यूपी के पूर्वांचल के इलाकों का दौरा किए हुए करीब दो महीने होने को हैं। पिछले कई दिनों से निकलने की कोशिश कर रहा था। मन कर रहा था कि किसी नई जगह की ओर निकला जाए। अचानक ख्याल आया कि इस मौसम में तो बिहार के लिए राजगीर जाना बेस्ट ऑप्शन है। इन दिनों तो राजगीर में पर्यटकों की संख्या भी काफी बढ़ गई है। वहां का ग्लास ब्रिज आकर्षण का केंद्र है। ग्लास ब्रिज से राजगीर की पहाड़ियां और भी खूबसूरत नजर आती है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि ऐसा ग्लास ब्रिज एशिया महादेश में सिर्फ चीन के पास है। सोशल मीडिया पर ग्लास ब्रिज के कुछ फोटोज भी शेयर खूब हो रहे हैं, जिसे देखकर आखिरकार राजगीर जाने का फैसला कर लिया।

पिलियन रायडर भी चलने को तैयार
बहाना बनाने वालों के लिए हर मौसम में बहाना ही होता है। कभी ठंड हवाए हैं, कभी गर्म हवा के झोंके है तो कभी बारिश। बाइक राइडिंग में तो तीनों के अपने अपने मजे हैं। रायडर के लिए इसमें मस्ती है। लेकिन, जिसे रायडिंग और घुमना फिरना पसंद नहीं। वह सिर्फ बहाना ही खोजता रहता है। लेकिन, अपन तो ठहरे खांटी घुमक्कड़। यही सोचकर अगले दिन सुबह में निकलने की प्लानिंग हुई। साथ में एक पिलियन रायडर भी तैयार हो गया। उसे भी ग्लास ब्रिज के सपने इन दिनों आ रहे थे। कहने को तो पिलियन रायडर। लेकिन, पेशे से इंजीनियर और रिश्ते में मेरा भांजा। फिर क्या था दोनों सुबह निकलने की प्लानिंग कर रात में बिस्तर पर ढेर हो गए।

तो अब राजगीर को ओर निकल पड़ा
अहले सुबह नींद खुली तो रजाई से निकलने का मन नहीं कर रहा था। किसी तरह से निकला तो 8 बज गए थे। प्लानिंग के मुताबिक अब तक तो आधी दूरी तय कर लेनी थी। खैर, निकलते-निकलते दोनों को ग्यारह बज गए। ठंड का मौसम और 94 किमी का सफर। दरअसल, पटना से राजगीर की दूरी 94 किमी है। मेरे लिए तो यह दूरी नगण्य है। क्योंकि, मैं तो दिनभर में 600 किमी की सफर तय करने का हौसला रखता हूं। लेकिन, औरों के लिए 94 किमी ही बहुत है। घर से निकला तो सबसे पहला स्टॉपेज अपनी धन्नो का भोजन। फुल टंकी भोजन कराया। फिर निकल पड़ा राजगीर की ओर।

कौन है इस बार यायावर का पिलियन रायडर
पटना का टोल टैक्स पार करते ही ठंड बढ़ने लगी। मैंने एक और जैकेट ऊपर से चढ़ाया, मंकी कैप(भकरुआ टोपी) पहना और स्लेटर को तेजी से दबाया। अपने पिलियन रायडर यानी इंजीनियर साहब को बोल दिया कि भूख लगे तो बताना है क्योंकि मैं तो दिमाग में किमी का हिसाब बिठाकर ही रूकता हूं। सबसे बड़ी बात यह कि इंजीनियर साहब के साथ पिछली रायडिंग का अनुभव इस मामले में गड़बड़ था। पिछली बार मैंने हैंडल संभाली तो सीधे 150 किमी पर रूका था। इसलिए इस बार पहले ही बता दिया था कि रूकने की इच्छा हो तो संकेत दे देना है।
गर्म कुंड से बनायी दूरी
अपनी धन्नो चली तो सीधे राजगीर में रूकी। बीच में करीब 10 मिनट के लिए एक जगह सिर्फ रोकी गई। आप समझ ही गए होंगे। क्यों रूकी होगी। फिर चली तो सीधे राजगीर की वादियों में रूके। सबसे पहले हमने गर्म कुंड में स्नान नहीं करने का फैसला किया। जबकि, ज्यादतर लोग ठंड के दिन में राजगीर के गर्म कुंड में जरूर स्नान का लुत्फ उठाते हैं। इसके दो फायदे हैं। एक तो धार्मिक मान्यता पूरी हो जाती है। दूसरी नेचुरल गर्म पानी से ठंड में शरीर इनर्जेटिक हो जाता है। कह सकते हैं कि शरीर का पूरी तरह से मसाज हो जाता है। लेकिन, हमे तो ग्लास ब्रिज देखने का भूत सवार था। यही सोचते हुए दोनों ग्लास ब्रिज की ओर निकल पड़े।

