द अनप्लैंड जर्नी: जब रात 1 बजे बुलेट से निकल पड़े 2 मतवाले

यही कोई रात के करीब डेढ़ बजे होंगे। मैं और शाही जी Santosh Shahi खाना खाकर बैठे ही थे कि मैंने कहा, ‘चलिए कहीं से तफरी मारकर आते हैं।’शाही जी ने पूछा, ‘कहां?’ मैंने कहा, ‘सुषमा-पनामा(हैदराबाद का एक मुहल्ला)’

सड़क पर सन्नाटा

सफर पर संशय

जवाब आया, ‘सुषमा-पनामा नहीं। हाईवे पर कहीं चलते हैं। कोई एक रास्ता पकड़ पर निकल जाते हैं। कहीं न कहीं तो पहुंच ही जाएंगे।’ मैंने कहा, ‘पर कोई तो जगह होनी चाहिए। ऐसे कहां हाईवे पर भटकते रहेंगे। मंजिल के बिना सफर का मजा नहीं है।’ शाही जी ने कहा, ‘चलिए नागार्जुन सागर चलते हैं।’

सफर का साथी

नागार्जुन की तैयारी

यह सुनकर पहले तो मैंने मना कर दिया। फिर लगा मैं गूगल मैप पर रास्ता- बास्ता चेक करने। अगले दिन दोपहर में ऑफिस भी जाना था। ऐसे में इतना लंबा सफर। आना-जाना क्या मुमकिन हो पाएगा। जब तक मैं ये सारा हिसाब लगा रहा था, शाही जी बेड पर पसर चुके थे। उनको उठाकर मैंने आने- जाने का पूरा हिसाब- किताब समझाया। थोड़ा टाल- मटोल के बाद हम दोनों चलने के लिए राजी हो गए।

सड़क पर सेल्फी

सफर की शुरुआत

झट से कपड़े चेंज किए। बैग में जरूरी सामान भरा गया। हेलमेट, चश्मा, गमछा उठाया और बाइक निकल गई. रात के करीब दो बज चुके थे। शाही जी ने अपनी रॉयल एनफील्ड थंडरबर्ड- 350 स्टार्ट की और हम तीनों, मैं, शाही जी और रैंबो (रॉयल एनफील्ड थंडरबर्ड- 350) गूगल मैप के सहारे नागार्जुन सागर डैम की ओर बढ़ चले।

मतवालों का मन

यायावर की यायावरी

इस तरह कोहेड़ा से नागार्जुन सागर डैम और फिर उससे आगे ईथिपोथला वाटर फॉल तक की करीब 150 किलो मीटर लंबी यात्रा का आगाज हुआ। मेरे लिए ये सफर बिल्कुल नया था। एक अनजान रास्ते पर इतना लंबा सफर और वो भी बाइक से, सुनने में तो बहुत रोमांचक लगता है पर असल में कैसा है मैं बताता हूं।

आंखों में नींद

रात का आनंद

हमारे सफर की शुरुआत हो चुकी थी। सुनसान रास्ते पर करीब सात- आठ किलोमीटर बाइक चलाने के बाद हम हैदराबाद-नागार्जुन सागर हाइवे पर पहुंचे। इसी रोड पर हमें 140 किलोमीटर से ज्यादा का सफर तय करना था। हाईवे पर जलती स्ट्रीट लाइट के नीचे कुछ सेल्फी ली गई और उसके बाद हम नागार्जुन सागर डैम की ओर बढ़ चले।

सन्नाटे में सफर


यादगार पलों का किस्सा

रात के सन्नाटे को चीरती बाइक हाईवे पर फर्राटे से चल रही थी। हम हवा से बातें कर रहे थे। दिल जोश से लबरेज था। जज्बात आजाद थे। मन एक जगह पर स्थिर था। तो दिमाग बहुत दिनों बाद शांत था। बाइक की पिछली सीट पर बैठा मैं उस पल को अपने अंदर कैद कर लेना चाहता था। उसमें खो जाना चाहता था। उस आनंद में सराबोर हो जाना चाहता था। जो उस क्षण मुझे महसूस हो रहा था। न किसी चीज की चिंता थी न ही किसी बात का परवाह था। पहली बार लग रहा था जो होगा सब देख लिया जाएगा। बहुत दिनों बाद मैं खुश था

