकंडा की हसीन वादियों की ओर।

अमरीक सुखदेव के पराठे का लाजवाब स्वाद

सुबह के करीब 6 बजे दिल्ली को बॉय कर दिया। शहर को छोड़ते हुए हाइवे पर बढ़ा तो याद आया कि इस रूट पर ही मुरुथल है। यहां का पराठा नहीं खाएं तो यात्रा बेकार ही है। मेरा मानना है कि यात्रा का मतलब खान-पान, पहनावा, बोली समेत स्थानीय संस्कृति के हर हिस्से को जानना है। करीब 50 किमी का सफर तय करने के बाद उर्मिला का स्लेटर छोड़, ब्रेक पर पांव लगाते हुए मुड़ गए अमरीक सुखदेव ढ़ाबे की ओर। हालांकि, यह अब ढाबा से होटल में तब्दील हो गया है।

पराठा खाने के बाद टारगेट नारकंडा हो गया

होटल में कड़ी मशक्कत के बाद टेबल लूटी गई (मतलब जगह बनाई गई) । फिर पराठे का ऑर्डर दिया गया। पराठे से ज्यादा टेस्टी मक्खन। स्वाद ऐसा कि डबल पराठा मंगवा लिया गया। इसे निपटाने के बाद पेट और मन को तृप्त कर वापस हाइवे पर आ गए। आगे का टारगेट नारकंडा तक पहुंचने का था। हमलोग भी शानदार हाइवे का लुत्फ उठाते हुए बढ़ने लगे। लेकिन, चंडीगढ़ जो कभी सपनों का शहर लगता था। वहां की ट्रैफिक ने रूला दिया। उम्मीद ही नहीं थी कि यहां इस तरह की बेतरतीब ट्रैफिक होगी। खैर, चंड़ीगढ़ टाउन क्रॉस किया तो राहत की सांस ली। फिर पंचकुला क्रॉस करने के बाद पहाड़ियां दिखने लगी।

पहाड़ों में पहली बार धन्नो छोड़ उर्मिला से राइडिंग

अब पहाड़ों में बाइक राइड करने का तो बहुत अनुभव रहा है। लेकिन, फॉर व्हिलर का बिल्कुल भी नहीं। लेकिन, ये पहाड़ियां तो कुछ नहीं हमें तो आने वाले दिनों में दुनिया के सबसे खतरनाक रास्तों से गुजरना था। यही सोचकर सावधानी से खुद को ट्रेंड करते हुए आगे बढ़ते रहे। शिमला से करीब 30 किमी पहले पहुंचा तो मुरुथल का पराठा काम करना बंद कर दिया था। एहसास हो रहा था कि अब कुछ जाना चाहिए। फिर पहाड़ किनारे एक छोटी सी टपरी देख कर रूक गया। वहां सभी लोगों ने शानदार भोजन का लुत्फ उठाया। टपरी से निकला तो एक स्कूल बस लगी। हिमाचली बच्चे वहां से निकले और लोकनृत्य करने लगे। साथ में उनके शिक्षक भी लग गए। हमलोग भी करीब 20 मिनट तक हिमाचल के इस रंग को देखते रहे। फिर आगे की ओर निकल पड़ा।

कुफरी…फागू की खूबसूरती ने रोक लिया

अब शाम होने लगी थी। शिमला में एंट्री भी हो गई। लेकिन, मुझे कभी भी मॉल रोड का चस्का नहीं लगा। इससे हमेशा दूर रहा। दूसरों की इच्छा की हत्या करते हुए आगे निकल पड़ा। शिमला से आगे होते ही खूबसूरत वादियों नजर आने लगी। कुफरी…फागू क्रॉस करते हुए नारकंडा पहुंचना था। कुफरी के आगे प्रकृति की खूबसूरती ने हमें आगे बढ़ने नहीं दिया। कुछ देर यहीं हाइवे किनारे रूक गए। करीब आधे घंटे तक घूमता रहा। वहां से गुजर रहे एक बाइकर की नजर उर्मिला के नंबर प्लेट पर पड़ी।

पहाड़ों को सम्मान देना जरूरी

यह देखते ही वह यू टर्न लेते हुए हमारे पास आ गया। काफी देर तक बातचीत होती रही। फिर हमलोग भी नारकंडा के रास्ते में निकल गए। अब अंधेरा छा गया था और सूर्य अस्त के बाद मैं पहाड़ों को सम्मान देता हूं। चलता नहीं हूं। इसलिए नारकंडा से करीब 15 किमी पहले भावनगर नाम की छोटी सी जगह पर रूक गया। यहां एक छोटे से ढाबे में भोजन किया। पास में ही होटल में कमरा मिल गया। अब आराम के बाद अगले दिन नारकंडा से आगे की यात्रा शुरू होगी…

आगे की यात्रा के लिए travellinglover.in पर बने रहिए। ट्रैवलिंगलवर के साथ देश के अलग-अलग हिस्सों का सैर करते रहिए। शब्दों और तस्वीरों से मन ऊब जाए तो वीडियो देखने के लिए हमारे यूट्यूब चैनल की ओर भी रूख कर सकते हैं।

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