ग्लास ब्रिज देखने का टूटा सपना
पहला झटका हमें ग्लास ब्रिज के पास पहुंच कर मिला। जिसे जान हमारी पूरी एनर्जी और उत्साह खत्म हो गया। चेहरे पर मायूसी छा गयी और खुद के आलसपन पर गुस्सा होने लगा। साथ ही अपनी अज्ञानता पर भी। दरअसल, हुआ कुछ ऐसा कि ग्लास ब्रिज अभी राजगीर का सबसे हॉट प्लेस है। पर्यटकों की यह पहली पसंद है। इस ब्रिज पर जाने के लिए लोगों की संख्या फिक्स कर दी गई है। दिनभर में सिर्फ 800 लोग ही ब्रिज पर जा सकते हैं। यह ब्रिज को लेकर बनाया गया प्रोटोकॉल है। अब दोपहर के 2 बज गए थे और आज इस समय तक ही 800 लोग ग्लास ब्रिज देख चुके थे। अब इसमें एंट्री बंद कर दी गई थी। अब ग्लास ब्रिज देखने के लिए अगले दिन का इंतजार करना पड़ता। इस तरह से ग्लास ब्रिज से राजगीर की खूबसूरती को नहीं देख सके। बड़े ही मायूस होकर वहां से निकल पड़े।

घोड़ाकटोरा की ओर रवानगी
अब अगला ऑप्शन हमारे पास घोड़ाकटोरा जाने का था। यह भी राजगीर का बेहतरीन टूरिस्ट स्पॉट है। यहां की भी तस्वीरें इंटरनेट पर खूब दिखती है। चारों ओर से पानी और बीच में भगवान बुद्ध की प्रतिमा। तीन ओर से पहाड़ियों से घिरा है घोड़ाकटोरा। यहां की खूबसरती को ध्यान में रखकर निकल पड़ा। मेन रोड से करीब 2 किमी तक चलने के बाद वह प्वाइंट आता है, जहां से घोड़ाकटोरा आप जाएंगे। लेकिन,यहां एक और झटका लगा। बाइक से घोड़ाकटोरा नहीं जा सकते हैं। सिर्फ वहां मौजूद ई-रिक्शा से। टूरिज्म और वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने ईको टूरिज्म को लेकर यह व्यव्स्था की है। करीब 300 किराया है। थोड़ी-बहुत मोल मोलय आप बिहारी बुद्धि लगा कर सकते हैं।

हॉर्स रायडिंग से कम नहीं टोटो की सवारी
ई-रिक्शा (यानी टोटो) पर बैठकर चला तो समझिए आप गाड़ी पर नहीं घोड़े पर यात्रा कर रहें हों। दोनों तरफ जंगल और बीच में रास्ता। कहने को तो रास्ता लेकिन हिचकोले इतने की आपकी नानी याद आ जाए। करीब 9 किमी की दूरी तय करने के बाद घोड़ाकटोरा आता है। इस रास्ते को अगर बना दिया जाए तो यह ई रिक्शा के लिए भी बढ़िया होगा और पर्यटकों के लिए भी। लेकिन, भैया अपनी सरकार तो इतनी जल्द समझती तो है नहीं। इसलिए घोड़ाकटोरा तक पहुंचने में हॉर्स रायडिंग जैसा लुत्फ उठाते रहिए। खैर, करीब आधे घंटे के सफर के बाद डेस्टिनेशन पर पहुंच गया। यहां आकर लगा, वाह….बिहार में भी खूबसूरती है। तीन ओर से पहाड़ियां, बीच में काफी बड़ा तालाब जैसा दिखता भौगोलिक संरचना। तालाब के बीच में महात्मा बुद्ध की बड़ी सी प्रतिमा लगी है। वहां तक लोग बोटिंग करते हुए पहुंचते हैं। यहां तालाब में बड़ी संख्या में बत्तख है, जो पर्यटकों की भाषा को बखूबी समझने लगे हैं। उनके बुलावे पर तत्काल पहुंच जाते हैं। दाना लेते हैं और निकल जाते हैं।

