कई बार ऐसा वक्त आता है कि लोग ठहर सा जाते हैं, उनमें निरंतरता नहीं रहती। कोशिश होती है कि रवानगी फिर से शुरू की जाए। लेकिन ठहराव की जड़े मजबूत रहती है और कहीं न कहीं मन की ताकत कमजोर। आपका यायावर भी पिछले कुछ महीनों में ठहर सा गया था। यात्राएं धीमी पड़ गई थी और मन में सिर्फ व्याकुलता। इससे दूर होने के लिए एक छोटी सी यात्रा जरूरी लग रही थी। यही सोचकर महाशिवरात्रि के मौके पर पटना से हरिहरनाथ मंदिर जाने का विचार हुआ। बिहार के लोग तो इस नाम को बखूबी जानते हैं, क्योंकि यहां के लोकगीतों में भी बाबा हरिहरनाथ का खूब जिक्र हुआ है। लेकिन दूसरे राज्यों के लिए सोनपुर पशु मेला का नाम लेना ज्यादा उचित है। बाबा हरिहरनाथ मंदिर के पास ही एशिया का सबसे बड़ा सोनपुर पशु मेला का आयोजन होता है।
भक्तिमय बना माहौल
प्लानिंग के मुताबिक तो सुबह 6 बजे तक बोरिंग रोड स्थित आवास को छोड़ देना था। लेकिन इस यात्रा में एक और साथी भी जाने को तैयार हो गए थे। इस वजह से निकलते-निकलते सुबह के 8 बज गए। दिन महाशिवरात्रि का था तो मोहल्ले से बाहर होते ही माहौल भक्तिमय नजर आ रहा था। लाउडस्पीकर पर हर हर महादेव से लेकर बंम बंम भोले के गीत बज रहे थे, सड़क किनारे ठेलों पर बेलपत्र और फूलों की भरमार लगी हुई थी। जिसे तीन ओर से ज्यादतर महिलाएं घेरे हुई थी और भी क्यों नहीं महाशिवरात्रि का ज्यादा असर तो इन्हीं पर होता है। दूसरे तो भांग को बाबा का प्रसाद मानकर उसी चक्कर में लगे रहते हैं।
जेपी सेतू की खूबसूरती
बाबा हरिहरनाथ मंदिर पहुंचने के लिए हमने जेपी ब्रिज का रास्ता चुना। गूगल मैप के मुताबिक मात्र 21 किमी का सफर था। पटनावासियों के लिए जेपी ब्रिज फिलहाल घूमने की भी एक जगह बनी हुई है। मन नहीं लगा तो पटनाइट्स जेपी ब्रिज की ओर निकल पड़ते हैं। गंगा की चौड़ी पाट पर बनी इस पुल से गुजरना खुद ब खुद आनंददायक है। यही सोचकर हमने भी जेपी सेतु को चुना था। पुल के पास पहुंचते ही ठंडी हवाओं ने स्वागत किया। सूरज की किरणें भी अभी ज्यादा तीखी नहीं हुई थी। कुछ देर तक पुल से अविरल होकर बहती गंगा को देखता रहा। उपर से बिल्कुल शांत और अंदर ही अंदर कुलाचें मारती गंगा काफी कुछ सीख देती है। धीमी-धीमी गति से बढ़ते हुए पुल को क्रॉस कर रहा था। करीब 4.5 किमी का सफर तय कर हम पुल के दूसरे हिस्से तक पहुंचे। यहां से NH सीधे नॉर्थ बिहार के जिले की ओर जाती है। लेकिन मैं वहां से दाहिने लेकर हरिहरनाथ मंदिर की ओर निकल पड़ा।
मंदिर के बाहर भक्तों की लंबी लाइन
मंदिर की ओर जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा था, माहौल शिवरात्रिमय हो रहा था। महिलाओं से लेकर पुरुषों के ललाट पर शैव भक्तों का टीका नजर आ रहा था। हाथों में गंगाजल, ललाट पर टीका, चेहरे पर जल चढ़ाने की व्याकुलता और हर-हर महादेव की निकलती ध्वनि वातावरण को भक्तिमय कर रही थी। मंदिर के बाहर लंबी लाइन लगी हुई थी। यानी दर्शन करने में 4-5 घंटे तो लग ही सकते थे। किसी और दिन मंदिर के अंदर जाने की बात सोचकर हम घाट की ओर निकल पड़े। मंदिर के बगल से ही गंगा घाट की ओर रास्ता जाता है, जिसे यहां काली घाट बोलते हैं। गंगा और गंडक नदी का समागम स्थल भी इसे माना जाता है। पटना की तुलना में यहां गंगा का पानी ज्यादा स्वच्छ दिख रहा था। इच्छा हुई कि दो-चार डूबकी ले ही ली जाए, लेकिन अलग कपड़ों के बिना यह इच्छा मन में ही दबा कर रखनी पड़ी। काली घाट से गंगा में डूबकी लगाते श्रद्धालुओं की बड़ी भीड़ को देखकर अलग ही एहसास हो रहा था।
क्या है मान्यताएं
बाबा हरिहरनाथ मंदिर के बारे में कई कथाएं प्रचलित है। एक मान्यता यह है कि भगवान विष्णु के दो भक्त गज(हाथी) और ग्राह (मगरमच्छ) थे। गज खुद को काफी बलवान समझता था, उसमें अहंकार आ गया था। एक बार इस घाट पर पानी पीने के दौरान ग्राह ने उसे पकड़ लिया। कई दिनों तक दोनों के बीच युद्ध चलता रहा। गज को अपनी हार दिखाई पड़ने लगी। उसने भगवान विष्णु की आराधना की। भगवान ने सुदर्शन चक्र चलाकर दोनों के युद्ध को खत्म किया। इस वजह से यहां हरि(विष्णु) और हर(शिव) दोनों का मंदिर है। दूसरी मान्यता यह है कि यहां एक बार शैव और वैष्णव भक्तों के बीच विवाद हो गया। दोनों के बीच सुलह कराकर हरि और हर की स्थापना एक ही मंदिर में की गई। तीसरी मान्यता यह है कि जनकपुर जाने के दौरान श्रीराम ने इसी घाट पर शिव की पूजा की थी। इसके बाद धनुष तोड़ कर सीता के साथ विवाह किया था।
चलो घर लौट चलें
करीब दो घंटों तक मंदिर के घाट पर घूमने के बाद वापस निकलने का वक्त आ गया। यह सोच कर निकला कि वैसे दिन आऊंगा, जब यहां भीड़ नहीं होगी। इसके बाद पार्किंग से गाड़ी निकाली और वापसी के सफर पर रवाना हो गया। अब धूप तीखी हो गई थी और गर्मी भी बढ़ रही थी। भूख को कुछ देर तक शांत करना भी जरूरी थी। इसलिए एक झोपड़ी के नीचे गर्म-गर्म कचौड़ी का स्वाद लिया और फिर चल पड़ा घर के लिए।