सन्नाटे में बुलेट

सफर का मजा

‘अरे! कहां खो गए? सो गए थे क्या?’ शाही जी ने पूछा तो मेरा ध्यान टूटा। ‘अरे, नहीं! सफर का मजा ले रहा हूं। खुद से थोड़ी बातें चल रही थी। अक्सर इंसान अपने आप से बातें करना छोड़ देता है। बस अपने अंदर के इंसान का हाल-चाल जान रहा था।’ मैंने कहा।शाही जी के साथ बातें चलती रही और हमारा सफर भी आगे बढ़ता रहा। मैंने उन्हें अपने बचपन की कुछ कहानियां सुनाई। स्कूल के दिनों की। उन्होंने भी अपने बचपन के कुछ किस्से साझा किए। रैंबो अपनी रफ्तार से दौड़ती रही। बीच में हम पेट्रोल भरवाने के लिए एक जगह रुके। वहां भी एक-दो सेल्फीबाजी हुई, उसके बाद हम बढ़ चल.

पेट्रोल तो जरूरी है

जलती कार से दीदार

हाईवे पर चलते हुए एक जगह सड़क किनारे जलती कार भी दिखी। शाही जी ने स्पीड धीरे किया पर वहां कोई नहीं दिखा। न ही किसी प्रकार की कोई आवाज या हरकत दिखाई दी। पीछे से आती हुई गाड़ियां भी उस जलती कार को नजरंदाज कर बढ़ती रहीं। कल सुबह मुआयने की बात कह हम भी आगे बढ़ गए। करीब एक- सावा घंटे लगातार चलने के बाद हमारा पहला पड़ाव आया। कोई छोटा सा बाजार था। सड़क किनारे चाय की दुकान पर हम रूके। गर्म चाय के साथ सफर की थकान मिटाई गई। करीब 15 मिनट रुकने के बाद हम आगे बढ़े। अभी भी 85 किलोमीटर का सफर तय करना बाकी था।

तीन यार की यायावरी

जंगल की शुरुआत

वहां से निकलने के बाद टूटी सड़कों से हमारा सामना हुआ। गड्ढों के बीच से ड्राइव करना शाही जी के लिए मुश्किल था तो बाइक पर बैठे कमर की कसरत भी हो गई। कहीं-कहीं सड़क का दोहरीकरण भी चल रहा था। डायवर्जन से गुजरता ट्रक आसमान को धूल से ढक देता। लगता जैसे रास्ता ही खत्म हो गया हो। धीरे-धीरे हम आगे बढ़ते रहे।

नींद का लुत्फ

जब खुली नींद

चलते- चलते सुबह के साढ़े चार बज गए। मंजिल से हम कुछ ही दूर थे। जम्हाई तो बहुत पहले आनी शुरू हो गई थी। अब तो आंखों में नींद थी। पलकें भारी हो रही थी। हमने रूक कर आराम करने का फैसला किया। रास्ते में एक मंदिर दिखा पर वहां ज्यादा रौशनी नहीं थी। चार-पांच कुत्ते आराम फरमा रहे थे। उन्हें डिस्टर्ब किए बिना हम वहां से आगे बढ़ गए। कुछ दूर चलने पर एक ढाबा नजर आया। हमारा दूसरा पड़ाव। शाही जी बाइक खड़ी कर वहीं ढ़ाबे के बाहर लेट गए। मैं चाय की तलाश में अंदर गया। जब देने वाला कोई नहीं दिखा तब मैंने खुद चूल्हे पर चढ़ी केतली उठाई और चाय ले ली। चाय पीने के बाद मैं भी वहीं लेट गया। हम दोनों की आंख लग गई।

