अगर आपने जिंदगी मिलेगी दोबारा फिल्म देखी होगी तो वो सीन जरूर याद होगा जिसमें कैटरीना स्कूबा डाइविंग की ट्रेनिंग देती है. आपकी यात्रा में भले ही कोई कैटरीना या रितिक न हो. लेकिन, समंदर के अंदर के जीवन को आप यहां जरूर महसूस कर सकते हैं. लहरों के भीतर जो जिंदगी चलती है. उसे एहसास कर सकते हैं. तो चलिए आपको लेकर चलते हैं. देश के उस हिस्से में जिसे याद कर आजादी से पहले लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते थे.

तो चलें अंडमान की ओर
तो साथियों यात्रा कुछ ऐसी है कि पापा को ऑफिस की तरफ से अंडमान निकोबार का 5 दिन का ट्रीप मिला था. नाम सुनते ही समंदर की लहरों की तरह दिल रोमांचित हो रहा था. गूगल पर देखी गई कई खूबसूरत फोटोज सामने आ रहे थे. साथ ही जिस जगह को अंग्रेजों ने भारतीयों को सजा देने के लिए तैयार किया था. उसे देखने के लिए बेचैन हो रही थी. जहां लोगों को ब्रिटिश शासक काला पानी की सजा देते थे. लेकिन, फैमिली दिल्ली में थी और मैं हैदराबाद में ‘दो मरे चार घायल’ मतलब खबरें बना रही थी. अब ऑफिस से छुट्टी लेना किसी युद्धाभ्यास से कम तो होता नहीं है. हालांकि, इसमें जीत हासिल कर मैंने अपना बैगपैक कर लिया. फिर, दो हफ्ते की छुट्टी पर परिंदों की तरह निकल पड़ी.

चलों विंडो सीट पकड़ लें
इस बार मां-पापा से मिलने की खुशी ज्यादा थी. क्योंकि उनके साथ अगले दिन ही अंडमान निकलनेवाली थी..बादलों के ऊपर और लहरों के नीचे की दुनिया में जो जाना था. अगले दिन सुबह में 3 बजे के करीब एयरपोर्ट के लिए निकल पड़े. सूर्योदय के वक्त फ्लाइट उड़नेवाली थी. एक तरफ उगता हुआ सूरज. आसमान में लुका-छिपी खेलते बादल और इनसब के बीच मैं आसमान में कुंलाचे भर रही थी. विंडो सीट तो मैंने लपक कर पकड़ लिया था. करीब दो घंटों के बाद नजारा ही बदल गया. जैसे-जैसे फ्लाइट नीचे हो रही थी. हर तरफ पानी ही पानी दिख रहा था. ऊपर से समंदर को पहली बार देख रही थी. कई द्विपों का समूह दिख रहा था. बेहद खूबसूरत. बिल्कुल अलग. भारत की एक अलग आकृति से मैं मिल रही थी. उस काला पानी वाली जगह पहुंचनेवाली थी. जिसके बारे में अब तक किताबों में ही पढ़ी थी. खैर, कभी आंखे खुल रही थी. कभी बंद हो रही थी. इस तरह हमारी फ्लाइट 11 बजे के आसपास पोर्टबलेयर एयरपोर्ट पर लैंड हुई. जिसे वीर सावरकर एयरपोर्ट भी बोलते हैं.