राजगीर की पहचान है रोप वे
घोड़ाकटोरा राजगीर की वैसी जगह है, जहां आप कई घंटे बीता सकते हैं। खासकर यहां पर सूर्योदय और सूर्यास्त देखना और भी अद्भूत हो सकता है। लेकिन, हमारे पास तो समय की कमी थी। आगे रोप वे से महात्मा बुद्ध के मंदिर तक भी पहुंचना था, जिसका बंद होने का समय शाम पांच बजे होता है। यही सोचकर कुछ देर तक फोटोबाजी की गई। फिर जल्द ही वहां से निकल पड़े। ई-रिक्शा से मेन प्वाइंट पर पहुंचे। ई रिक्शा स्टैंड के पास ही रोप-वे के लिए बुकिंग काउंटर बना हुआ है। कई होटल भी हैं, जहां आप भोजन कर सकते हैं। लेकिन, सावधान रहिएगा, यहां के कई भोजनालय और होटल सामान के जरूरत से ज्यादा रकम की डिमांड कर देते हैं। खैर, इसकी चर्चा कभी और। अब तक भूख भी शैतानी करने लगी थी। इसको शांत करने के लिए दो ड्रिंक्स लिए गए और निकल गया रोप वे के लिए टिकट लेने।

पुराने और नए रोप वे में अंतर
राजगीर का रोपवे देश के सबसे पुराने रोप-वे में शामिल है। यहां अब दो तरह के रोप वे हैं। एक पुराने जमाने की, जिसमें केबिन नहीं है। स्टैंड कुर्सी की तरह बैठकर लोग लुत्फ उठाते हैं। इसमें सिर्फ एक बंदा ही बैठ सकता है। कुर्सी के आगे एक लोहे का रॉड होता है, जिसे लगा दिया जाता है। बचपन में भी कई बार राजगीर गया था। लेकिन, इस कुर्सी वाले रोप वे की वजह से नहीं बैठता था। इसको देखते ही डर लगता था। इसलिए हमलोग जैसे डरने वालों के लिए केबिन वाले रोप वे का इंतजाम सरकार ने कर दिया। पूरी तरह से बख्तरबंद गाड़ी की तरह तो हमने भी बंद केबिन वाले रोप वे का दो टिकट लिया। इसकी कीमत से पुराने वाले रोप वे से ज्यादा रखी गई है। इसमें 6 लोग एक साथ बैठ सकते हैं। मैं और मेरे पिलियन रायडर भी इसमें सवार हो गए।

144 फीट ऊंची है स्तूप
रोप वे से जैसे-जैसे हमलोग ऊपर की ओर बढ़ते हैं तो राजगीर की पहाड़ियां बेहद खूबसूरत दिखती है। काफी हाइट से राजगीर को देखना अच्छा लगता है। धीरे-धीरे सरकते हुए रोप-वे आपको ऊपर मंदिर तक पहुंचाती है। यहां केबिन से उतरने के बाद करीब 100 सीढ़ियां चढ़कर भगवान बुद्ध के मंदिर तक पहुंचते हैं। कहा जाता है कि गया से ज्ञान की प्राप्ति होने के बाद महात्मा बुद्ध ने इस जगह पर भी कुछ समय व्यतीत किया था। उन्होंने यहां भी साधना की थी। विश्व शांति स्तूप नाम से मशहूर इस स्तूप की ऊंचाई 144 फीट है। करीब 1 लाख मजदूरों ने इसे बनाने में काम किया था। इसको बनाने में उस वक्त 18 लाख की लागत आई थी। विश्व शांति स्तूप के आगे काफी जगह बनाया गया है, जहां से आप नीचे पहाड़ियों की खूबसूरती को देख सकते हैं। यहां से राजगीर का पूरा जंगल दिखता है। करीब 1 घंटा यहां गुजारने के बाद हमलोग रोप वे से नीचे उतर गए।
राजगीर में देखने को तो अभी काफी कुछ है। लेकिन, विश्व शांति स्तूप के बाद राजगीर से निकलने का फैसला कर लिया। क्योंकि, अंधेरा होने वाला था और हमें आगे की ओर सफर पर निकलना था। राजगीर को यह सोचते हुए छोड़ा कि अगली बार ग्लास ब्रिज जरूर देखा जाएगा। वहां से राजगीर की खूबसूरती का आनंद उठाया जाएगा। यही कहते हुए राजगीर की वादियों से अपनी धन्नों निकल पड़ी।