सफर का असर

सूर्योदय का समय

जब आंख खुली तब अंधेरा छट चुका था। सुबह के साढ़े पांच बज रहे थे। हमने चेहरे पर पानी मारा और चाय का पैसा देकर आगे बढ़ चले. जंगल और पहाड़ों के बीच से होते हुए हम अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहे थे। क्षितिज पर सूरज की लालिमा से आसमान चमक रहा था। हवा में ठंडक थी जिससे सिहरन महसूस हो रही थी। बहुत दिनों बाद ताजी हवा में हम सांस ले रहे थे।

भोर हुआ प्यारे

पहुंच गए नागार्जुन

कुछ किलोमीटर और चलने के बाद हम नागार्जुन सागर डैम पहुंचे। वहां रुककर हमने दूर से ही डैम का मुआयना किया। क्योंकि डैम पर जाना प्रतिबंधित था। डैम की विशालता देख हम आश्चर्यचकित हुए तो डैम के घटते जल स्तर को देख हमें थोड़ा दुख भी हुआ। कुछ देर वहां रुकने के बाद हम ईथिपोथला वाटर फॉल के लिए निकल गए।

डैम में पानी की कमी

वॉटरफॉल की ओर

रास्ते में हम कृष्णा नदी पर बने पुल (नागार्जुन सागर ब्रिज) पर रुके। एक तरफ विशालकाय नागार्जुन सागर डैम था तो दूसरी तरफ कृष्णा नदी। उस पुल से सूर्योदय होते देखना बहुत ही अद्भुत अनुभव रहा। बहुत ही शांत, खूबसूरत और सुकून देने वाला वो नजारा था। वहां हमने कुछ तस्वीरें ली और आगे बढ़ चले।

डैम में मछुआरा

आंध्र की सीमा में एंट्री

पुल पार कर हम तेलंगाना की सीमा से निकलकर आंध्र प्रदेश की सीमा में प्रवेश कर चुके थे। जंगल और घुमावदार रास्तों पर करीब 10 किलोमीटर की राइडिंग कर हम अपने आखिरी पड़ाव, ईथिपोथला वाटर फॉल पहुंचे। वहां पहले से कई गाड़ियां लगी हुई थी। बहुत से लोग मौजूद थे पर वाटर फॉल देखने वालों में बस हम दोनों ही थे।

गर्मी का असर

प्रकृति की खूबसूरती

प्रकृति की गोद में बसा ईथिपोथला वाटर फॉल बेहद खूबसूरत है। पहाड़ से पानी को गिरते देखना। कानों में पड़ता पानी का शोर। वहां का नजारा। आपको प्रकृति के और करीब ले आता है। शहर के शोर-शराबे से दूर प्रकृति के बीच मन को शांति मिलती है।

यादों को सहेजा जाए

अनप्लैंड टू प्लैंड जर्नी

कुछ देर वहां रुकने के बाद हमने वापस लौटने का फैसला किया। वापसी का सफर भी लंबा था। और वक्त भी कम था। इस पूरे ट्रिप का अनुभव बेहद शानदार रहा। शुरू में अनप्लैंड था पर चलते-चलते प्लैंड होता गया। बिल्कुल जिंदगी की तरह। चलते-चलते रास्ते बनते जाते हैं और मंजिलें मिल ही जाती है।

सूर्योदय की छवि
नागार्जुन सागर
मतवालों की सेल्फी

पूरी यात्रा की कहानी लिखी है आवारा ने..जी हां, इनका असली नाम तो मोहन हैं. लेकिन सोशल मीडिया पर आवारा के नाम से लिखते हैं. साहब की कलम प्रेम पर गजब चलती है. विश्नास न हो तो इनके ब्लाग पर जा सकते हैं. फिलहाल, हैदराबाद में एक निजी चैनल में सेवा दे रहे हैं. तो आवारा जी आप यूं ही बेधड़क लिखते रहिए और हमें भी भेजते रहिए.

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