समंदर में स्टिमर
सबसे पहले हमलोग होटल पहुंचे. यहां करीब 2 घंटें तक आराम किया. बाकी लोगों को तो नींद आ गई थी. लेकिन, मैं तो अभी भी पोर्ट ब्लेयर के सपनों में ही थी. पलक झपक ही नहीं रही थी. जल्द से जल्द यहां घुमना चाह रही थी. न चाहते हुए मम्मी-पापा चलने को तैयार हो गए. और भी लोग जो साथ थे वो तुरंत साथ में निकलने लगे. होटल से कुछ ही दूरी पर एक बीच था. जहां घुमने के लिए स्ट्रिमर की व्यवस्था की गई थी. यहां पर्यटक इससे समंदर के अंदर कुछ दूर तक जा सकते हैं. देश के दूसरे समंदर किनारों से ये थोड़ा अलग है. यहां के पानी का रंग भी थोड़ा बदला हुआ दिखता है. यहां भी मैंने किनारेवाली सीट पकड़ ली. स्टिमर भी म्यूजिक भी चल रहा था. हर कोई प्रकृति के सौंदर्य में खोया हुआ था. करीब दो घंटे तक स्टिमर का लुत्फ उठाने के बाद हम वापस किनारे पर आ गए. अब तक सभी लोग पूरी तरह थक गए थे. कहीं जाने के बजाए सभी होटल की ओर रवाना हो गए.

गार्डन की सैर
दूसरे दिन हम सब रोज गार्डन और काला पानी (सेलुलर जेल ) के लिए निकले. सबसे पहले हम रोज गार्डन गए वहां पर हमें सबसे पहले ये बताया गया कि आपको पानी वाले जहाज से गार्डन की सैर करवाएंगे. इसके बाद अगर आपको स्कूबा ड्राइविंग करनी है तो वो भी आप कर सकते हैं. उसका प्राइज लगभग 3500 था.. हम सबने फैसला लिया कि हम सब ये ऐक्टीवीटी करने वाले हैं. तो हम पहले पानी के जहाज में बैठकर रोज गार्डन के लिए निकल गए और वहां पर पूरा गार्डन घुमा. गार्डन की खूबसूरती गजब की थी. कई फूल ऐसे थे. जिसे पहली बार देख रहा था. यहां एक अलग तरह का सकुन मिल रहा था. करीब 3 घंटे तक सभी लोग यहां घुमते रहे. फिर हम पानी की जहाज में बैठकर दूसरे बिच की तरफ निकल गए

स्कूबा..सपना..समंदर
अब कुछ ही देर में मेरा सपना पूरा होनेवाला था. स्कूबा डाइविंग जिसे अब तक फिल्मों में देखते आई थी. उसकी ट्रेनिंग सामने हो रही थी. समंदर के अंदर की दुनिया देखने को मैं पागल हो रही थी. मछलियों के बीच तैरने के लिए उत्साहित हो रही थी. लेकिन, मम्मी-पापा इस एडवेंचर से दूर रहने की सलाह दे रहे थे. उन्हें इससे काफी डर लगा रहा था. लेकिन, मैं तो पूरी तरह से तैयार थी. सबसे पहले ट्रेनर ने बताया कि पानी के अंदर जाने के लिए क्या करें और क्या न करें. बहुत मुश्किल था. और डर भी लग रहा था. लेकिन डर के आगे जीत है का स्लोगन दिमाग में चल रहा था. फाइनली पूरी तरह से किट को मेरे शऱीर में बांध दिया गया. इसमें ऑक्सीजन सिलेंडर समेत कई इक्युपमेंट्स होते हैं. पैर में मछली की तरह दो पत्तियां लगी होती है. जो मशीन से चलती है. पानी के अंदर घुसते ही सबकुछ बदल गया था. मैं अलग दुनिया में खुद को महसूस कर रही थी. आस-पास तरह-तरह की मछलियां गुजर रही थी. जिसे पहले कभी देखी भी नहीं थी. कई समंदर के जीवों पर भी नजर पड़ी. अंदर बहुत ही कलरफुल कुछ दिख रहा था. कुछ घास के रंग के तो कुछ दूसरे रंग के. अंदर छोट-छोटे-पौधे भी नजर आ रहे थे. लग रहा था किसी का इसमें घर है. मतलब, इस एहसास को मैं भूल ही नहीं पा रही हूं. न ही इसे शब्दों में पूरी तरह से बता पा रही हूं. आंखें पूरी तरह से खुली थी. और मैं सोच रही थी कि समंदर के अंदर भी ऐसा हो सकता है. लग रहा था कुछ और अंदर जाऊं. लेकिन, ट्रेनर की बातों का पूरी तरह से ख्याल रखना था. वो इंस्ट्रक्शन भी दे रहा था. जरा सी गलती मौत को दावत देने के यहां बराबर है. यही सोचकर मैं ऊपर आ गई. लगा सपनों की दुनिया से लौट कर आई हूं. थोड़ी थकान भी हो रही थी. इसलिए, तुरंत स्टिमर में आकर बैठ गई. थोड़ी दूर आगे बढ़ने पर मौसम खराब होने लगा जिसके कारण वहां पर कुछ भी नहीं दिख रहा था. लगातार बारिश और पानी की तेज रफ्तार के कारण स्टिमर की रफ्तार भी कम होने लगी. समंदर की लहरों में तेजी आ रही थी. ये देखकर कुछ देर तक तो सभी डर गए. लेकिन, वहां मौजूद क्रू मेंबर ने सभी को भरोसा दिलाया. और करीब 1 घंटे बाद हमलोग बीच किनारे पहुंच गए. सभी ने एक अलग तरह का एडवेंचर फिल किया.

हैवलॉक की ओर
तीसरे दिन का प्रोग्राम हमारा अंडमाण के ही दूसरे जगह का जाने का था हैवलौक, वहां के लिए हम सुबह 3 बजे ही उठकर तैयार होकर निकल गए थे. वहां पर क्रूज की सहायता से हमने हैवलौक का सफर किया. मैं पहली बार क्रूज मैं बैठी थी. करीब 6 घंटे का समंदर में सफर करना बेहद रोमांचक रहा. लग रहा था धरती पर सिर्फ पानी ही पानी है. लगभग 12 बजे के आसपास हैवलौक पहुंच चुके थे. वहां से हम होटल गए. हमारे होटल का नाम गोल्ट स्टार था. होटल को देखकर ऐसा लगा मानों जन्नत में आ गए. होटल बीच के बगल में ही था. खिड़कियों से सीधा समंदर की लहरें दिखती थी. हवाओं की रफ्तार खिड़कियों से भी टकराती थी और अजीब तरह की आवाज निकलती थी. 1 घंटे तक आराम करने के बाद बीच की तरफ गए. वहां पर हम सबने जमकर मस्ती की और घंटों तक लहरों के बीच डुबकी लगाती रही. लहरों के बीच जाना और फिर दूसरी तंरगों को देखकर वापस लौटना. गजब का मजा आता है.

चलो परिंदें लौट चलें
पूरी रात बिताने के बाद हम सब अगले दिन हैवलोक से सुबह 4 बजे क्रूज से पोर्टबलेयर की ओर निकल गए. इस दौरान हमने क्रूज में काफी इंजॉय किया. क्रूज के म्यूजिक के बीच हम सबने रेन डांस किया. जिसमें हमें बहुत मजा आया. पोर्टबलेयर पहुंचने के बाद हम सब अपने अपने होटल गए और सो गए. अगले दिन हमारा दिल्ली का फ्लाइट था. इसलिए हम सब जल्दी ही सो गए. पांचवा दिन हमारा दिल्ली के लिए फ्लाइट था. हम सब अगले दिन निकलने की तैयारी कर रहे थे. लेकिन मेरे मन में सिर्फ यही चल रहा था कि काश कुछ दिन और यहां पर ठहर जाते. अंडमान से लौटते समय हम सब यही सोच रहे थे कि काश कुछ दिन और हम सब यहां पर रूक सकते. दिल्ली पहुंचने के बाद मेरे मन में सिर्फ यही चल रहा था कि काश एक बार हम फिर से अंडमान की ओर निकल पड़े…

हर किसी को अपनी बातों से हंसानेवाली. तेवर ऐसे कि ऑफिस में सीनियर भी जूनियर बन जाए. और छुट्टियां लेने में महारत रखनेवाली एडवेंचर की शौकीन रागिनी ने अंडमान की इस यायावरी को लिख भेजा है.
